सुविधाओं के बंगले

देश का राजनीतिक नेतृत्व आदर्शों की दुहाई देता फिरता है लेकिन अपनी सुविधाओं का मोह नहीं छोड़ पाता। आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में बताया गया है कि 22 ऐसे पूर्व मंत्री हैं, जिनका अभी भी सरकारी बंगले पर कब्जा है। इनमें से पांच मंत्री ऐसे हैं, जिन्होंने सितंबर 2012 में ही अपना पद छोड़ दिया था। बंगले पर कब्जा जमाने वालों में कांग्रेस, टीएमसी, आरजेडी और डीएमके के नेता शामिल हैं। हां, इनमें से लालू यादव के अनुरोध पर सरकार ने उन्हें एक साल तक मंत्री वाले बंगले में रहने की इजाजत दे दी है। लेकिन और लोगों ने अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी है।
 
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 जुलाई, 2013 को आदेश दिया था कि किसी भी मंत्री के पद से हट जाने के एक महीने के बाद उसे अपना सरकारी बंगला खाली करना पड़ेगा। लेकिन नेताओं को उसकी परवाह नहीं है क्योंकि ये शायद इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि जब राजनीति में बड़े-बड़े सवालों पर उठापटक चल रही हो तो फ्लैट के मामले को कौन पूछता है। पहले भी जब-जब यह मुद्दा आया तो जन प्रतिनिधियों ने इसे हल्के तौर पर लिया या टाल दिया। अभी प्राय: ये सारे मंत्री चुनाव प्रचार में उतरे हुए हैं और जनता के सामने बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। अपने विपक्षियों पर तरह-तरह के आरोप भी लगा रहे हैं लेकिन उन्हें इसका अहसास नहीं है कि उन्होंने खुद नियमों की किस तरह अवहेलना की है।
 
असल में हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा पॉलिटिकल कल्चर विकसित हुआ है, जिसमें यह मानकर चला जाता है कि सिस्टम में जन प्रतिनिधि की विशिष्ट हैसियत है और उसे राजकीय संसाधनों के उपभोग का स्वाभाविक अधिकार मिला हुआ है। यह एक आम सोच है जो हरेक दल के नेताओं में पाई जाती है। आए दिन खबर आती है किसी नेता का लाखों का फोन बिल बकाया है तो किसी ने अपने बंगले की पुताई पर ही करोड़ों खर्च कर दिए। इसी तरह जन प्रतिनिधियों के विदेश दौरों पर भी खूब खर्च किया जाता है। राजनीतिक शुचिता की बहुत बात होती है पर क्या जनता के पैसे को इस तरह उड़ाना इसके दायरे में नहीं आता?
 
हमारे नेताओं के इसी व्यवहार के चलते जनता में राजनीतिक तबके से मोहभंग तेज हुआ है। शायद इसी को लक्ष्य कर कभी हिंदी के प्रख्यात कवि धूमिल ने राजनीतिक तबके को अपराधियों का संयुक्त परिवार कहा था। देश में जल्दी ही नई सरकार बनने वाली है। चाहे किसी भी पार्टी की गवर्नमेंट बने, वह इस मामले को गंभीरता से ले। जन प्रतिनिधियों को सहूलियतें जरूर मिलें पर उनका दुरुपयोग न हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि भावी सरकार एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत करेगी।
 
 
साभारः नवभारत टाइम्स