चायनीज़ नोबेल पुरस्कार विजेता का बयान

चायनीज़ दबाव को ना मानते हुए, भारत ने नोर्वे में चीन के लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी लियु श्याबाओ को मिलने वाले नोबेल शांति पुरस्कार समारोह में हिस्सा लिया. ऐसा कदम उठाते हुए, भारत ने स्वतंत्रता और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का अच्छा प्रमाण दिया. चीनी सरकार के आव्हान के चलते, रूस और पाकिस्तान समेत 15 देशों ने इस समारोह का बहिष्कार किया. ये समारोह विश्व मानवाधिकार दिवस पर मनाया गया और भारत, अमरीका, यू के और फ्रांस समेत 46 देशों इस अवसर में सम्मिलित हुए.

श्याबाओ चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार को समाप्त कर लोकतान्त्रिक सुधारों की एक लम्बे समय से मांग कर रहे हैं. 55 वर्षीय श्याबाओ एक लेखक, आलोचक और प्रोफ़ेसर भी हैं. पिछले साल चीनी सरकार ने उन्हे राज्य विरोधी कार्यकलापों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

चूंकि विरोधी कार्यकलापों की वजह से श्याबाओ 11 साल की सज़ा काट रहे हैं, वो अवार्ड समारोह का हिस्सा नहीं बन पाए. पिछले साल 11 साल की जेल की सजा पर जाने से पहले चीनी असंतुष्ट ने आखिरी बार कुछ लिखा था। इसे उन्होंने अपना आखिरी बयान कहा था

नोबेल पुरस्कार समारोह में लियु की अनुपस्थिति में उनके इस आखिरी बयान को नॉर्वे की अभिनेत्री और फिल्म निर्देशक लिव उलमैन ने पढ़कर सुनाया। श्री लियु द्वारा 23 दिसंबर, 2009 को लिखा यह पूरा बयान यहां प्रस्तुत किया जाता है :

मेरे 50 सालों की जीवन यात्रा में जून 1989 एक महत्तवपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उससे पहले मैं सांस्कृतिक क्रांति (1977) के बाद कॉलेज में प्रवेश प्रक्रिया आरंभ होने के बाद सबसे पहले बैच का छात्र था। उसके बाद मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर उससे आगे पीएच.डी. तक की भी पढ़ाई पूरी की।

स्नातक के बाद मैं बीजिंग नॉर्मल विश्वविद्यालय में लेक्चरार के रूप में काम करने लगा। मैं छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय शिक्षक हुआ करता था। इसके साथ ही आम लोग के बीच मेरी एक बुध्दीजीवी के रूप में भी पहचान थी। 1980 के दशक में मेरे कुछ आलेख और कुछ पुस्तकें प्रकशित हुईं। इनका कुछ प्रभाव पड़ा। मुझे कई जगहों से बोलने के लिए निमंत्रण मिलने लगा। मुझे विजिटिंग स्कॉलर के रूप में अमेरिका और यूरोप के देशो से भी आमंत्रित किया जाने लगा। एक व्यक्ति और एक लेखक के रूप में मैं बस यह चाहता था कि मैं ईमानदारी, जिम्मेदारी और प्रतिष्ठा के साथ जी सकूं।

उसके बाद, चूंकि मैं अमेरिका से 1989 के आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए लौटा था, मुझे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। मुझ पर चीनी क्रांति के विरुध्द प्रचार करने और अपराध करने के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था। उसके बाद मुझे कभी भी सार्वजनिक रूप से भी कुछ बोलने या लिखने की अनुमति नहीं दी गयी। इस तरह मुझे अपने सबसे पसंदीदा काम से रोक दिया गया। सिर्फ एक अलग राजनीतिक सोच को अभिव्यक्त करने और शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल होने के कारण एक शिक्षक ने अपना मंच खो दिया; एक लेखक को प्रकाशन के अधिकार से वंचित कर दिया गया और एक बुध्दिजीवी के सार्वजनिक रूप से बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो कि न सिर्फ मेरे लिए बल्कि तीन दशको के सुधार और खुलेपन के बाद चीन के लिए भी दुख की बात है।

चार जून के बाद मेरे जीवन के सारे महत्वपूर्ण अनुभव अदालत से जुड़े हुए हैं। दो बार सार्वजनिक रूप से बोलने के लिए मिला मौका भी बीजिंग में अदालत में सुनवाई के दौरान ही मिला- एक बार जनवरी 1991 में और दूसरा अब। दोनों बार आरोप हालांकि अलग-अलग थे, लेकिन उनका सार एक ही था- अभिव्यक्ति का अपराध।

आज बीस साल हो रहे हैं, चार जून के निदोष लोगों को चैन की सांस लेने का मौका नहीं मिला। मुझे 1991 में क्विंचेंग की जेल से छूटने के बाद आज तक अपने ही देश में बोलने की आजादी नहीं मिल पाई। मैं सिर्फ विदेशी मीडिया के सहयोग से ही बोल पाता हूं। इसके लिए वर्षों तक मुझ पर नजर रखी गई। मई 1995 से जनवरी 1996 तक मुझ पर निगरानी रखी गई। अक्टूबर 1996 से अक्टूबर 1999 तक मुझे श्रम कारावास में डाल दिया गया और एक बार फिर मुझे कठघरे में खड़ा कर दिया गया है।

लेकिन फिर भी मैं मुझे आजादी से महरूम करने वाले शासन से कहना चाहता हूं कि आज भी मेरे वही विश्वास हैं, जो मैंने 20 साल पहले दो जून की भूख हड़ताल के दौरान जारी घोषणापत्र में जाहिर की थी- मेरा कोई शत्रु नहीं है और मुझे किसी से घृणा नहीं है। वे पुलिस जिन्होंने मुझ पर नजर रखी, मुझे गिरफ्तार किया और मुझसे पूछताछ की, मुझ पर मुकदमा चलाने वाले वकील, या मुझे सजा देने वाले न्यायाधीश इनमें से कोई भी मेरे शत्रु नहीं हैं। मैं हालांकि आपकी निगरानी, गिरफ्तारी, अदालती कार्रवाई या सजा को स्वीकार नहीं कर सकता, फिर भी मैं आपके पेशे, आपकी शख्सियत, जिनमें मुझ पर अभी  मुकदमा चलाने वाले झांग रोंग और पैन जिक्विंग भी शामिल हैं, का सम्मान करता हूं। आप जब 3 दिसंबर को मुझसे पूछ-ताछ कर रहे थे, तब भी मैं आपका सम्मान कर रहा था।

घृणा व्यक्ति के बुध्दि और विवेक को नष्ट कर देता है। इसी तरह दुश्मनी की भावना राष्ट्रीयता की भावना में जहर घोल देती है और हिंसक और निष्ठुर जीवन के लिए उकसाती है, सामाजिक सहनशीलता और मानवीयता को नष्ट कर देती है और देश  में आजादी और लोकतंत्र के विकास में बाधक होती है। इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि अपने जीवन की समस्या का उपयोग मैं राज्य और समाज में हो रहे बदलाव को समझने में कर सकूं, शासन द्वारा किए जा रहे जुल्म के प्रति मेरे मन में बुरे भाव पैदा न हों और मैं घृणा को प्यार में बदल सकूं।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सुधार और खुलेपन से राज्य का विकास हुआ और सामाजिक बदलाव आया। मेरे विचार से इसकी शुरुआत ''वर्ग संघर्ष को सबसे महत्वपूर्ण मानने की सोच'' को त्यागने से हुई, जो माओ युग में सबसे महत्वपूर्ण सिध्दांत माना जाता था। इसके बदले हमने अपने आर्थिक विकास और सामाजिक सहिष्णुता को प्रमुख माना। संघर्ष की सोच को त्यागने की प्रक्रिया के तहत हमने धीरे-धीरे दुशमनी की भावना को कम किया, घृणा की मानसिकता को दूर किया, जो हमारी मानवीय स्वभाव का हिस्सा बन गई थी। इस प्रक्रिया से घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुधार और खुलापन के लिए एक सहज माहौल का निर्माण हुआ। इसके कारण लोगों के बीच फिर से प्यार का विकास हुआ। एक ऐसे माहौल का निर्माण हुआ जिसमें अलग-अलग मूल्यों और अलग-अलग हितो वाले लोग एक साथ रह सकें। इससे लोकप्रिय सृजनात्मकता, गर्मजोशी और मानवीय स्वभाव के मुताबिक प्रोत्साहन का विकास हुआ।

बाहरी देशो के साथ ''साम्राज्यवाद विरोध और संशोधनवाद विरोध'' का त्याग और देश के अंदर ''वर्ग संघर्ष'' के त्याग को उस प्रक्रिया के मूल में माना जाता है, जिसके आधार पर चीन निरंतर सुधार और खुलेपन के साथ आज की स्थिति तक पहुंचा है। अर्थव्यवस्था का बाजारोन्मुख होना, सांस्कृतिक सोच का विविधता की तरफ बढ़ना, व्यवस्था में कानून के शासन के महत्व का बढ़ना इन सभी मे दुश्मनी की भावना के कम होने का फायदा हुआ। शत्रुता की भावना के घटने का राजनीतिक क्षेत्र में भी फायदा हुआ, जहां विकास सबसे धीमा है। राजनीतिक ताकतें सामाजिक विविधता के प्रति अधिक सहिष्णु बनी हैं। असंतुष्टों के दमन में महत्वपूर्ण कमी दर्ज की गई है और 1989 में हुए आंदोलन को ''उकसाने पर हुआ आंदोलन'' की जगह ''राजनीतिक अस्थिरता'' का नाम दिया जाने लगा है।

शत्रुता की सोच में कमी आने से राजनीतिक ताकतों ने धीरे-धीरे मानवाधिकार के विचार को जगह देना शुरू किया। चीनी सरकार ने 1998 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से वादा किया कि वह संयुक्त राष्ट्र के दो मानवाधिकार समझौतों पर हस्ताक्षर कर देगा। इस स्वीकृति के साथ ही चीन ने मानवाधिकार के अंतर्राष्ट्रीय मानकों को मान्यता दी। इसके बाद 2004 में नैशनल पीपुल्स कांग्रेस ने पहली बार संविधान में जोड़ा कि ''राज्य मानवाधिकार की रक्षा करेगा''। इस तरह चीन में मानवाधिकार को ''कानून का शासन'' का मूलभूत सिध्दांत बनने का संकेत मिला। इसी बीच मौजूदा सरकार ने ''सबसे पहले जनता'' और ''सहिष्णु समाज का निर्माण'' को भी संविधान में जोड़ने का प्रस्ताव रखा, जिससे पार्टी की शासन के प्रति सोच में विकास का संकेत मिला।

मेरे गिरफ्तार होने के बाद से मैंने खुद भी ऊपरी स्तर पर हुए इस विकास को महसूस किया।

मैं हालांकि यह कहता रहूंगा कि मैं बेगुनाह हूं और मुझपर लगाया गया आरोप असंवैधानिक है, इसके बावजूद जबसे मैंने अपनी आजादी खोई है, तब से मैंने दो अलग-अलग जगहों पर कारावास, सुनवाई से पहले चार पुलिस अधिकारियों, मुकदमा चलाने वाले तीन वकीलों और दो न्यायधीशो को देखा है। इनमें से किसी में भी मैंने सम्मान की कमी नहीं पाई, किसी ने भी अनावश्यक मामले को लटकाया नहीं और किसी ने भी जबरदस्ती कुछ कबूल करने पर मजबूर नहीं किया। उनके शांत और सौम्य व्यवहार से हमेशा सद्भावना का ही प्रदर्शन हुआ। मुझे 23 जून को घर की नजरबंदी से हटाकर ''बीजिंग म्युनिस्पल पब्लिक सेक्योरिटी ब्यूरो डिटेंशन सेंटर नंबर 1'', जिसे ''बिकन'' कहा जाता है, में डाल दिया गया। इस स्थान पर बिताए छह महीनों के दौरान मैंने निगरानी प्रक्रिया में हुए विकास को देखा।

मैंने 1996 में पुराने बिकन (बंबूकियाओ) में समय बिताया और 10 साल पहले के बिकन से इसकी तुलना की। मैंने पाया कि वहां साधन-सुविधाओं में बढ़ोतरी हुई है और प्रबंधन का रवैया पहले से अधिक लचीला हुआ है। खास तौर पर बिकन के नये मानव प्रबंधन में काफी विकास हुआ। यह बंदियों के अधिकारों और उनके सम्मान पर आधारित था। इसमें बंदियों के शब्दों और कार्यों के प्रति बहुत लचीलापन था। यहां भोजन करते समय, सोने जाते समय और जागते समय संगीत बजता था। इससे बंदियों को सम्मान और गर्मजोशी का अहसास होता था, उन्हें लगता था कि उसके शरीर की हर कोशिका जीवित है। प्रबंधन अब पहले की तरह वार्ड संरक्षकों को जेल या बंदियों का भगवान नहीं मानता था। यहां न सिर्फ मानवीय सुविधाएं दी जा रही थीं, बल्कि बंदियों के लिए अदालती प्रक्रिया में भी काफी सुधार आया था। मेरा अपने सेल के अधिकारी लियु झेन से घनिष्ठ संबंध हो गया था। बंदियों के प्रति उनके सम्मानजनक और संवेदनशील व्यवहार से काफी अच्छा अहसास होता था। ये सब बातें प्रबंधन की हर बातों और कार्यों में दिखलाई पड़ती थीं। मेरे लिए तो बिकन में ईमानदार, जिम्मेदार, सुहृदय लियु झेन का मिलना एक सौभाग्य की बात थी।

राजनीतिक विश्वास ऐसे ही निजी अनुभवों से बनते हैं। मैं मानता हूं कि चीन का राजनीतिक विकास कभी नहीं रुकेगा। मुझे पूरी आशा है कि भविष्य में चीन में आजादी आएगी। क्योंकि कोई भी ताकत आदमी की आजादी की इच्छा को दबा नहीं सकता है। चीन अंतत: कानून के शासन वाला देश बनेगा, जहां मानवाधिकार का स्थान सबसे ऊंचा होगा। मैं इस मामले की सुनवाई में भी ऐसे ही विकास की आशा करता हूं। मैं आशा करता हूं कि एक न्यायपूर्ण फैसला होगा, जा इतिहास की कसौटियों पर खड़ा उतरेगा।

आप जानना चाहेंगे कि पिछले दो दशको में मेरे साथ सबसे अच्छा क्या हुआ? मुझे अपनी पत्नी, लियु जिया, का नि:स्वार्थ प्रेम मिला। वह आज अदालत में नहीं आ सकती, लेकिन मैं तुम्हें फिर भी यह बताना चाहता हूं प्रिये, कि मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे लिए तुम्हारा प्यार यूं ही बना रहेगा। बिना आजादी के बिताए मेरे जीवन के पिछले कुछ सालों मेें हमारे प्यार में बाहरी परिवेश के कारण कुछ कड़ुवाहट मिल गई, लेकिन आज मैं जब मुड़कर देखता हूं, तो पाता हूं कि हमारा प्यार अनंत है। मेरी सजा तो साफ तौर पर दिखाई पड़ती है, लेकिन तुम इंतजार की जो सजा भोग रही हो, उसे आंखों से देखा नहीं जा सकता है। तुम्हारा प्यार मेरे लिए सूरज की किरण है, जो मेरे जेल की दीवार और सलाखों को भेदकर मेरे शरीर के एक-एक ईंच पर पड़ता है, जिससे मुझे ऊर्जा मिलती है और मैं अपनी मानसिक और भावनात्मक सहजता को बनाए रख पाता हूं और कारावास में बीतने वाला मेरा हर पल सार्थक लगता है। लेकिन तुम्हारे प्रति मेरा प्यार अपराधबोध और पश्चाताप से भरा है। कभी-कभी यह अपराध बोध इतना बढ़ जाता है कि मैं ठीक से चल भी नहीं पाता हूं। मैं अकेले में खड़ा और तूफानों के थपेडे खाता एक पत्थर हो गया हूं, जो इतना जीवन हीन और ठंडा हो गया है कि उसे कोई छूना नहीं चाहता है। लेकिन मेरा प्यार दृढ़ है। इसकी धार तेज है, जो किसी भी बाधा को पार कर सकता है। चाहे मुझे चकनाचूर कर दिया जाए, फिर भी मैं अपनी राख से उठकर तुम्हें अपनी बाहों में भर लूंगा।

तुम्हारा प्यार यूं ही बना रहे, तो प्रिये, मैं बिना विचलित हुए एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में शांति बनाए रखते हुए सभी अदालती कार्रवाई झेल जाउंगा। मैं आशा करता हूं कि एक दिन हमारे देश् में अभिव्यक्ति की आजादी आएगी, जहां सभी की आवाज को समान महत्व मिलेगा; जहां अलग-अलग सोच और विचार एक-दूसरे से प्रतियोगिता करेंगे और एक साथ मिलकर शांति से रह भी सकेंगे; जहां बहुमत और अल्पमत की आवाज को समान अवसर मिलेगा, खास तौर पर सत्ता में बैठे लोगों की राजनीतिक सोच से अलग सोच रखने वालों को भी पूरी सुरक्षा मिलेगी; हर कोई अपने राजनीतिक विचार बिना डर के अभिव्यक्त कर सकेगा और विरोध जताने वालों पर कभी जुल्म नहीं किया जाएगा; उम्मीद करता हूं कि जांच प्रक्रिया का शिकार होने वाला मैं अंतिम भुक्तभोगी होउंगा और इसके बाद किसी को भी बोलने के कारण जेल में नहीं डाला जाएगा।

अभिव्यक्ति की आजादी मानवाधिकार का आधार है, यह मानवता का स्रोत है और सत्य की जननी है। अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाना मानवाधिकार को कुचलने जैसा है, मानवता का गला घोंटना है और सत्य को दबाने की कोशिश करने जैसा है।

अभिव्यक्ति की आजादी के अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग करने और एक चीनी नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए मैं अपने आप को अपराधी महसूस नहीं मानता। मुझपर भले ही इसका आरोप लगाया गया है, लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं है। धन्यवाद!