सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

अधिक जानकारी के लिये देखें :

इस पेज पर विभिन्न लेखकों के आजीविका पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

कुछ महीने पहले मुंबई के सबर्ब विलेपार्ले में पुलिस फुटपाथ को हॉकरों से खाली कराने की मुहिम चला रही थी। उसी दौरान डर से भाग रहे एक हॉकर की मौत हो गई। इसने शहर में एक बड़े विवाद का रूप ले लिया। सांसद प्रिया दत्त और एमएलए कृष्णा हेगड़े ने इस मृत्यु के लिए पुलिस की कार्रवाई को जिम्मेदार बताते हुए एक हॉकर पॉलिसी लागू करने की मांग की।

हर बड़े शहर में हॉकर फुटपाथ और सड़क घेर कर अपना धंधा करते हैं। और हर जगह पुलिस और म्युनिसपैलिटी वाले जब-तब इन हॉकरों को खदेड़ने की मुहिम चलाते हैं। हॉकरों की यह स्थिति मुंबई, दिल्ली, बेंगलूर

लोकतंत्र बचाने का तीन सूत्रीय एजेंडा
 
पिछले दो दशकों में भारत का आर्थिक उदय उल्लेखनीय घटना है। इसने करोड़ों लोगों को घोर गरीबी से निकालकर ठोस मध्यवर्ग  बनाया है। बहुत ही खराब शासन (उत्तरप्रदेश में तो आपराधिक शासन) के बीच समृद्धि हासिल की गई है। दुर्गा शक्ति प्रकरण सार्वजनिक जीवन में आपराधिक व्यवहार का ताजा मामला है। उत्तरप्रदेश के लोगों ने जब अखिलेश यादव में भरोसा जताया तो उन्हें लगा कि वे अलग प्रकार की सरकार चुन रहे हैं। अब उन्हें लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है।

एक गरीब व्यक्ति के भोजन पर कितना खर्च आता होगा? एक राजनेता का कहना है- पांच रुपए, दूसरे का कहना है- 12 रूपए। सस्ते खाने की कीमत पता करने के लिए टीवी चैनल वाले शहर के सारे ढाबों की पड़ताल कर लेते हैं। हैरत की बात नहीं कि उन्हें सस्ते से सस्ते ढाबे में भी 20-25 रूपए से कम कीमत में खाना नहीं मिला। और भारतीय वास्तविकताओं से अनभिज्ञ असंवेदनशील राजनेताओं की आलोचना शुरू हो गई। खुलासा बहुत मनोरंजक था। लेकिन हाय! इसने भी कई तथ्यों को नजर अंदाज कर दिया, और सरल लेकिन प्रमुख गणितीय गलतियां कीं।

इसके पूर्व, योजना आयोग के ताजा

पिछले हफ्ते मैं गुजरात गया। यह देखने कि तकनीक और एक सक्रिय एनजीओ ने कमजोर आदिवासियों को वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत किस तरह ताकतवर बनाया है। यह कानून आदिवासी जोत वाले उन सभी प्लॉटों पर मालिकाना हक की व्यवस्था करता है, जिनपर 2005 में खेती की जा रही थी। इससे पहले, वनों के सरकारी अधिग्रहण के बाद से ही सभी वनवासियों को सदियों के मालिकाने वाली उनकी जमीनों का गैरकानूनी कब्जेदार बना दिया गया था। वन विभाग द्वारा उनके गांवों और खेतों को कभी भी उजाड़ दिए जाने का खतरा बना रहता था।
उम्मीद थी कि यह कानून इस अन्याय को

 

कांग्रेस कार्यकर्ताओं के कहर का शिकार हुआ एक रेस्तरां। आम से खास तक केंद्र सरकार में हो रहे रोज-रोज घोटाले और तमाम टैक्स से त्रस्त है। सभी लोग अलग अलग तरीके से अपना गुस्सा व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन मुंबई में एक रेस्तरां के मालिक ने अपने रेस्तरां के बिल को ही गुस्सा व्यक्त करने का जरिया बना डाला। फिर क्या था, कांग्रेसी कार्यकर्ता उग्र हुए और रेस्तरां बंद करा दिया। बंद होते ही रेस्तरां मालिक की अक्ल खुली और विरोध के इस साधन को कहा-बाय, बाय।

मुंबई के परेल इलाके में एक रेस्तरां के मालिक को अपने बिल में यूपीए

अंतत: आठ साल चली लंबी लड़ाई के बाद महाराष्ट्र में डांस बार पर पाबंदी खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार पर प्रतिबंध खत्म करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को कायम रख सही फैसला दिया है। इसके पहले भी राज्यपाल ने प्रतिबंध संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। लेकिन राज्य सरकार पाबंदी लागू करने पर अड़ी रही और मध्यवर्ग की 75 हजार से ज्यादा युवतियां बेरोजगार हो गईं। इससे खराब बात तो यह हुई कि सरकार ने कोर्ट और मीडिया में उन पर जो अश्लील आरोप लगाए उनकी वजह से वे कोई दूसरा काम करने लायक नहीं रहीं। सरकार ने डांस बार को ऐसी जगह बताया जहां लोग लड़कियों से

 

गरीबी बड़ी भयानक चीज है। कुछ ही चीजें हैं जो मानवता को इतना नीचा देखने पर मजबूर करें और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी पूरी न कर पाना उनमें से एक है।

भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गरीबी का स्वर्ग कहा जा सकता है। हम चाहे तो 1947 के पहले की हमारी सारी गलतियों के लिए अंग्रेजों को दोष दे सकते हैं, लेकिन उन्हें गए भी 67 साल गुजर चुके हैं। हम अब भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में से हैं। एशिया में चालीस के दशक में हमारे बराबर गरीबी के साथ शुरुआत करने वाले देशों ने कितनी तरक्की कर ली है।

                                                    यूपीए को दम देगी गांवों की बढ़ती समृद्धि

अर्थव्यवस्था को लेकर फिलहाल छाई पस्ती को एक तरफ रख दें तो 2011-12 के रोजगार और उपभोग संबंधी आंकड़े कई उत्साहवर्धक संकेत देते हैं। इनसे पता चलता है कि पिछले दो सालों में औसत पारिवारिक उपभोग एक तिहाई बढ़ गया है, जो मुद्रास्फीति की दर से कहीं ज्यादा है। इससे

Pages