सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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हमारे देश में एक अद्भुत घटना घट रही है। तीन करोड़ गरीब महिलाओं ने छोटा-मोटा कारोबार शुरू करने के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ऋण लिए हैं।

इस राशि से वे या तो एक गाय खरीदती हैं, ताकि दूध का व्यवसाय कर सकें, या वे इस राशि का निवेश एक सिलाई मशीन में करती हैं, ताकि कपड़े बेच सकें या फिर वे एक किराना दुकान खोल लेती हैं। जो कार्य गैरसरकारी संगठनों द्वारा चैरिटी के रूप में प्रारंभ किया गया था, वह अब आत्मनिर्भर व्यवसाय का रूप ले चुका है। इस परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं पेशेवर माइक्रोफाइनेंस कंपनियां, जो धीरे-धीरे देहाती साहूकारों को

एक आदर्श शहर के लिए क्या-क्या जरूरी सुविधाएं हो सकती हैं? 24 घंटे बिजली और पानी? स्वच्छ वातावरण, कार, साइकिल और पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त चौड़ी सड़कें? शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं, खेल के मैदान, संग्रहालय, आदि? राजनीतिक व्यवस्था में अधिक दिलचस्पी लेने वाले शहर के लिए एक मेयर या महापौर की भी आवश्यकता बता सकते हैं, जिसके पास कर लगाने और प्रशासन के सभी जरूरी अधिकार हों।

ऐसे शहर निश्चित रूप से होने चाहिएं, लेकिन इसके साथ एक सच्चाई यह भी है कि अब तक ये शहर गरीबों को एक सम्माननीय जगह देने में नाकामयाब रहे हैं। शहर

मनरेगा (MGNREGA) के अंतर्गत 100 श्रमिक दिवसों को बढ़ा कर 200 दिवस करने की कई दिनों से बात चल रही है. भारत के अति निर्धनों की आय का स्त्रोत बनी इस विवादित स्कीम के अंतर्गत दिन बढाने का प्रस्ताव सुनने में तो लोक कल्याणकारी लगता है पर इस का बहुत गंभीर आंकलन करने की आवश्यकता है. हमें ध्यान देना होगा की अति निर्धन को आय की गारंटी पहुचाने वाली ये स्कीम कहीं स्थायी रोज़गार गारंटी स्कीम के रूप में ना तब्दील हो जाए. यदि ऐसा होता है तो आर्थिक सुधार के पथ पर चल रहे हमारे देश के लिए ये एक पीछे जाने वाला कदम होगा.

सरकार की यह योजना इस

दिल्ली राज्य में गरीबो  को समाज सुधार योजनाओं का लाभ सिंगल विंडो के ज़रिये पहुचाने के लिए 'मिशन कन्वरजेंस' या सामाजिक सुविधा संगम एक अनूठा और लाभदायक प्रयोग है. इस मिशन का उद्देश्य समुदायों के करीब जा कर वितरण बिन्दुओं को खड़ा करना है ताकि गरीब जनता विभिन्न सामाजिक योजनाओं का फल आसानी से उठा सके. एक सोसाइटी की तरह रजिस्टर्ड सामाजिक सुविधा संगम राज्य के तमाम विभागों, NGOs और नोडल एजेंसिओं के लिए एक सुविधा केंद्र की तरह है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के मुख्य सचिव के नेतृत्व में चलने वाले सामाजिक सुविधा संगम का लक्ष्य है सामाजिक चेन के सबसे निचले व्यक्ति तक

ताकत हासिल कर लेना एक बात है और उसका इस्तेमाल करना दूसरी। पिछले दिनों जब दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भेंट हुई तो यह दो निराश नेताओं की भेंट थी। ओबामा जहां अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में नाटकीय हार से हैरान थे, वहीं मनमोहन सिंह एक के बाद एक हो रहे घोटालों के खुलासों से परेशान थे।

लगता है ये दोनों नेता उस बुनियाद को भूल गए, जिस पर उनके देशों के लोकतंत्र का निर्माण हुआ। जिस तरह स्वतंत्रता के विचार के बिना अमेरिका की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह धर्म के बिना भारत को

‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

अर्थशास्त्र आर्थिक प्रतिमानों, सैद्धांतिक प्रमाणों और अविवेकपूर्ण बुद्धिशीलता का विज्ञान बनने से पहले एक नैतिक दर्शन के नाम से जाना जाता था तथा इस बात से संबद्ध था कि व्यक्ति अपना जीवन कैसे बिताता है। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध के दौरान एडम स्मिथ द्वारा जीवन का एक व्यापक दर्शन प्रस्तुत किया गया। अपनी अनूठी कृति दि वेल्थ ऑफ नेशंस में एडम स्मिथ ने स्व-हित पर आधारित एक अर्थव्यवस्था का वर्णन किया है। यह व्यवस्था जो बाद में पूंजीवाद के नाम से जानी गई, इस प्रसिद्ध उद्धरण में वर्णित है:

हम अपने भोजन की

    राजस्थान के कोटा और आसपास के जिलों में इन दिनों दारा राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) की खूब चर्चा है। कोटा जिला के दारा वन्य जीव अभ्यारण्य के छोटे से संकरे हिस्से को राष्ट्रीय उद्यान बनाने का प्रस्ताव राजस्थान सरकार के वन विभाग अधिकारियों के फाइलों में पड़ा है। अधिकारीगण इसे राज्य सरकार से स्वीकृत कराकर गजट में छपवाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं क्योंकि गजट में छपने के बाद ही सरकारी मंजूरी की घोषणा को वैधानिक मान्यता मिलेगी। एक बार पहले भी सन् 2003 में यह प्रस्ताव हर जगह से स्वीकृति पाते हुए गजट में प्रकाशन के मुहाने तक पहुँच गया था। लेकिन ऐन

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