कृषि सुधार: जरूरी लेकिन पर्याप्त नहीं

वर्ष 1947 में भारत को एक विदेशी ताकत से राजनीतिक आजादी मिली थी और 1991 में भारत ने भारतीय राज्य से आर्थिक आजादी हासिल की। राजनीतिक आजादी के साथ सबको मताधिकार मिला और सभी नागरिक बराबर के भागीदार बने। बदकिस्मती से, 1991 में मिली आर्थिक आजादी का फायदा सभी नागरिकों को नहीं मिला। इसने मुख्य रुप से औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र को लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से मुक्ति दिलायी। आर्थिक सुधारों के दायरे में आबादी का एक बड़ा हिस्सा नहीं आया जो अपनी आजीविका औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र के बाहर कमाता था। भारतीय समाज के सबसे निचले तबके को किसी तरह की आर्थिक आजादी नहीं मिली।

बहुत सारे अर्थशास्त्रियों ने 1991 के आर्थिक सुधारों के लाभों के असमान बंटवारे का विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इंडिया को इसका लाभ मिला और भारत को नुकसान हुआ- शहरी इलाकों ने अच्छा प्रदर्शन किया और ग्रामीण इलाके पीछे छूट गए। यह कुछ हद तक सच है क्योंकि किसान ग्रामीण इलाकों में ही रहते हैं। सेवा और विनिर्माण के बड़े ग्रामीण और शहरी अनौपचारिक क्षेत्रों को इसका बहुत कम लाभ मिला- उनका लाइसेंस-परमिट-कोटा राज असल में बदतर हो गया। शहरी क्षेत्रों में बढ़ते विस्थापन से शहरी अनौपचारिक क्षेत्र पर और ज्यादा दबाव पड़ा। साफ तरीके से कहें तो यह कहानी इंडिया बनाम भारत की नहीं है, यह उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) वाले क्षेत्रों बनाम इसके लाभों से वंचित क्षेत्रों के बारे में है। आर्थिक सुधारों के लाभों में असमानता अलग-अलग नागरिक समूहों के बीच आर्थिक आजादी के स्तर पर असमानता से जुड़ी हुई है। जहां एलपीजी क्षेत्रों में अपनी आजीविका कमाने वाले लोगों को लाभ मिला, बाकी संघर्ष करते रहे।

किसान इंतजार करते रहे हैं। हालांकि हाल में पारित हुए तीन कृषि सुधार विधेयकों ने आखिरकार किसानों को आर्थिक आजादी दे दी। अब किसान सरकार के नियंत्रण वाली मंडियों के बाहर अपनी कृषि उपज बेच पाएंगे। तकनीकी रुप से हालांकि किसान हमेशा से अपनी फसल कहीं भी बेच सकते थे, कानून सरकारी मंडियों को छोड़कर बाकी सभी के उनकी कृषि उपज खरीदने पर रोक लगाता था। अनुबंध पर की जानी वाली खेती को मंजूरी दी गयी है और यह आश्वासन दिया गया है कि विरल स्थिति में आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए) लागू किया जाएगा। जहां इन अधिनियमों पर काम किया जा रहा था, सरकार ने पहले ही प्याज के लिए ईसीए लागू कर दिया। पुरानी आदतें मुश्किल से जाती हैं, भले ही वे बार-बार बेकार साबित क्यों न हों।

तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ कई दलीलें सामने आयी हैं। पंजाब ने तो इन कानूनों में संशोधन करने के लिए विधेयक भी पारित कर दिए। हमें लगता है कि इनमें से ज्यादातर दलीलें सही नहीं हैं। यह सच है कि इन सुधारों से किसानों की आय दोगुनी नहीं होने वाली। इसके बावजूद ये सुधार जरूरी हैं, हालांकि किसी भी तरह से पर्याप्त नहीं हैं।

सबसे पहले, बहुत सारे लोग यह दलील देते हैं कि ये कृषि कानून सरकार के अपना पल्ला झाड़ने की दिशा में उठाया गया महज पहला कदम है और वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था ही खत्म कर देगी। हालांकि इन कानूनों का एमएसपी की संरचना से कुछ लेना-देना नहीं है। असल में एमएसपी प्रशासन के हाथों लिया जाने वाला एक सालाना फैसला है। ऐसा कोई कानून नहीं है जो सरकार को एमएसपी की घोषणा करने के लिए बाध्य करता हो। भले ही कानून ऐसी जिम्मेदारी तय नहीं करता, सभी राजनीतिक दलों की सरकारें बिना किसी रुकावट के एमएसपी की घोषणा करती आयी हैं। राजनीतिक फैसला एमएसपी की राशि से जुड़ा हुआ है, ना कि एमएसपी की घोषणा करने से। हालांकि हमारा मानना है कि एमएसपी किसानों की मदद करने का सबसे बुरा संभव तरीका हैं। किसान हमेशा नेताओं की दया पर निर्भर रहते हैं जैसे कि एमएसपी की राशि क्या होगी, इसके दायरे में कौन कौन से फसल आएंगे, एमएसपी की घोषणा कब की जाएगी, एमएसपी पर असल में कितनी फसल खरीदी जाएगी आदि आदि। इसकी बजाए, देश को एक आय आधारित मदद की तरफ बढ़ना चाहिए।

दूसरी बात, कृषि कानूनों का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि इन सुधारों से किसानों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा क्योंकि महाराष्ट्र और बिहार जैसे कई राज्य पहले ही इस तरह की कोशिश कर चुके हैं और सही नतीजे हासिल करने में नाकाम रहे हैं। राज्य स्तर पर किए गए संशोधन अलग-अलग आकारों के हैं। उनमें से कई मंडी थोक बाजारों के संचालन की आजादी तो देते हैं लेकिन भारी जिम्मेदारियां लादते हैं जो किसी भी भावी उद्यमी को हतोत्साहित करती है। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र को ले लें जहां मंडी शुरू करने के लिए दो करोड़ रुपए का डिपॉजिट और 10 एकड़ का भूखंड चाहिए होता है। अब हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नयी मंडियां क्यों नहीं आयीं? राज्यों के कानून से राज्यों की सीमाओं के बाहर व्यापार खोलने की व्यवस्था नहीं हो सकती, इसलिए असर राज्य के अपने बाजार तक ही सीमित रहता है। बिहार में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए राज्य के कानून में किए गए सुधारों के बाद बाजार केवल बिहार ही बना रहता है। केवल एक केंद्रीय कानून ही सीमाओं के परे व्यापार को खोल सकता है। हमें सभी किसानों और सभी कृषि उपजों के लिए बाजार के तौर पर पूरा भारत चाहिए। एक राष्ट्रीय कृषि बाजार से बड़े रिटेल चेन आकर्षित होंगे, भंडारण क्षमता सुधरेगी एवं रसद सामग्री का प्रबंधन सुधरेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक भी पहुंच होगी।

तीसरी बात, कुछ लोगों की दलील है कि ये सुधार संघवाद के खिलाफ हैं। आजादी को संघवाद पर वरीयता मिलनी चाहिए। अगर मौजूदा राज्य कानूनों की तुलना में कोई संघीय कानून ज्यादा आजादी देता है, लोगों एवं व्यापारों के लिए ज्यादा अवसरों का सृजन करता है तो हमें इस तरह के संघीय कानून का हमेशा स्वागत करना चाहिए। लोगों की आजादी किसी भी राज्य के अधिकारों से बढ़कर है।
और चौथी बात इस दलील को लेकर है कि ये सुधार कृषक समुदाय को कॉरपोरेट के लालच और शोषण का शिकार बना सकते हैं। किसानों का आज मंडियों में फायदा उठाया जाता है। हम इन मंडियों को क्या कहेंगे? भाईचारे की जगह? मंडियां व्यापार हैं, चाहे वह समाज, सहकारी समितियों या कॉरपोरेट के रुप में ही क्यों न हों। ये सुधार किसानों को आज मिलने वाले विकल्पों को कम नहीं करते, वे असल में उन्हें बढ़ाते हैं। अगर नये विकल्पों के तहत कॉरपोरेट के रुप में खरीददार बेहतर कीमत नहीं देते तो किसानों के पास हमेशा मंडियों में जाने का विकल्प मौजूद होगा। सबसे बुरा नतीजा यह हो सकता है कि सुधारों के बाद किसानों की स्थिति न बदले लेकिन उनकी आज जो हालत है, उससे बुरा कुछ और क्या हो सकता है।

कुशल तरीके से काम करने वाले राष्ट्रीय वस्तु बाजारों और जुड़े हुए वायदा बाजारों के बिना किसान बिचौलियों की दया पर बना रहेंगे। भारतीय कानूनों के बारे में केवल एक बात निश्चित है, वह यह है कि वह कब तक बने रहेंगे यह तय नहीं है। अदालतें या अगली सरकार या उससे भी बुरा हो तो मौजूदा सरकार ही उसे बदल सकती है। ये सुधार तब तक किसी भी तरह का बदलाव लाने में नाकाम रहेंगे जब तक कि राज्य, केंद्र और अदालतें एक संगत विश्लेषणात्मक ढांचा विकसित न कर लें। भारत के किसानों के लिए अभी राह काफी लंबी है। लेकिन उन्हें इन सुधारों के साथ आजादी की उस राह की ओर एक कदम तो बढ़ा लेने दें। 

पार्थ जे शाह ( लेखक थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के प्रेसिडेंट हैं)