बच्चों के कंधो पर माओवादियों की बंदूक

दुनियाभर के माओवादियों का मानना है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।लेकिन शायद माओवादी नेताओं को बंदूक थमाने के लिए पर्याप्त बालिग शूरमा नहीं मिल रहे हैं इसलिए वेबच्चों को बंदूक थमाकर सत्ता पाना चाहते हैं।लेकिन दुर्भाग्य से माओवादी प्रभावित  इलाकों में  जिन बच्चों को इस उम्र में स्कूल में होना चाहिए था वे वे माओवादी क्रांतियुद्ध के सैनिक बनकर क्रांतियुद्ध लड़ रहे हैं।खेलने कूदने और ढ़ने लिखने की  उम्र में उनमें से कई खूंख्वार और दुस्साहसी बन चुके हैं।

हाल ही में  संयुक्त राष्ट्र महासचिव की बच्चे और सशस्त्र संघर्ष पर सुरक्षा परिषद में पेश की गई रपट में कहा गया है कि नक्सली अपने संगठन में बच्चों को भर्ती कर उन्हें माओवाद का पाठ पढ़ा रहे हैं। जनता के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए वे बाल दस्ता और बालसंघम तैयार कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और उससे जुड़े राज्यों के कुछ जिलों में नक्सलियों द्वारा बच्चों की भर्ती और उनका इस्तेमाल किए जाने की सूचना प्राप्त हुई है।

इससे पहले भी  महासचिव बन की मून ने भारत में लंबे समय से चल रहे माओवादी संघर्ष में बच्चों के इस्तेमाल पर खरी-खरी बात की थी। उन्होंने यहं के माओवादी संघर्घ में बच्चों के इस्तेमाल की ओर दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश की थी।उन्होंने आरोप लगाया था कि माओवादी लड़कों और लकड़कियों को अपनी सेना मे भर्ती कर अपने संघर्ष में उनका उपयोग कर रहे हैं। माओवादी संघर्ष में बाल सैनिकों के इस्तेमाल का मामला जब संयुक्त राष्ट्र संघ में उठा तो भारत की बहुत किरकिरी हुई।

यह मामला भले ही सर्वोच्च अंतर्राष्ठ्रीय संस्था में उठता रहा हो  लेकिन माओवादी लंबे समय से भारतीय राज्य के खिलाफ अपने युद्ध में बच्चों का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आ रहे हैं। माओवादी पार्टी ने अपने पिछले अवतार पीपुल्स वार ग्रुप के समय भी बच्चों की अलग टुकड़ियां बनाई थीं।उसका नाम बाल संघम रखा गया था। दरअसल 2002 में कई जगह नक्सलियों की ओर से बच्चों की सेना में भर्ती की खबरें छपीं थीं।उस समय छत्तीसगढ़ के तांडा और बाध नदियों के आसपास रहनेवालों ने अपने बच्चों को बाहर भेजना शुरू कर दिया था। उस समय नक्सलियों ने कहा था कि हर परिवार का एक बच्चा उनकी टुकड़ी में शामिल होना चाहिए। उन्हीं दिनों एक खबर भी आई थी कि नक्सली झारखंड के पालामू के जंगलों में लड़कों और लड़कियों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। लेकिन आजकल माओवादी प्रभावित हर राज्य में माओवादी बच्चों की भर्तियां कर रहे हैं।उन्होंने बाल सैनिकों की अलग टुकड़ियां बना रखीं हैं।किसी राज्य में उसका नाम बालसंघम है तो किसी राज्य में बाल मंडल।कहीं बालक संघम तो कहीं शिशु संघ। उनमें केवल लड़नेवाले सैनिक ही हों ऐसा नहीं । इन टुकड़ियों में भर्ती किए गए बच्चों का पहले सैद्धांतिक शिक्षा के जरिये ब्रेनवाश किया जाता है जिससे उनमें वर्गशत्रुओं और बुर्जुआ व्यवस्था के प्रति नफरत पैदा हो। इसके बाद उन्हें पुलिस और सशस्त्र बलों की ही नहीं तो अपने मां –बाप और रिश्तेदारों की जासूसी करने की ट्रेनिंग दी जाती है।12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को हथियार चलाने की  ट्रेनिंग दी जाती है । अच्छा प्रदर्शन करनेवालों को बाद में बारूदी सुरंगें बिछाने और उन्नत हथियार चलाने का का प्रशिक्षण दिया जाता है। जो लड़के माओवादियों की गुरिल्ला टुकड़ियों में होते हैं जिन्हें दलम कहा जाता है वे सुरक्षा बलों के खिलाफ लड़ते हैं।

मानव अधिकारों के लिए संघर्ष करनेवाली ह्यूमन राइटस् वाच नामक संस्था ने 2008 में –बिइंग न्यूट्रल इज बिगेस्ट क्राइम –नाम से एक रपट तैयार की थी।इसमें विस्तार से बताया गया था कि किस तरह छत्तीसगढ़ में चल रहे माओवादी संघर्ष में बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है।पशिचम बंगाल में सलवा जुडुम के तर्ज पर बनी –माओवादी दमन सेना ने नक्सल प्रभावित इलाकों में पर्चा बांटा था कि वे माओवादी नेता किशन जी की पूजा करते हैं लेकिन किशनजी उनके बच्चों को हत्यारी मशीन बना रहे हैं।

माओवादियों की हमदर्द मानी जानेवाली अरुंधति राय ने माओवादियों के निमंत्रण पर कुछ दिन उनके बीच रहने के बाद जो लंबी रपट लिखी थी उसमें भी माओवादियों द्वारा बच्चों के इस्तेमाल के कई उदाहरण थे।उसमें मंगतू नामक लड़के का जिक्र है जो गुरिल्ला सेनाओं और पास के शहरों के बीच संदेशवाहक का काम करता है। इसके बाद आता है चंदू जो उससे थोड़ा बड़ा होता है।वह माओवादियों की गुरिल्ला सेना का हिस्सा है।चंदू एलएमजी छोड़कर सारे हथियार चलाना जानता है। रपट में कमला नामक लड़की का जिक्र है। वह कंधे पर राइफल और कमर में रिवाल्वर बांधे हुए थी। माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की हार्ड कोर सदस्य है।वह कई मुठभेड़ों में भाग ले चुकी है। कमला की उम्र केवल सतरह साल है। इसका मतलब है जब वह नक्सलियों की सेना में शामिल हुई होगी तब 12-13 साल रही होगी। अरुधंति राय एक जगह कामरेड माधव से मुलाकात का जिक्र करती हैं जो नौ साल की उम्र में नक्सलियों के साथ शामिल हुआ और आज पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का कमांडर बन चुका है।ये सभी उदाहरण बताते हैं कि नक्सलियों के लिए बच्चों का युद्ध में इस्तेमाल ,उन्हें हथियारों की ट्रैनिंग देकर गुरिल्ला दलों में शामिल करना बहुत आम बात है। इस पर वे लंबे समय से अमल करते रहे हैं। माओवाद के कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि माओवादियों की मौजूदा 60 हजार संख्यावाली पीएलजीए नामक गुरिल्ला सेना ऐसे बच्चों,किशोरों और कम उम्र के युवाओं से बनी है। यह बात अलग है कि जो कभी बाल या किशोर थे वे अब युवा बन चुके हैं और बड़े पदों पर हैं। लेकिन ये कम उम्र में ही भर्ती हुए थे। इस बात के प्रमाण नहीं है कि बालिग आदिवासी बड़े पैमाने पर स्वयं माओवादियों की सेना में शामिल हुए हों।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये बच्चे माओवादियों की सेना में शामिल कैसे हो जाते हैं। । इसके कई कारण बताए जाते हैं। पहले इस तरह की खबरें आतीं रही हैं कि नक्सलवादी बच्चों को जबरन उठा ले जाते हैं।लेकिन नक्सल मामलों के जानकार भी बताते हैं कि गरीबी भी एक बहुत बड़ा कारण है। माओवादी जिन इलाकों में सक्रिय हैं वे अत्यंत गरीब और पिछडे इलाके हैं।वहां भुखमरी का बोलबाला है।इस पर आदिवासी बच्चे अनपढ़ होते हैं।उनके लिए रोजगार के अवसर कम ही होते हैं। ऐसे में माओवादियों की गुरिल्ला सेना में शामिल होने पर उन्हें कम से कम खाने पीने के लिए पर्याप्त भोजन मिलने लगता है। माओवादी उनकी जरूरतों का पूरा-पूरा लाभ उठाने से नहीं चूकते।

माओवादियों एक और हमदर्द बुद्धिजीवी गौतम नौलखा ने माओवादियों के प्रभुत्ववाले इलाकों का उनके निमंत्रण पर दौरा किया था। अपनी रपट में उन्होंने लिका है –माओवादी समय –समय पर पर्चे बांटकर लोगों को अपनी सेना में भर्ती करते हैं।ऐसे ही एक पर्चे में बेरोजगार युवक युवतियों को संबोधित करते हुए कहा गया है – आपको वेतन तो नहीं मिलेगा लेकिन जनता सरकार आपके खाने कपड़ों और  व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करेगी और आपके परिवार की मदद करेगी।

माओवाद के मुद्दे पर अपनी बेबाक राय के कारण जाने जाने वाले प्रोफेसर निर्मलाषु मुखर्जी ने माओवादियों द्वारा की जा रही बच्चों की भर्ती के बारे में बहुत तीखी टिप्पणी की है। वे कहते हैं –ऐसा लगता है कि भारतीय राज्य और माओवादी नेताओं ने मिलकर यह साजिश रची है कि आदिवासियों के बच्चों के एक समूह को सामान्य बचपन न मिल पाए। ये बच्चे कभी स्कूल नहीं गए।उन्होंने कभी जंगल के बाहर की जिंदगी को नहीं जाना।उन्हें कभी भारतीय समाज के बहुलतावादी चरित्र की झलक भी देखने को नहीं मिली,कभी ऐसा हुनर भी सीखने को नहीं मिलाकि वे भागीदार नागरिक बन सकें।उन्हें कभी खुद अपना दिमाग नहीं बनाने दिया गया।वे कुल मिलाकर इतना जानते हैं कि बारूदी सुरंगे कैसे बिछाई जाएं।कैसे राइफल को साफ किया जाए और दागा जाए।कैसे मुठभेड़ की जाए, मारा जाए। वे ही सबसे आगे के मोर्चे पर होते हैं इसलिए पुलिस,ग्रेहाउँड ,सीआरपीएफ और विशेष अभियान सेनाएं उन्हीं की घेराबंदी करती हैं।वही तो घायल होते हैं ,वे ही मारे  जाते हैं।

-सतीश पेडणेकर