बाजार, नैतिकता एवं धर्मनिरपेक्षवाद (भाग एक)

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के आलोचक कहते हैं कि यह नितांत अनैतिक है क्योंकि यह लालच पर आधारित है। लालच- लाभ कमाने का भद्दा प्रेरक। क्या यह आलोचना वैध है? इस क्यों को समझना जरूरी है क्योंकि जन नैतिकता समाजवाद के कहीं बहुत नीचे दब गयी है। प्रतिदिन घोटाले होते हैं। चोरों (नेताओं) को आर्थिक स्वतंत्रता को अनैतिक कहने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में मनुष्य एक-दूसरे से सहयोग करते हैं। गड़रिये, धोबी, पुलिस वाले, दंत चिकित्सक, प्लम्बर एवं बिजली वाले के द्वारा जब श्रम विभाजन होता है तो वास्तव में हम दूसरे लोगों के भार को कम करते हैं क्योंकि हमें विश्वास होता है कि ऐसा करने से हम अपने साथी नागरिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। यह सच है कि हमें भी लाभ होता है। ऐसा हम लाभ कमाने के लिए ही करते हैं। लेकिन क्या लाभ कमाना अनैतिक है?

अपने भोजन के साथ एक छोटा सा प्रयोग कीजिए। जरा देखिए इसमें क्या क्या शामिल है- चावल, दाल, सब्जियां, तेल, मसाले आदि। जरा उन सभी लोगों के बारे में सोचिए जिन्होंने इन सबको पैदा किया। क्या उन सभी ने आपको इन चीजों की आपूर्ति इसलिए की क्योंकि वे सभी आपको चाहते हैं? वास्तव में, वे आपको जानते तक नहीं। यदि आपको उनके प्यार के भरोसे रहना होता कि वे सभी आपकी रसोई को सब्जी, सलाद, मसाले आदि से भर देंगे तो क्या आपको अपना भोजन मिलता? आपको भूखों मरना पड़ता। लाभ कमाने की भावना स्वार्थपरक लग सकती है लेकिन यह काम करती है और दुनिया इसी से चलती है। हम बिजली और पानी इसलिए नहीं पाते कि ये चीजें समाजवादी राज्य द्वारा दानस्वरूप दी जाती हैं।

अब एक और प्रयोग कीजिए- जरा सोचिये आप क्या कार्य करते हैं? या बड़े होकर आप क्या करना चाहेंगे? क्या आप इस कठिन संसार में पारिवारिक सुख-सुविधाओं के लिए श्रम विभाजन में शामिल होंगे या मात्र मानवता से प्रेम के कारण आप श्रम विभाजन से जुड़ेंगे? कई लोग इसका उत्तर देंगे कि मैं इसलिए कार्य विशेष में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहता हूं ताकि मैं खुद के लिए अधिकतम लाभ कमा सकूं। कुछ लोगों का यह उत्तर होगा कि मैं एक डॉक्टर बनूंगा और अफ्रीका के जंगलों में जा कर बीमारों का इलाज करूंगा। इस प्रकार के कथन वाले लोग अतुलनीय रत्न हैं। मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था यकीनन एक तीसरे प्रखंड में विश्वास करती हैः स्वैच्छिक संगठन- जो बहुत कुछ अच्छा कार्य करते हैं? परंतु ये भी मुख्यतः लालच पर ही आधारित होते हैं। यह लालच एक अच्छी बात है। एक अच्छे डॉक्टर को अफ्रीका के जंगलों में आधुनिक दवाइयों की आवश्यकता होगी जिसे लालची दवा कंपनी ही उत्पादित करेगी। अधिकांश स्वैच्छिक कार्य उन लोगों द्वारा दिये गये दान पर जीवित रहते हैं, जो बाजार अर्थव्यवस्था में काम करते हैं तथा लाभ उठाते हैं।

मुक्त बाजार लालच पर आधारित होते हुए भी नैतिक है। सत्य यह है कि व्यापार में दोनों पक्ष लाभान्वित होते हैं। बिजली ठीक करने वाला, मेरे घर का फ्यूज जोड़ने के लिए पचास रूपये लेता है और लाभान्वित होता है। परंतु अगर मैं उसे पचास रूपए दे देता हूं तो मुझे भी लाभ मिलता है (बिजली की सुचारू व्यवस्था के रूप में)। एक अन्य उदाहरण सब्जी वाले का लेते हैं। मेरे घर के बाहर उसके ठेले से मैं एक किलो आलू खरीदता हूं। उसे लाभ मिलता है। उसने थोक बाजार में इसे कम भाव में खरीदा होगा। पर अगर मैं थोड़ा कष्ट उठाकर और खर्चा करके थोक बाजार जाऊं और आलू लाऊं तो वह मुझे ज्यादा महंगा पड़ेगा। इस प्रकार हालांकि सब्जी वाले को भी लाभ मिला, पर मैं भी लाभान्वित हुआ।

इस तरह, मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था मानवीय नैतिकता का एक धर्म निरपेक्ष आधार है। इसी तरह नैतिकता, धर्म से पहले उभर कर आयी। पुराने समय में जब लोग अपने साथ थोड़ा बहुत जो होता था (जैसे- थोड़ी मछली, कद्दू, थोड़ा मांस) उसे लेकर गांव की चौपाल जाते थे। वहां उन्होंने लेन-देन के माध्यम से एक दूसरे अंतःक्रिया का एक नया रास्ता तलाश लिया। लेन देन की नैतिक प्रक्रिया (नैतिक इसलिए क्योंकि कोई चोरी नहीं कर रहा है) के दौरान उन्होंने पाया कि यह प्रक्रिया तभी मुमकिन हो सकती है जबकि इसमें शामिल सभी लोग कुछ निश्चित नियमों का पालन करें। जैसे, पहला यह समझ लेना कि क्या मेरा है और क्या तुम्हारा है? अर्थात् संपत्ति का अधिकार। और दूसरा - यह सुनिश्चित करना कि जो कोई उन अधिकारों का पालन न करे अर्थात जो चोरी करे, वह सजा पाये तथा वह चोरी का सामन उसके आधिकारिक स्वामी को वापस कर दिया जाय। यानि कि बाजार अर्थव्यवस्था का आधारभूत नैतिक नियम है - आपको चोरी नहीं करनी चाहिए। संपत्ति के अधिकारों का प्रवर्तन (लागू करना) सरकार का आधारभूत कानून एवं आवश्यक दायित्व होना चाहिए। भारत का समाजवादी संविधान नागरिकों के संपत्ति के अधिकार की गारंटी नहीं देता। समाजवादी कानून विधि सम्मत लूट (अर्थात राष्ट्रीयकरण, किराया नियंत्रण एवं भूमि का पुनर्वितरण) में रत रहता है।

जारी है..

साभारः उदारवादः राज, समाज और बाजार का नया पाठ

लेखकः सौविक चक्रवर्ती, अनुवादकः कौशल किशोर