स्वतंत्रता एवं समानता

स्वतंत्रता सर्वोच्च राजनैतिक मूल्य के रूप में
समाजवादी मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की इस आधार पर भी आलोचना करते हैं कि यह असमानता को बढ़ावा देती है। उनका विश्वास है कि राज्य के हस्तक्षेप व नियंत्रण से वे समानता को बढ़ावा दे सकते हैं। यही जवाहर लाल नेहरू का समाज का समाजवादी ढांचा (Socialistic pattern of society) नामक ‘महान’ दर्शन था।

जो बाजार में विश्वास रखते हैं वे समानता में विश्वास नहीं रखते। वे स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।

राज्य से आजादी

यानि कि हमें प्राकृतिक अवस्था के निकट होना चाहिए। इसी को एडम स्मिथ प्राकृतिक स्वतंत्रता (Natural Liberty) की संज्ञा देते हैं। यदि हम प्रकृति को देखें तो हमें पेड़-पौधों व जंतुओं में वृहद स्तर पर विविधताएं दिखायी देती हैं। प्रकृति में छोटी घास, बड़े पेड़, सभी झाड़ियां, लताएं एवं बेल दिखाई देती हैं जो प्रकृति में पल-बढ़ सकती हैं। प्राकृतिक व्यवस्था में हमें समानता और एकरूपता नहीं मिलती। समाजवादी दृष्टिकोण- जिसे नेहरू समाज का समाजवादी ढांचा कहते थे- एकरूपता से कटी हुई झाड़ी (hedges) का दृष्टिकोण था, जिसमें सरकार माली की तरह कार्य करती है। वर्तमान में, स्वाभाविक रूप से माली ही अपने निहित स्वार्थों के लिए बागीचों को नष्ट कर रहा है। समाज रूपी बगीचा बिना माली के ज्यादा बेहतर रहेगा।

यह स्वतंत्रतापूर्वक प्राकृतिक तरीके से बढ़ेगा। सरकारी नियंत्रण से मुक्त, मुक्त बाजार, मनुष्य प्रजाति को प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Eco-system) उपलब्ध कराता है, जहां हम सभी अपनी विशेषताओं एवं गुणों के आधार पर अपना विशेष स्थान तलाश कर सकते हैं और जीवन यापन कर सकते हैं। इसमें बड़े पेड़ भी होंगे और छोटी घास भी होगी, झाड़ियां भी होंगी और लताएं भी होंगी। हममें कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो अपने कौशलों के लिए बड़े पुरस्कार पायेंगे- जैसे सचिन तेंदुलकर। किसी पर भी जबरदस्ती कृत्रिम एकरूपता थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वतंत्रता सर्वोपरि है। स्वतंत्रता सर्वोच्च आर्थिक एवं राजनैतिक मूल्य है।

जब हम स्वतंत्रता को सर्वोपरि स्थान देते हैं तो हम जो होना चाहते हैं और जो करना चाहते हैं वह होने और करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। यदि हम किसी अन्य मूल्य, जैसे – समानता को स्वतंत्रता से उच्च स्थान देते हैं तो हम अपनी स्वतंत्रता को व्यर्थ समस्या में खो देते हैं।

समाजवादियों ने कभी भी समानता को बढ़ावा नहीं दिया। उल्टे उन्होंने हमारी स्वतंत्रता भी छीन ली। उन्होंने जी हुजूर, माई-बाप वाला वीआईपी कल्चर (संस्कृति) पैदा कर दिया है, जिसमें प्रत्येक आम आदमी को अधिकारी (authority) के सामने झुकना और नाक रगड़ना पड़ता है।

हमें समाजवादियों के समानता के मिथ्या दर्शन को अस्वीकार कर देना चाहिए और इसके बजाय उनसे स्वतंत्र होने का प्रयास करना चाहिए।

स्वतंत्रता सर्वोपरि !!

- सीसीएस द्वारा प्रकाशित ‘उदारवादः राज, समाज और बाजार का नया पाठ’ पुस्तक के ‘स्वतंत्रता एवं समानता’ पाठ से उदधृत

 

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