सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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मोदी सरकार के कार्यकाल के पहले बजट को प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 100 स्मार्ट सिटी बसाने की योजना की घोषणा की है। स्मार्ट सिटी के लिए 7000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया गया है और इसमें एफडीआई अर्थात प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शर्तों में ढील दी गई है। योजना के तहत स्मार्ट सिटी का विकास महानगरों और बड़े शहरों के उपनगर के तौर पर किया जाना है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को शहरों की विश्वस्तरीय सुविधा, रोजगार आदि उपलब्ध कराना और दिल्ली जैसे शहरों में बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करना है।
संयुक्त राष्ट्र ने तेजी से बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण के बाबत नई रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली आबादी के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर बन गई है। दुनिया भर में शहरीकरण की संभावनाओं से जुड़ी 2014 की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 3.8 करोड़ की आबादी वाला टोक्यो इकलौता ऐसा शहर है जो दिल्ली (2.5 करोड़) से आगे है। देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर मुंबई इस सूची में छठे स्थान पर है 2.1 करोड़ आबादी के साथ।
 
संयुक्त राष्ट्र
सी. रंगराजन कमेटी द्वारा गरीबी रेखा के संबंध में प्रस्तुत रिपोर्ट को लेकर विवाद मचना तय था। 30 रुपए, 32 रुपए, 35 रुपए और 47 रुपए को गरीबी का पैमाना मानना कहीं से भी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है लेकिन गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों को मिलने वाली सरकारी सहायता और सब्सिडी का बाजार मूल्य निकालें तो अवश्य ही आंकड़ा 47 रुपए से कई गुना अधिक बढ़ जाएगा। यह भी सोचने वाली बात है कि आखिर "वेलफेयर" (भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार, मुफ्त चिकित्सा सुविधा) के नाम पर इतना खर्च होने के बाद भी गरीबों के हाथ कुछ नहीं लगता
नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत में कारोबारी माहौल बनाने की होगी 
 
देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले छोटे-बड़े कारोबारियों की अपेक्षा है कि नई सरकार अंग्रेजी राज के समय से चले आ रहे अप्रासंगिक और बेतुके कानूनों से उन्हें मुक्ति दिलाए। इन दिनों दुनिया के आर्थिक संगठन और अर्थ विशेषज्ञ एक स्वर में कह रहे हैं कि आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए नई भारत सरकार को सबसे पहले कारोबारी
देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिए पर रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा हमेशा से उन्हें शहर की समस्या में ईजाफा करने वाले और लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा माना जाता रहा है। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), नासवी व सेवा जैसे गैर सरकारी संगठन देशव्यापी अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की समस्याओं को दूर करने के लिए उचित संवैधानिक उपाय की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए पिछले दिनों लोकसभा से प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड
आज अगर हम नरेंद्र मोदी की आर्थिक सोच के बदले चर्चा कर रहे हैं उनकी उस टोपी के पहनने, न पहनने की, तो इसमें सबसे ज्यादा दोष हम पत्रकारों का है। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने भी उस टोपी को मुद्दा बनाकर खूब उछाला है, लेकिन जब भी उछाली गई है वह टोपी, हम पत्रकार फौरन पहुंच गए हैं वहां उसको सुर्खियों में रखने के लिए। यह नहीं पूछा हमने कभी कि अगर मोदी ने पहन ली होती वह टोपी, जो उस मौलाना ने उनको देने की कोशिश की थी, तो क्या मुस्लिमों की नजर में मोदी सेक्यूलर बन जाते? क्या टोपी न पहनने से यह साबित हो गया है कि मोदी के दिल में मुसलमानों के लिए
सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में कहा है कि अगर वे सत्ता में आए, तो आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से कार्य करेंगे। हाल ही में अमेरिका के अग्रणी मत सर्वेक्षक संगठन गैलप ने अपने सर्वेक्षण में कहा है कि भारत के लोकसभा चुनाव में विकास और अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। 
 
सर्वेक्षण में करीब 35 फीसदी भारतीयों ने माना है कि अर्थव्यवस्था बदतर होती जा रही है।
कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा है कि निजी क्षेत्र में जाति-आधारित आरक्षण लागू करने के लिए राष्ट्रीय सहमति बनाई जाएगी। सपा तथा बसपा पहले ही आरक्षण के हिमायती रहे हैं। भाजपा भी मूल रूप से इसके पक्ष में है यद्यपि क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर करना चाहती है। पूरे देश में आरक्षण जारी रखने के प्रति राजनीतिक सहमति दिखती है।
 
जाति जैसी समस्या अनेक देशों में है। मलेशिया में मलय भूमिपत्रों तथा चीनियों के बीच खाई थी। व्यापार

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