मनमोहन सिंह से महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों की उम्मीद मत कीजिए

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब वित्तमंत्री भी बन गए हैं। उनका वित्तमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल(1991-96) आर्थिक सुधार का महत्वपूर्ण कालखंड़ था जिसने भारत को अंतर्राष्ट्रीय भिखारी से संभावित महाशक्ति में बदल दिया। क्या मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल में भी वैसे ही साहसिक सुधार देखने को मिलेंगे?

इसके आसार नहीं हैं। मनमोहन सिंह आठ वर्ष तक प्रधानमंत्री के तौरपर बिल्कुल शक्तिहीन रहे हैं। यह सब उनके वित्तमंत्री बनने के बाद बदल नहीं जाएगा क्योंकि वास्तविक सत्ता तो सोनिया गांधी के हाथों में है।

उनकी आर्थिक सुधारों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। - उनका जोर हमेशा जनकल्याण और सब्सिडियों पर रहा है। उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने नीतियों की दिशा के निर्धारण में प्रधानमंत्री के मुकाबले कुछ एनजीओ को ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है। उनका मानना है कि चुनाव आर्थिक विकास से नहीं जीते जा सकते।वरन जनकल्याणकारी योजनाओं (जैसे मनेरगा),खैरात बांटने(2008 की कृषि ऋण माफी) या रोजगार में आरक्षण से जीते जाते हैं। वह मानती हैं कि इस रणनीति ने उन्हें 2009 में दोबारा चुनाव जिताया और उसे बदलने में उन्हें कोई तुक नजर नहीं आता।

वे उनके सलाहकार जिन्हें सामूहिक रूप से 10 जनपथ कहा जाता है सारे महत्वपूर्ण फैसले करते हैं। मनमोहन प्रस्ताव ऱख सकते हैं लेकिन सोनिया उसे स्वीकार नहीं करती। कांग्रेस गाधी परिवार की जागीर है इसलिए उसके सदस्य मनमोहन सिंह को ज्यादा महत्व नहीं देते। वे उन्हें केवल संक्रमण काल का नेता मानते हैं जो गांधी परिवार के राजकुमार  राहुल गांधी के सिंहासन पर बैठने  के लिए जमीन तैयार कर रहे है।

सिंह यह कम महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर खुश हैं। इस दृष्टि से उन्हें प्रधानमंत्री के बजाय राज प्रतिनिधि कहा जाना चाहिए। जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं वे प्रधानमंत्री द्वारा अपनी बात मुखरतापूर्वक नही कहे जाने से दुखी होते हैं। लेकिन सोनिया बिल्कुल ऐसा ही राज-प्रतिनिधि चाहती है जो मुखर नहीं हो। यही कारण है कि वे इतने समय तक प्रधानमंत्री पद पर बनें हुए हैं।

विश्लेषक सवाल करते हैं कि क्या मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के साथ वित्तमंत्री भी बन जाने पर आक्रामक तरीके से सुधार लागू करेंगे। ? पीएमओ के अंदरूनी लोग आपको बताएंगे कि पिछले आठ वर्षों में सिंह ने आर्थिक सुधारों को लागू करने के लिए बहुत जोर लगाया लेकिन 10 जनपथ ने उन्हें खारिज कर दिया। समस्या यह नहीं है कि मनमोहन सिंह में पास दृष्टि या उत्साह की कमी है वरन उनके पास राजनीतिक शक्ति नहीं है।

जब वे 1991 -96 तक वित्तमंत्री थे तब बात बहुत अलग थी। प्रधानमंत्री नरसिंहाराव ने व्यक्तिगत तौरपर  अराजनीतिक नौकरशाह को वित्तमंत्री बनने के लिए चुना था और जब भी जरूरत पड़ी उनका सहयोग किया।उद्य़ोग मंत्रालय स्वयं नरसिंहाराव के पास में था इस बूते उन्होंने औद्योगिक लाइसेंसिंग और मोनोपाली क्लिियरंस की व्यवस्था को खत्म कर दिया था। ये 1991 के सबसे नाटकिय आर्थिक सुधार थे न कि मनमोहन सिंह के अवमूल्यन और आयात शुल्क कटौती।

राव की आर्थिक सुधार लाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन सावधानी के तौरपर वे मध्यमार्ग की बात करते थे। लेकिन सोनिया उदारीकरण को लेकर उत्साही नहीं हैं। यही कारण है कि मनमोहन सिंह  तब प्रभावशाली थे लेकिन आज नहीं हैं।

कुळ आर्थिक स्थिति भी अब अलग है। 1991 में भुगतान संतुलन की हालत खस्ता थी और हमें अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था।भारत  को समाजवादी नियोजन की प्रेरणा देनेवाला सोवियत संघ ढह रहा था इसलिए आर्थिक सुधार जरूरी लगने लगे थे। सिंह खुद कहते हैं कि 1991 में तब देश में संकट था तब उनके पास काम करने की ज्यादा गुंजाइश थी लेकिन जब अर्थव्यवस्था की हालत सुधर गई है तो वह गुंजाइश खत्म हो गई।

आज कोई संकट नहीं है। यह सही है कि विकास दर 8.4 से घटकर 6.5 रह गई है। लेकिन वह दुनिया की सबसे ज्यादा विकास दर है।विदेशी मुद्रा भंडार काफी अच्छा 280 अरब डालर है।

औद्योगिक विकास दर नाटकीय ढंग से कम हुई है रूपये में गिरावट आई है।

इससे अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। विदेशी निवेशक विदेशी निवेश कानून में लगातार सुधार न होने और वोडाफोन के मामले में रिट्रोस्पैक्टीव टैक्स लागू किए जाने से नाराज हैं। इसके बावजूद 2012 मे विदेश प्रत्यक्ष निवेश और पोर्टफोलियो निवेश  की आवक काफी रही।

समस्याएं तो बहुत सारी हैं लेकिन संकट नहीं है। और जब संकट नहीं होता तो अर्थशास्त्र पर राजनीति जीत जाती है।

कुछ छोटे आर्थिक सुधार संभव हैं।कई मुख्यमंत्री मल्टी ब्रांड में विदेशी निवेश के पक्ष में हैं। तो उसे लागू किया जा सकता है। लेकिन कोई भी प्रमुख सुधार जैसे पैट्रोल पदार्थों या यूरिया का विनियंत्रण संभव नहीं है।

कांग्रेस उत्तर प्रदेश,तमिलनाडु, बिहार,पंजाब में चुनाव हार चुकी है।आंध्रप्रदेश में उसे नई क्षेत्रीय पार्टी के हाथों मुंहकी खानी पड़ी है। उसे डर है कि उसके अविश्वसनीय सहयोगी दल उसकी सरकार 2014 से पहले गिरा सकते हैं।

इसलिए सोनिया और 10 जनपथ सुधारों के बजाय अपना अस्तित्व बचाने में लगे है। इसलिए वे सुधारों की जोखिम नहीं लेना चाहते जो लंबे समय के विजेता पैदा करते ।चूंकि चुनाव 1-2प्रतिशत के पाला बदलने से जीते या हारे जाते हैं इसलिए उद्देश्यपूर्ण सुधारों की तुलना में कुछ भी न करना कम जोखिमभरा लगता है।

इसलिए आर्थिक नीतियों के मामले में जड़ता भटकाव नहीं है यह राजनीतिक नीति है। मनमोहन सिंह के वित्त मंत्रालय की बागडोर संभालने से वह नहीं बदलने वाली।

- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर