सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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क्या आप रेलवे स्टेशनों पर सामान ढोने के ऐवज में कूलियों द्वारा अनाप शनाप पैसे मांगने का कारण जानते हैं? क्या आपको पता है कि एक गरीब इंसान को रेलवे स्टेशनों पर कूली का काम करने के लिए कितनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है? क्या आपको पता है कि सभी प्रक्रियाओं से सफलता पूर्वक गुजरने के बाद भी बांह पर बिल्ला बांधने के लिए हजारों रूपए की जरूरत होती है, और वर्षों का इंतजार करना पड़ता है? क्या आपको पता है कि तत्काल कूली बनने के लिए आपके पास 3 से 4 लाख रुपयों की जरूरत पड़ती है? अधिकांश लोगों का जवाब होगा नहीं। लेकिन आज हम बताते हैं कूलीगिरी से
राजस्थान हाइकोर्ट ने रेहड़ी पटरी विक्रेताओं को बड़ी राहत प्रदान की है। गुरुवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए हाइकोर्ट की जयपुर बेंच ने शहर से रेहड़ी पटरी विक्रेताओं को हटाने और उनके सामानों की जब्ती पर रोक लगा दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को शीघ्र अतिशीघ्र राजस्थान स्ट्रीट वेंडर ऐक्ट 2012 को लागू करने का भी आदेश जारी किया है।  
 
विदित हो कि वर्ष 2012 में प्रवासी दिवस के मौके पर सैकड़ों रेहड़ी पटरी वालों को उनके ठीए से
यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही हमारे शहरों को पुनर्जीवित करने वाले महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत ‘स्मार्ट सिटी’ के बैनर तले करने वाले हैं। हालांकि, भारतीय शहर स्मार्ट तब बनेंगे जब इन्हें उन वास्तविक परिस्थितियों को केंद्र में रखकर बनाया जाएगा, जिनमें भारतीय काम करते हैं और उन्हें लालची राज्य सरकारों के चंगुल से छुड़ाकर स्वायत्तता दी जाएगी। जब तक शहरों में सीधे चुने गए ऐसे मेयर नहीं होंगे, जिन्हें शहर के लिए पैसा जुटाने की आज़ादी हो और म्यूनिसिपल कमिश्नर जिनके मातहत हों, तब तक शहरी भारत स्मार्ट होने वाला नहीं।
तो हमने उबर पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके साथ एप आधारित सारी टैक्स कंपनियों पर भी पाबंदी लगा दी, क्योंकि मोबाइल एप कंपनी में रजिस्टर्ड ड्राइवर ने टैक्सी में सवार दिल्ली की युवती से दुराचार किया था। कारण बताया गया कि उबर ने पंजीयन नहीं कराया और उस प्रक्रिया का पालन नहीं कराया, जो एक रेडियो कंपनी को करना चाहिए और स्वतंत्र रूप से अपने ड्राइवरों की पृष्ठभूमि की पर्याप्त जांच नहीं की। उनका सत्यापन नहीं कराया। बेशक, सरकार ने नहीं बताया कि कंपनी को दुराचार की घटना होने के पहले महीनों तक क्यों काम करने दिया गया।
अर्थव्यवस्था में लेनदेन मुख्य रूप से उत्पादक और उपभोक्ता के बीच होता है। जैसे किसान सब्जी उगाता है और एक परिवार उसकी खपत करता है। यदि परिवार का कोई सदस्य गांव जाकर लौकी खरीदे तो कठिनाई होती है, इसलिए समाज ने मंडी और दुकानदार बनाए। अब यह काम इंटरनेट के जरिए होने लगा है। कई शहरों में लोगों ने सब्जी पहुंचाने की वेबसाइट बनाई है। आप सुबह अपना ऑर्डर बुक करा सकते हैं। साइट का मालिक मंडी से सब्जी लाकर सीधे आपके घर पहुंचा देगा। सब्जी पसंद न आए तो आप लौटा सकते हैं। दुकानदार और ठेले वालों की जरूरत नहीं रह गई है। इससे छोटे ही नहीं, बड़े विक्रेता भी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार अब छह माह से अधिक पुरानी हो चुकी है, लेकिन सवाल यही है कि हम इसकी शुरुआती प्रगति का आकलन किस रूप में किया जाए? इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर भारत की उम्मीदों को कहीं अधिक बढ़ा दिया है और लोगों को उन पर पूरा विश्वास भी है। आम चुनावों के दौरान उन्होंने जिस गतिशीलता और ऊर्जा-उत्साह के साथ कार्य किया था वह दुनिया के तमाम देशों की यात्रएं करने के बावजूद अभी भी बरकरार है। उनकी विदेश यात्रओं के क्रम में जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार और फिजी ही नहीं,
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा द्वारा वेश्यावृति को कानूनी मान्यता दिलाने संबंधी बयान भले ही देश में बहस का मुद्दा बन गया हो लेकिन देश में वेश्यावृति के माध्यम से जीवन यापन करने वाली लाखों सेक्स वर्कर्स को सुरक्षा, गरिमा और स्वास्थ प्रदान करने का एक मात्र यही तरीका है। 
 
दुनिया के कई देशों नें वेश्यावृति कानून में बदलाव कर और इसे कानूनी वैधता प्रदान कर उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए हैं। उदाहरण के लिए नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड,

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