त्योहारों पर लकड़ी नहीं, नकारात्मक विचार जलाएं

बीते रविवार को हम सब ने धूमधाम से लोहड़ी जलाई। इसी तरह होली के भी पहले लोग होलिका दहन करते हैं। आज के ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में त्योहारों के नाम पर क्या ऐसे रिवाज उचित हैं? एक ही दिन में हजारों टन ग्रीन हाउस गैसों का जहर हमारे पर्यावरण में घुल जाता है। एक ही दिन में इतनी लकड़ी जला दी जाती है, जिससे सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र का सफाया हो जाता है। उत्तर भारत में लोहड़ी पर लकड़ियां जलाने की परंपरा है। यह सार्वजनिक रूप से भी किया जाता है और अलग-अलग भी। जिन परिवारों में उस साल कोई विवाह, जन्म अथवा अन्य मांगलिक अवसर होता है, उस परिवार के सभी लोग मिलकर अलग से लोहड़ी दहन करते हैं।

लकड़ी जलाने से आग पैदा होती है और उसे पवित्र माना जाता है। आग में तप कर वस्तुएं शुद्ध हो जाती हैं। मनुष्य के लिए ऊष्मा का महत्वपूर्ण स्त्रोत भी आग ही है। एक गरीब आदमी की सर्द रातें अलाव के सहारे ही कट सकती हैं। हमारे महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यों में अग्नि को साक्षी बनाया जाता है। हिंदूं धर्म में विवाह भी अग्नि के चारों ओर परिक्र्मा करने के बाद ही सम्पन्न होता है।

यह ठीक है कि अग्नि बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन आज जिस रूप में त्योहार मनाए जा रहे हैं, क्या वे प्रासंगिक हैं? विवाह के लिए वधू और वर की पोशाक बदल गई, डोली की जगह कार आ गई, घर की जगह होटलों में आयोजन होने लगें। लेकिन अग्नि के प्रतीक के लिए लकड़ियों को जलाना हमने शास्त्र और परंपरा के नाम बनाए रखा। इसी तरह त्योहारों के नाम पर पर्यावरण को नष्ट करने और संसाधनों का दुरूपयोग हमने जारी रखा। इस दिन पूरे देश में एक ही दिन लाखों लोहड़ियां जलाई जाती हैं। लेकिन सर्दी की रातों में गरीबों को गर्मी देने के लिए अलाव जलाने की परंपरा खत्म हो गई है- धार्मिक संस्थाओं में भी और सरकारी सोच में भी। पर्यावरण की सेहत के लिए लकड़ियां ही नहीं, सुगंधित वनस्पतियां, औषधीय द्रव्य, कूड़ा-कचरा और कागज जलाना भी हानिकारक है। इससे एक ओर तो हवा में उपस्थित आक्सीजन जैसी लाभदायक गैसों की कमी हो जाती है तथा दूसरों ओर घातक ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि होने लगती है।

आर्थिक विकास के लिए तो अपने पर्यावरण की लगातार उपेक्षा कर हम इसे प्रदूषित कर ही रहे हैं, ऊपर से कर्मकांडों और पर्वों के माध्यम से इसकी स्थिति और खराब कर रहे हैं। आइए कम से कम त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर किए जा रहे प्रदूषण को तो हम रोकें। कागज और पुरानी लकड़ी जैसी अनेक वस्तुओं को रीसाइकिल करके हम अमूल्य वन संपदा बचा सकते हैं।

होली ही जलानी है तो कोई ऐसी ही होली जलाइए जो हमारे विनाश के बजाए विकास में सहायक हो। ऐसी होली जलाइए जिससे हमारा भौतिक ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश भी कुछ ऐसा हो जाए कि हम निर्भय होकर जी सकें। शोषण, उत्पीड़न और बलात्कार से सुरक्षित रह सके। यह तभी संभव है जब हम तमाशबीन बनने की बजाए गलत का विरोध करने की शक्ति अपने भीतर पैदा करें। अज्ञान, अहंकार, द्वेष, घृणा, वैमनस्य, स्वार्थ और शोषण जैसे घातक भावों की होली जलाएं। जिस प्रकार पेड़ अपनी अपनी पुरानी पीली पड़ गई पत्तियों को फेंक नई पत्तियां धारण कर पुनर्जन्म पाता है, हम भी नकारात्मक भावों से मुक्त होकर सकारात्मक भावों का विकास कर नए जीवन में प्रवेश करें।

- सीताराम गुप्ता
साभारः  नवभारत टाइम्स