अड़चनों में फंसा लोकपाल

लोकपाल कमेटी के बारे में जो आशंका थी, वह सच निकली| यदि जन-लोकपाल के सारे प्रमुख प्रावधानों को पांचों मंत्री मान लेते तो भला उन्हें मंत्री कौन मानता? उन्हें कोई साधारण राजनीतिज्ञ भी मानने को तैयार नहीं होता| कोई भी राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार के समूल-नाश की बात सोच भी नहीं सकता| क्या भ्रष्टाचार किए बिना आज देश में कोई राजनीतिज्ञ बन सकता है? नेता इतने मूर्ख नहीं हैं कि वे जिस डाल पर बैठे हैं, उसी पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| लोकपाल कमेटी में मंत्रियों ने जो रवैया अपनाया है, उन्हें वही शोभा देता है| वे लोकपाल की जगह धोकपाल लाना चाहते हैं|

क्या अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल कल्पना-लोक में विचरण नहीं कर रहे हैं? वे चाहते हैं कि हमारे नेता रातोंरात वाल्मीकि, अंगुलिमाल, आम्रपाली और लुक्का बन जाएं| इतना बड़ा रूपान्तरण इतनी आसानी से होता है क्या? इसके लिए कोई राम चाहिए, कोई बुद्घ चाहिए, कोई विनोबा-जयप्रकाश चाहिए| जयप्रकाश का जादू डाकुओं पर तो चल गया लेकिन नेताओं पर न चल सका| यदि चल जाता तो उन्हें 77 का आंदोलन क्यों छेड़ना पड़ता? इसका मतलब यह कतई नहीं कि हमारे सारे नेता जन्मजात भ्रष्ट या बेईमान हैं लेकिन जिस व्यवस्था में पलकर वे बड़े होते हैं, पनपते हैं, बुलंदियॉं छूते हैं, वह व्यवस्था उन्हें मार-मारकर बेईमान बना देती है|

इस व्यवस्था को बदलने में एक सशक्त लोकपाल की भूमिका जबर्दस्त हो सकती है| लोकपाल ऐसा होना चाहिए कि जिसकी उपस्थिति मात्र् से भ्रष्टाचारियों का कलेजा कांप उठे| राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक तथा करोड़पति से लेकर कौड़ीपति तक हर नागरिक को अगर भान हो जाए कि भ्रष्टाचार करने पर उसे कोई भी बचा नहीं पाएगा तो भारत की व्यवस्था अपने आप शुद्घ होने लगेगी| अभी तो भंयकर से भयंकर भ्रष्टाचारी को यह भरोसा रहता है कि वह किसी तरह बच जाएगा| उसे दो ही अंतिम छाते नज़र आते हैं, जिनकी शरण में वह चला जाएगा| एक तो प्रधानमंत्री और दूसरा उच्चतम न्यायालय !

प्रधानमंत्री की हर जगह चलती है| क्या तो सीबीआई, क्या सीवीसी और क्या विभागीय जाँच? सभी तो उसके अंतर्गत है| एक इशारा हुआ नहीं कि सब कुछ रफा-दफा! और यदि वहां तक पहुंच नही है या आप विरोधी दल में हैं तो फिर जजों पर डोरे डालिए| वे पैसे पर फिसलें यह जरूरी नहीं हैं| कृतज्ञता, लिहाजदारी, सेवा-निवृत्ति के बाद नौकरी, राजनीतिक पदों की लालसा आदि अनेक तत्व हैं, जो उन्हें प्रेरित करते हैं| मामलों को रफा-दफा करने के लिए| राष्ट्र के इन दो सबसे "सशक्त संरक्षकों" पर भी किसी की निगरानी होनी चाहिए या नहीं? सदाचार के ये ही दो सबसे बड़े संरक्षक सिद्घ हो सकते हैं लेकिन ऐसे होने के लिए उनका आचरण संदेह के परे होना चाहिए या नहीं? यदि हां तो फिर उन्हें अपने आपको सार्वजनिक निगरानी की कसौटी पर चढ़वाने में कोई संकोच क्यों होना चाहिए|

यदि प्रधानमंत्री जैसा नरश्रेष्ठ और उच्चतम न्यायाधीश जैसा विक्रमादित्य भी निगरानी से डरेगा तो साधारण सांसद, अफसर और व्यापारी लोग अपने पर किसी निगहबान को क्यों स्वीकार करेंगे? लोकतंत्र् में सब बराबर हैं| कोई ऊँचा और कोई नीचा नहीं है| लेकिन जो सबसे शक्तिशाली है, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही ज्यादा होनी चाहिए| यदि सांसदों और अफसरों पर लोकपाल की निगरानी लागू हो तो प्रधानमंत्री, मंत्रियों और न्यायाधीशों के रिश्तेदारों पर भी वह विशेष तौर पर लागू होनी चाहिए| प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद कई बार कह चुके हैं कि ‘सीज़र की पत्नी को भी संदेह के परे’ होना चाहिए| अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने प्रधानमंत्री पर निगरानी को स्वीकार किया था और मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी भी उसे सही मानती है| कांग्रेस ने अपने पहले ड्राफ्ट में उसे कुछ छूट के साथ स्वीकार किया था| अब उसे क्या हो गया है, समझ में नहीं आता|

डॉ. मनमोहन सिंह जैसे स्वच्छ व्यक्ति की सरकार इस प्रावधान का अचानक विरोध क्यों करने लगी है? यह वही मनमोहनसिंह हैं, जिन्होंने बड़े बहादुराना अंदाज में कहा था कि वे डॉ. मुरलीमनोहर जोशी की लोक लेखा समिति में पेश होने को तैयार हैं| ऐसे ईमानदार और बहादुर आदमी की चुप्पी की दहाड़ बड़ी भंयकर है| लोग यह अटकल लगा रहे हैं कि यह सरकार तो गई और कांग्रेस अपने भावी प्रधानमंत्री को बचाने में अभी से जुट गई है| उसने यह कहना भी शुरू कर दिया है कि भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों को यदि लोकपाल पीसना चाहे तो अपनी चक्की में पीस सकता है| ऐसे बयानों के गर्भ में कौन सी राजनीति छिपी है?

इस सरकार में राजनेता कौन हैं? यह तो नौकरशाहों, पारिवारिक सत्तासेवियों, वकीलों और व्यवसायियों से भरी हुई है| ये लोग विनम्रता और समझदारी जरूर दिखाते हैं, जैसे कि शुरू-शुरू में इन्होंने अन्ना और रामदेव के साथ दिखाई थी, तो भी उसका अंत कितना विचित्र् होता है? लोगों पर यह प्रभाव पड़ता है कि ये चालाकी और ठगी पर आमादा हैं| यदि इनकी जंजीरें तोड़कर मनमोहनसिंह खुद घोषणा कर दें कि वे और उनका परिवार लोकपाल की तराजू पर तुलने को तैयार हैं तो सारा राष्ट्र उन्हें अपने कंधे पर उठा लेगा| यह डूबता हुआ जहाज तैरने लगेगा|

इसमें शक नहीं कि अन्ना के आंदोलन ने इस सरकार को डगमगा दिया और रामदेव के आंदोलन ने इसे बदहवास बना दिया| इसका संतुलन बिगड़ गया है| अभी भी गुंजाइश है| मामला सुधर सकता है| धमकियाँ देने और कुतर्क करने से कोई फायदा नहीं होगा| बात करें और यह न भूलें कि आप जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं| दूसरी तरफ अन्ना और अरविंद को भी सोचना होगा कि 16 अगस्त को दुबारा अनशन करें या न करें| अनशन का मुख्य लक्ष्य तो पहली बार में ही पूरा हो गया था| 42 साल से अधर में लटके बिल को पास करने का निर्णय करवा देना ही उस अनशन की सफलता थी| वह बिल कैसा हो, क्या यह भी अनशन का विषय हो सकता है? शायद नहीं| यह बहस का विषय है| बहस में कुछ वे झुकें, कुछ आप झुकें| कुछ वे बढ़े, कुछ आप बढ़ें| मुद्दे कई है| कितने और कौनसे मुद्रदों पर अनशन करेंगे, यह तय करना ही मुश्किल है|

देश के लोगों को हर बात समझ में आ रही है| नेताओं को आपने सही रास्ता दिखा दिया| उन पर कृपा की| अब भी वे अपनी मनमानी करना चाहते हैं तो उन्हें करने दीजिए| वे कब तक खैर मनाएंगे? वे लोकपाल की जगह धोकपाल खड़ा करेगे और कानून भी बना देंगे तो क्या होगा? और भी बुरा होगा| यह सरकार तो जाएगी ही, यह संसद भी जाएगी| जो धोकपाल को धोक देंगे, क्या उन सांसदों को जनता वापस लौटाएगी? शायद नहीं| पूरे नहीं के लिए अन्ना, अरविंद और रामदेव को जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से निकलकर घर-घर डगर-डगर जाना होगा| क्या इसके लिए वे तैयार हैं?

- स्निग्धा द्विवेदी