सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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- शेफर्ड ऑफ पैराडाइज, बोटल मसाला इन मोइली, द डंकी फेयर, इन सिटी लाइट्स, हैव यू सीन द अराना को विभिन्न वर्गों की सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का खिताब

- डॉक्यूमेंट्री देखने पहुंचे केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोयली, टेस्ट क्रिकेटर मुरली कार्तिक, पत्रकार कुलदीप नैय्यर व समाज सेविका अरूंधति रॉय

- चार दिनों तक चले फिल्म फेस्टिवल के दौरान दस देशों की 38 डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का हुआ प्रदर्शन, फोटो प्रदर्शनी ने भी किया आकर्षित

लेह-लद्दाख घूमने गए अतुल कुमार नामक दिल्ली निवासी एक युवक को वहां के एक वर्ग विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र में शिक्षा की दयनीय स्थति को देख काफी पीड़ा हुई। स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं से बातचीत में उसे पता लगा कि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। उन्होंनें बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल में जो टीचर आते हैं वो महीनें में एक दो दिन ही क्लास लेते हैं और अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहते हैं।

स्थानीय लोगों की परेशानी को सुन अतुल ने अपने कुछ अन्य उत्साही मित्रों के साथ लेह जाकर वहां के

- घरेलू नौकर उपलब्ध कराने वाली दिल्ली की प्लेसमेंट एजेंसियों की हकीकत पर आधारित ‘संस एंड डॉटर’ डॉक्यूमेंट्री ने किया सोचने पर मजबूर

-  जीविका फिल्म फेस्टिवल के तीसरे दिन विभिन्न देशों की दस डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का हुआ प्रदर्शन

गांव के एक युवक ने मेरे भोले भाले माता पिता को बहका कर और मुझे अच्छी नौकरी दिलाने और साथ ही साथ पढ़ाई कराने के नाम पर अपने साथ दिल्ली लेकर आया। लेकिन यहां लाकर मुझे एक ऐसे घर में नौकरानी के काम में लगा दिया गया

चीनी वस्तुओं के किसी भी बाजार में छाए रहने का मुख्य कारण उनका तुलनात्मक रूप से सस्ता होना होता है। लेकिन यदि देसी वस्तु के सस्ते होने के बावजूद उसी चीनी वस्तु की भारी मात्रा आयात की जाए और यहां के उत्पादकों की अनदेखी की जाए तो इसे नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता  नहीं तो और क्या कहेंगे।

जी हां, देश के जंगलों में बांस की बड़ी तादात बेकार पड़े होने के बावजूद भारी मात्रा में चीनी बांस का आयात किया जाता है। वह भी यहां उपलब्ध बांस की कीमत से अधिक दर पर। इससे एक तरफ जहां स्थानीय उत्पादकों के सामने आजीविका का संकट

कुछ महीने पहले मुंबई के सबर्ब विलेपार्ले में पुलिस फुटपाथ को हॉकरों से खाली कराने की मुहिम चला रही थी। उसी दौरान डर से भाग रहे एक हॉकर की मौत हो गई। इसने शहर में एक बड़े विवाद का रूप ले लिया। सांसद प्रिया दत्त और एमएलए कृष्णा हेगड़े ने इस मृत्यु के लिए पुलिस की कार्रवाई को जिम्मेदार बताते हुए एक हॉकर पॉलिसी लागू करने की मांग की।

हर बड़े शहर में हॉकर फुटपाथ और सड़क घेर कर अपना धंधा करते हैं। और हर जगह पुलिस और म्युनिसपैलिटी वाले जब-तब इन हॉकरों को खदेड़ने की मुहिम चलाते हैं। हॉकरों की यह स्थिति मुंबई, दिल्ली, बेंगलूर

लोकतंत्र बचाने का तीन सूत्रीय एजेंडा
 
पिछले दो दशकों में भारत का आर्थिक उदय उल्लेखनीय घटना है। इसने करोड़ों लोगों को घोर गरीबी से निकालकर ठोस मध्यवर्ग  बनाया है। बहुत ही खराब शासन (उत्तरप्रदेश में तो आपराधिक शासन) के बीच समृद्धि हासिल की गई है। दुर्गा शक्ति प्रकरण सार्वजनिक जीवन में आपराधिक व्यवहार का ताजा मामला है। उत्तरप्रदेश के लोगों ने जब अखिलेश यादव में भरोसा जताया तो उन्हें लगा कि वे अलग प्रकार की सरकार चुन रहे हैं। अब उन्हें लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है।

एक गरीब व्यक्ति के भोजन पर कितना खर्च आता होगा? एक राजनेता का कहना है- पांच रुपए, दूसरे का कहना है- 12 रूपए। सस्ते खाने की कीमत पता करने के लिए टीवी चैनल वाले शहर के सारे ढाबों की पड़ताल कर लेते हैं। हैरत की बात नहीं कि उन्हें सस्ते से सस्ते ढाबे में भी 20-25 रूपए से कम कीमत में खाना नहीं मिला। और भारतीय वास्तविकताओं से अनभिज्ञ असंवेदनशील राजनेताओं की आलोचना शुरू हो गई। खुलासा बहुत मनोरंजक था। लेकिन हाय! इसने भी कई तथ्यों को नजर अंदाज कर दिया, और सरल लेकिन प्रमुख गणितीय गलतियां कीं।

इसके पूर्व, योजना आयोग के ताजा

पिछले हफ्ते मैं गुजरात गया। यह देखने कि तकनीक और एक सक्रिय एनजीओ ने कमजोर आदिवासियों को वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत किस तरह ताकतवर बनाया है। यह कानून आदिवासी जोत वाले उन सभी प्लॉटों पर मालिकाना हक की व्यवस्था करता है, जिनपर 2005 में खेती की जा रही थी। इससे पहले, वनों के सरकारी अधिग्रहण के बाद से ही सभी वनवासियों को सदियों के मालिकाने वाली उनकी जमीनों का गैरकानूनी कब्जेदार बना दिया गया था। वन विभाग द्वारा उनके गांवों और खेतों को कभी भी उजाड़ दिए जाने का खतरा बना रहता था।
उम्मीद थी कि यह कानून इस अन्याय को

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