न बोलने का नतीजा

जिस दिन सरकार ने डीजल के दाम बढ़ाए, मैंने बड़े ध्यान से ‘आम आदमी’ की प्रतिक्रिया टीवी के समाचार चैनलों पर सुनी। सुनने के बाद इस निर्णय पर पहुंची हूं कि सोनिया-मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी गलती अगर है, तो वह यह कि उन्होंने जनता को कभी नहीं बताया कि आर्थिक सुधार अनिवार्य क्यों हो गए थे। इस देश के आम आदमी को 1991 में नहीं बताया कि अगर वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने उस समय आर्थिक दिशा न बदली होती, तो संभव है कि कंगाली की नौबत आ जाती। यह नहीं बताया कभी कि पिछले दो दशक में जो खुशहाली भारत में फैली वह मुमकिन न होती अगर अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि तीन फीसद से बढ़ कर नौ फीसद तक न पहुंचती। आर्थिक सुधारों के कारण।

चुपके से सुधार लाए गए थे तो जनता आज तक नहीं समझ पाई है क्या हुआ था और क्यों। इसलिए जिन लोगों से टीवी पत्रकारों ने डीजल के दाम बढ़ने के बाद बातें की, उन सबने एक तरफ तो महंगाई की शिकायत की और दूसरी तरफ यह भी कहा कि अर्थव्यवस्था में मंदी आने से बेरोजगारी बढ़ गई है। दोष थोपा प्रधानमंत्री के सिर और चूंकि प्रधानमंत्री की आदत है चुप रहना, वे चुप ही रहे। बोलने की आदत डाल लिए होते अभी तक तो टीवी पर डट कर न कहते कि सरकारी तेल कंपनियां साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए का दैनिक घाटा नहीं बर्दाश्त कर सकती हैं।

साथ-साथ कह सकते थे कि देश का आर्थिक हाल बेहतर तभी हो सकेगा जब आर्थिक सुधारों का नया दौर शुरू किया जाए। वरना अर्थव्यवस्था का जैसे-जैसे वार्षिक वृद्धि का दौर गिरता रहेगा, बेरोजगारी बढ़ेगी। अर्थशास्त्री अनुमान लगाते हैं कि इस वर्ष जो जीडीपी की वृद्धि 7.5 फीसद से गिर कर 5 फीसद से कम हुई है उससे तीन करोड़ नौकरियां कम हुई हैं। यह बात अगर देश के आम आदमी को समझ में आती तो अपना समर्थन आर्थिक सुधारों को नहीं देता क्या?

प्रधानमंत्री की समस्या यह है कि अगर वे खुल कर बातें करने लगेंगे तो उनको यह भी कहना होगा कि पिछले तीन वर्षों में देश की आर्थिक दिशा उन्होंने सोनिया गांधी के कहने पर गढ़ी थी। सोनिया जी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति में बिल्कुल उस विचारधारा के लोग बैठे हैं जो कभी इंदिरा गांधी के इर्दगिर्द मंडराया करते थे और गरीबी हटाने के नाम पर ऐसी आर्थिक नीतियां बनाते थे, जिन्होंने गरीबी हटाने के बदले देश को गरीब कर डाला था।

याद कीजिए वह जमाना जरा। टेलीफोन कनेक्शन सिर्फ उन लोगों को मिलता था जिनकी दोस्ती किसी सरकारी अफसर के साथ होती थी। मुझे याद है कि दिल्ली में गैस के सिलेंडर भी उन्हीं को मिलते थे जिनके पास सिफारिश के जरिए थे। जो किसी आला अधिकारी या किसी सांसद को नहीं जानते थे उनको तो ऐसी चीजें मिलने का सवाल ही नहीं होता था। आज अगर तीस करोड़ से ज्यादा भारतीय मध्यवर्ग में गिने जाते हैं और नब्बे करोड़ भारतीयों के पास सेलफोन हैं तो सिर्फ इसलिए कि नब्बे के दशक के बाद आर्थिक दिशा बदल दी गई थी।

पिछले दो-तीन वर्षों में फिर से बदल गई है। वही लाइसेंस कोटा राज आ गया है वापस चुपके से। पहला कदम उठाया था इस दिशा में पर्यावरण मंत्री ने 2010 में कई योजनाओं को एक दस्तखत से रोक कर। मंत्री ने जब कुछ ज्यादा ही नुकसान किया तो उनको किसी दूसरे मंत्रालय में भेज दिया गया, लेकिन उनकी जगह जो मंत्री बनीं है उन्होंने भी रुकावटों को हटाने का काम नहीं किया है, सो नौ सौ से ज्यादा योजनाएं रुकी पड़ी हैं, पांच सौ लाख करोड़ रुपए का निवेश? कहां से पैदा होंगी नौकरियां। कहां से आएगी खुशहाली?

प्रधानमंत्री अगर थोड़ा-सा गर्व करते उन आर्थिक सुधारों पर जो वे खुद लाए थे तो शायद जनता को उस दिशा में साथ लेकर चलते जिस पर भारत का जाना जरूरी है। थोड़ी-सी ईमानदारी से अगर बताते इस देश के आम आदमी को कि अर्थव्यवस्था में उदारीकरण आने के बाद देश के उद्योगपतियों ने नेतृत्व किया है निवेश लाने में भी और देश को खुशहाल बनाने में भी तो शायद आज वही पुराना माहौल न वापस आता जिसमें उद्योगपति खलनायक माने जाते थे।

खैर, अब जो हो गया सो हो गया है। अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है, आम आदमी का बुरा हाल होता जा रहा है। भारतीय उद्योग का बुरा हाल है, लाइसेंस राज के लौटने के आसार साफ दिख रहे हैं और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जनता में आक्रोश और निराशा बढ़ती दिख रही है। प्रधानमंत्री पर तो दोष लग ही रहा है, लेकिन साथ-साथ दोष सोनियाजी और उनके सुपुत्र पर भी लगना शुरू हो गया है अब। लाभ मिलेगा किसी को तो उन राजनीतिक दलों को, जो आर्थिक मंडी का फायदा उठा कर 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में लग चुके हैं। प्रधानमंत्री की खामोशी ने और सोनिया जी के आर्थिक सोच ने नैया डुबो दी है कांग्रेस पार्टी की।

तवलीन सिंह
सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभ लेखक
(जनसत्ता से साभार)