सार्वजनिक नीति - आजीविका लेख

आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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आंदोलन कर रहे किसानों की छवि संतों अथवा पापियों के रूप में गढ़ी जा सकती है। 1960 के दशक में जब देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहा था तब उन्होंने हरित क्रांति की अगुवाई करके न केवल भारत को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि एक निर्यातक देश के तौर पर भी स्थापित किया। इसके लिए उन्हें नायक कहा जाना बिल्कुल उचित था।

लेकिन कम वर्षा वाले राज्य में चावल जैसे अत्यधिक पानी की जरूरत वाले फसलों को उगा कर पंजाब के किसानों ने भू जल स्तर को नाटकीय ढंग से कम कर दिया। इससे छोटे किसानों

वर्ष 1947 में भारत को एक विदेशी ताकत से राजनीतिक आजादी मिली थी और 1991 में भारत ने भारतीय राज्य से आर्थिक आजादी हासिल की। राजनीतिक आजादी के साथ सबको मताधिकार मिला और सभी नागरिक बराबर के भागीदार बने। बदकिस्मती से, 1991 में मिली आर्थिक आजादी का फायदा सभी नागरिकों को नहीं मिला। इसने मुख्य रुप से औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र को लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से मुक्ति दिलायी। आर्थिक सुधारों के दायरे में आबादी का एक बड़ा हिस्सा नहीं आया जो अपनी आजीविका औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र के बाहर कमाता था। भारतीय समाज के सबसे निचले तबके को किसी तरह की आर्थिक आजादी नहीं

किसान आंदोलन सरकार के लिए सबक है कि सुधार थोपे न जाएं, उनपर पहले समर्थन जुटाना जरूरी है

पंजाब के किसानों के मौजूदा आंदोलन में कई सबक हैं। उनमें से एक है कि राजनीति छोटा खेल है, एक 20-20 मैच, जबकि अर्थव्यवस्था लंबा, पांच दिवसीय टेस्ट मैच है। पंजाब के किसान 20-20 खेल रहे हैं और सरकार टेस्ट मैच। इस बेमेलपन के कारण दूसरा सबक यह है कि लोकतंत्र में सुधार मुश्किल है। एक लोकवादी एक रुपए प्रतिकिलो चावल देने का वादा कर सुधारक को चुनाव में हरा सकता है।

अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास कृषि क्षेत्र में सुधार के एक बड़े पैरोकार हैं और मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों को काफ़ी हद तक सही मानते हैं. लेकिन 'इंडिया अनबाउंड' नाम की प्रसिद्ध किताब के लेखक के अनुसार प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं. वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा

कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग क्या है? खुद खेती करने वाले किसान ने बताई इसकी चुनौतियां, फायदे और नुकसान
गुणवंत समझाते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है। हम पहले से भी अपनी जमीन दूसरे को किराए पर देते रहे हैं। पहले मुंहजबानी काम होते आ रहे थे। अब कानून के तहत पूरी लिखा-पढ़ी के साथ होगी।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े जरूरी सवालों के जवाब

भारत में किसानों की एक

पिछले दिनों काफी हो-हल्ले के बीच मोदी सरकार ने राज्यसभा से तीन विधेयक पारित करा लिये। देश में कृषि की अवस्था में सुधार के उद्देश्य से पारित ये तीन विधेयक हैं; कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संसोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक

  • मनचाहे क्रेता को फसल बेचने की आज़ादी मिली, मनचाहे बीज से फसल उगाने की आज़ादी कब 
  • जीएम बीजों के इस्तेमाल की अनुमति के लिये किसान लंबे समय से कर रहे हैं मांग
  • खेती को लाभदायक बनाने के लिये लागत में कमी आवश्यक, एचटीबीटी हो सकता है कारगर

पिछले दिनों काफी हो-हल्ले के बीच मोदी

आज किसानों को अन्नदाता की भूमिका से निकालकर फार्मप्रेन्योर बनाने और खेती को मुनाफे की वृति बनाने के लिए तमाम जतन किये जा रहे हैं और नीतियां बनाई जा रही हैं। हालांकि देश में बहुत सारे फार्मप्रेन्योर पहले से ही नई तकनीक और गैर परंपरागत फसलों की मदद से न केवल जबर्दस्त मुनाफा कमा रहे हैं बल्कि अन्य लोगों को इस क्षेत्र में आने और लाभ कमाने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। ऐसे ही एक फार्मप्रेन्योर हैं सुधांशु कुमार जो कि बिहार के समस्तीपुर के एक छोटे से गांव नयानगर से आते हैं। सुधांशु कुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से ग्रेजुएट और पोस्ट

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