महात्मा गांधी और उनका आर्थिक दर्शन

पुण्यतिथि विशेष

महात्मा गांधी गाँवों को राष्ट्रीय उत्पादन की सबसे छोटी इकाई के रूप में देखते थे। महात्मा गांधी ने अपने दर्शन को व्यापक जनमानस तक पहुंचाने के लिए अध्यात्म से जोड़ा और राम राज्य का नाम दिया। गांधी के राम राज्य की परिकल्पना में गाँवों का संचालन लोकतांत्रिक तरीके से किये जाने की बात कही जाती थी, जहां शासक लोगों के हित के लिए काम करता था। सभी को समान अवसर प्रदान किए जाते थे, हिंसा की कोई जगह नहीं थी और जहाँ सभी धर्म और मान्यताओं का आदर किया जाता था। गांधी स्पष्ट करते थे कि “मैं उस राम में आस्था नहीं रखता हूं जो रामायण में है, मैं उस राम में आस्था रखता हूं जो मेरे मन में है।”

महात्मा गांधी जिस भारत की कल्पना करते थे उस भारत में पंचायतों को स्वावलंबी बनाने पर जोर दिया गया था। गांधी जी का मानना था कि भारत की आत्मा शहरों में नहीं बल्कि अपने 7 लाख गाँवों में बसती है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता निचले स्तर से आरंभ होनी चाहिए। उन्होंने नए सिद्धांतों का आविष्कार नहीं किया बल्कि उन्होंने भारत की महान सभ्यता से बस पुनः अवगत कराया था।

भूमंडलीकरण के इस दौर में मानव के रहन सहन और कार्य पद्धति में बदलाव आया है। इसलिए आज के माहौल में गांधी जी के विचार खोते जा रहे हैं और उनकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गांधीजी का कहना था कि “अर्थ पक्ष और नैतिक पक्ष एक दूसरे के पूरक है, अर्थात आर्थिक प्रतिस्पर्धा में हमें अपनी नैतिकता को भूलना नहीं चाहिए क्योंकि प्रकृति के नियम पूर्ण सत्य हैं, परंतु आर्थिक नियम समय व स्थान के साथ बदलते रहते हैं।”

गांधीजी का मानना था कि भारत की सभी समस्याओं का समाधान ‘अहिंसा’ में छिपा है। वे उन सभी अहिंसक आजीविकाओं के समर्थन में थे जो घृणा और शोषण के विरुद्ध थे।
गांधीजी विकेंद्रीकृत उद्योगों के पक्षधर थे। उनका मानना था कि केंद्रीकृत औद्योगीकरण समस्त सामाजिक राक्षसों की जननी है। गांधीजी ने विकेंद्रीकृत उद्योगों का समर्थन किया क्योंकि उनका मानना था कि विकेंद्रीकृत उद्योगों में शोषण ना के बराबर होगा। चूँकि भारत एक श्रमिक प्रधान देश है और उस वक़्त पूंजी का अभाव था तो ऐसे में श्रम धनिक तकनीक का इस्तेमाल होना चाहिए। ये सिद्धांत आज के समय में प्रासंगिक नहीं लगते हैं परंतु यह उस समय की बात है जब भारत में बेरोजगारी तथा भुखमरी बहुत बड़े स्तर पर थी। उस वक़्त की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों को सप्ताह में एक बार उपवास करने की सलाह दी जाती थी ताकि सभी लोगों को भोजन उपलब्ध हो सके।

इसके साथ ही भारत में बेरोजगारी को देखते हुए उन्होंने खादी ग्राम उद्योग को बढ़ावा देने की बात भी कही। गांधीजी का कहना था कि “खादी एक वस्त्र नहीं, खादी एक विचार है”। गांधी जी खादी को भारत की आर्थिक स्वतंत्रता तथा एकता का प्रतीक मानते थे। गांधीजी का खादी उद्योग को बढ़ावा देने के पीछे तर्क था कि खादी उद्योग भारत के सभी लोगों को रोजगार दिला सकता है तथा भारत को आर्थिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र बना सकता है। इसीलिए गांधी जी ने चरखा को एक उपकरण के रूप में चुना जो सस्ता, कम पूंजी पर चलने वाला तथा सभी घरों में आसानी से इस्तेमाल हो सकता था। गांधीजी का मकसद भारत के हर एक घर को उत्पादन की एक इकाई में बदलना था। इससे भारत एक आत्मनिर्भर राष्ट्र के साथ-साथ पूरी दुनिया का एक विनिर्माण केंद्र बन सकता था।

गांधीजी भारत की आर्थिक स्वतंत्रता को निचले स्तर से शुरू करना चाहते थे, इसके लिए गांधीजी ने ‘ग्राम सर्वोदय’ का नारा भी दिया ताकि गांव अपना उद्धार खुद कर सके तथा ‘सर्वोदय- सभी के उदय’ की अवधारणा प्रस्तुत हो। भारत के संविधान में ग्राम पंचायतों का गठन इसी विचारधारा से  प्रेरित है।

गांधीजी के विचार पूरे विश्व की सभी अन्याय विरोधी लड़ाइयों का नेतृत्व करते दिखाई पड़ते हैं। चाहे वह मिस्र का मेडिसन स्क्वायर हो, पोलैंड की एकजुटता की लड़ाई हो, सोवियत संघ में टैंकों को गुलाब का फूल देना हो, मार्टिन लूथर किंग की रंगभेद के खिलाफ की लड़ाई हो तथा हाल ही में ईरान में सोशल साइट्स की पाबंदी की लड़ाई हो। जब कभी भी आप अपने आप को अन्याय से घिरा पाए और आप सही हों तो गांधीजी के विचार आपके जीवन में एक हथियार की तरह काम आएंगे।

गांधीजी के आर्थिक विचारों में मानवता सर्वोपरि स्थान ग्रहण करती है। सकल घरेलू उत्पाद तथा विकास संबंधी अन्य सुचिकांक तभी तक मायने रखते हैं जब तक उनसे जन-कल्याण का लक्ष्य पूरा हो सके। गांधी जी एक राष्ट्र, एक युवा, एक नागरिक, एक किसान, एक छात्र को शून्यता की वरीयता से अवगत कराते हैं जिसका एकमात्र उद्देश्य मानवता की सभी परम सीमाओं को लांघकर एक आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है।

- आजादी.मी