हाथ से छूटा एक मौका

एक आंकडे के मुताबिक़ करीब सात करोड़ भारतीयों ने क्रिकेट वर्ल्ड कप फ़ाइनल मैच देखा. श्री लंका के विरुद्ध ये मैच जीत कर भारत ने 28 साल बाद ये कप एक बार फिर अपने नाम कर लिया. ये कप जीत कर धोनी और उसकी टीम ने  भारतीयों को गर्व, प्रसन्नता और एक एकजुटता के सूत्र में पिरो दिया.  आंकड़ो के अनुसार प्रत्येक दर्शक ने 6 घंटे या 187 मिनट ये मैच देखने में लगाए. 64% केबल और सैटलाइट वाले घरों में ये मैच देखा गया. ये भारतीय टेलिविज़न के इतिहास में एक रिकॉर्ड था.

सूत्रों के अनुसार भारत के फ़ाइनल में आने के बाद बचे हुए 10 सेकंड वाले विज्ञापन स्पोट 20 लाख रुपये में गए. बड़ी बड़ी कंपनियों और ब्रांड ने समूचे भारत तक पहुँचने का ये महत्वपूर्ण मौका नहीं छोड़ा और मैच के दौरान अपने विज्ञापन खूब चलवाए.

मज़े की बात ये रही कि जिस तरह निजी कम्पनियों ने इस मौके का फ़ायदा उठाया उसी तरह हमारी सरकार ने इस विशाल मंच पर अपने विभिन्न अभियानों से जुड़े संदेशो को जनता तक पहुँचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया. भारत भर में सैंकड़ों, करोड़ों परिवार अपने टीवी सेटों पर आँख गड़ाए मैच देख रहे थे. ये एक अच्छा मौका था जब सर्व शिक्षा अभियान, सूचना का अधिकार, और परिवार कल्याण से जुड़े संदेशो को प्रसारित कर जनता तक सफलतापूर्वक पहुँचाया जा सकता था.

भारत के लिए ये एक अत्यंत गर्व का मौका था जब भारतीय टीम सालों बाद वर्ल्ड कप में जीत की कगार पर थी. यदि इस समय हम लोगों से कहते कि वो चुनाव में हमेशा अपने मताधिकार का प्रयोग करें, कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध से बचें और पर्यावरण का बचाव करें तो ये निश्चित था की करोड़ों लोग, जो आज के समय दूरदर्शन व अन्य सरकारी चैनेल नहीं देखते, इन बातों को सुनते. खासतौर पर अगर खेल मंत्रालय देश में खेलो के प्रचार प्रसार के लिए अपने कदमों की जानकारी जनता तक पहुंचाता, लोगों से और अधिक खेलो में रूचि लेने के लिए कहता तो कितना अच्छा रहता. कोमोनवेल्थ गेम से घायल हुई छवि को भी इन विज्ञापनों के ज़रिये सुधार जा सकता था.

कितनी ही स्कीमो और सब्सिडी में सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च देती है. मैच जीतने के बाद भी टीम के ऊपर सरकारों ने भरपूर धन वर्षा करी, पर जन संपर्क के इस बहुत अच्छे अवसर को सरकार ने अनदेखा कर अपने हाथ से एक सुनहरा मौका गवां दिया.

- स्निग्धा द्विवेदी