अजंता, ऐलोरा बनाम गारमेंट्स शॉप्स में सजे पुतले

देश की आर्थिक राजधानी व बड़े महानगरों में एक मुंबई को अन्य महानगरों की तुलना में मानसिक रूप से अधिक खुला और महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग भी प्रदेश की अन्य विशेषताओं के साथ-साथ अजंता और ऐलोरा की गुफाओं और उसकी चित्रकला व शिल्पकला पर भी बड़ा फक्र करते हैं। अजंता और ऐलोरा की ये वही गुफाएं हैं जिनमें प्रदर्शित नग्न और अर्द्धनग्न चित्रकलाओं और शिल्पकलाओं को सदियों से कला के उत्कृष्ट नमूने के तौर पर देखा गया है। यहां तक कि अधिकांश चित्रों और शिल्पों की छवियों को वात्स्यायन के कामसूत्र में कामकलाओं की सटीक व्याख्या करने के लिए भी उपयोग में लाया गया है।

इसके बावजूद आजतक किसी ने इन चित्रकलाओं के अश्लील होने और इसलिए इसपर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं की। लेकिन इसी महाराष्ट्र के सबसे बड़े शहर मुंबई से एक ऐसी मांग उठी है जो न केवल हास्यास्पद है बल्कि चकित कर देने वाली भी है। मुंबई में एक राजनैतिक दल की महिला पदाधिकारी ने शहर के तमाम रेडिमेड गारमेंट्स शॉप्स पर डिस्प्ले के लिए रखे (मेनिक्विन्स) पुतलों को अश्लील बताते हुए इनके प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। महिला पदाधिकारी का मानना है कि अंतःवस्त्रों के साथ प्रदर्शित ये पुतले शहर में अश्लीलता को फैलाने में मदद कर रहे हैं और महिलाओं के साथ होने वाले छेड़छाड़ व यौन अपराधों को बढ़ावा देने में इन पुतलों की बड़ी भूमिका है।

मजे की बात यह है कि उक्त महिला पदाधिकारी की मांग को नगर निगम द्वारा बतौर प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया गया है और आने वाले दिनों में इसपर चर्चा भी होने वाली है। इसे दुर्भाग्यपूर्ण और मानसिक दिवालियेपन की संज्ञा ना दी जाए तो और क्या? मान लीजिए कि मुंबई नगर निगम द्वारा रेडिमेड गारमेंट्स शॉप्स पर ऐसे पुतलों के प्रदर्शन पर रोक लगाने की इस मांग को मान ही लिया जाए तो क्या गारंटी है कि यह मांग यहीं समाप्त हो जाएगी। अभी पुतलों पर प्रतिबंध की मांग है कल शहर भर में ऐसे परिधानों को एंडोर्स करने वाली होर्डिंगों पर प्रतिबंध की मांग नहीं उठेगी। इस बात की क्या गारंटी है कि शहर भर के पार्कों और उद्यानों में रखी उन कलाकृतियों का क्या जिन्हें संकुचित मानसिकता के लोग कला की बजाए अश्लीलता के पैमाने से नहीं मापा जाएगा। क्या चित्र प्रदर्शनियों को अश्लील कह प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग नहीं उठेगी। धीरे धीरे अजंता ऐलोरा की चित्रकलाओं और शिल्पकलाओं पर रोक की मांग नहीं उठेगी। यह मांग कहां जाकर थमेगी इसकी कोई सीमा नहीं है। क्या यह मांग हमें पर्दाप्रथा की तरफ दोबारा ले जाने का काम नहीं करेगी।

इसके अलावा यह भी समझना चाहिए कि प्रतिबंध किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि स्वयं एक समस्या है। इतिहास गवाह रहा है कि प्रतिबंध चाहे जिस भी चीज पर लगाई गई हो वह समाज में न केवल उतनी ही आसानी से मौजूद रहती है बल्कि उसके दुष्परिणाम भी और अधिक बढ़ जाते हैं। विभिन्न राज्यों में सिगरेट, तंबाकू, शराब, पॉलीथीन आदि पर प्रतिबंध के उदाहरण को ही ले लीजिए। सबको पता है कि जिन जिन राज्यों में इन वस्तुओं पर प्रतिबंध है, उन उन राज्यों में इसकी उपलब्धता, प्रयोग और दुष्परिणाम पहले की अपेक्षा बढ़ गई है।

कितना ही अच्छा होता कि राजनैतिक दल विशेष द्वारा दुकानों में पुतलों के प्रयोग पर सरकारी प्रतिबंध लगाने की मांग किए जाने की बजाए उनके प्रति समाज व व्यवसायी वर्ग में जागरुकता फैलाने का काम किया जाता। यदि उनकी बात में दम है और ग्राहक भी इस बात से सहमति जताते कि पुतलों को देख वे सहज महसूस नहीं करते तो कोई कारण नहीं है कि दुकानदार ऐसे पुतलों को अपने दुकान में रखते। वैसे भी दुकानदारों का एकमात्र प्रयास ग्राहकों को ज्यादा से ज्यादा आकर्षित करना और अपना माल बेचना होता है। दुकानदारों को यदि लगता है कि ग्राहक पुतलों के प्रति आकर्षित होने के स्थान पर उनको नापसंद करते हैं तो वे जरूर डिस्प्ले से ऐसे पुतलों को हटा लेते।

 

- अविनाश चंद्र