कारोबार में दलितों की दस्तक

सैकड़ों-हजारों वर्षो से दबे-कुचले दलित अब छोटी-मोटी नौकरी करके ही खुश नहीं हैं। वे बिजनेस की दुनिया में भी जगह बना रहे हैं। संपर्को, संसाधनों के मोर्चे पर पिछड़े दलितों को कारोबार की मजबूत किलेबंदी भेदने में दिक्कतें तो आ रही हैं, लेकिन वे हौसले के साथ इस काम में जुटे हैं और उन्हें सफलता भी मिल रही है। फिक्की, एसोचैम और सीआइआइ की तर्ज पर दलितों ने भी अपना संगठन दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की) बना लिया है। यह संगठन दलितों में उद्यमिता की भावना जगा रहा है और दलित उद्यमियों को आर्थिक व तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है।
उद्यमिता की ओर दलितों के झुकाव की प्रमुख वजह सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगारों के अवसरों में कमी आना है। 1997 में सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार 197 लाख थे। इसके बाद इनमें लगातार गिरावट आ रही है। 2007 में यह आंकड़ा 180 लाख पर आ गया। इसके अलावा 20 करोड़ की दलित आबादी के लिए पहले भी पर्याप्त सरकारी रोजगार उपलब्ध नहीं थे। 1दलित उद्यमियों की व्यावसायिक पहल का श्रेय आउटसोसिर्ंग और सहायक उद्योगों को दिए गए प्रोत्साहन को दिया जा रहा है। इन प्रोत्साहनों से ही दलितों में उद्यमिता के अंकुर फूटे हैं।
दलित चिंतक डा. चंद्रभान प्रसाद ने एक अध्ययन में पाया कि आर्थिक उदारीकरण का दौर दलितों के लिए और खास तौर से दलित उद्यमियों के लिए फायदेमंद रहा है। उदारीकरण में व्यवसाय का परंपरागत ढांचा टूटा और नए वर्गो को भी इस क्षेत्र में भागीदारी का मौका मिला। अब बात करते हैं एक दूसरे अध्ययन की, जो दिल्ली की आजादपुर फल और सब्जी मंडी में दलित आढ़तियों की तलाश से जुड़ा हुआ है। यह अध्ययन डिक्की के सदस्यों ने किया। उन्हें आजादपुर मंडी में कोई दलित आढ़ती नहीं मिला। दलितों में राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक चेतना तो मौजूद है, लेकिन अनुभवहीनता के कारण व्यावसायिक क्षमता का अभाव है। इस कमी को पूरा करने के लिए डिक्की का गठन किया गया है। अब तक इसके आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र चैप्टर खुल चुके हैं तथा पूरे देश में इसके करीब 3,000 सदस्य बन चुके हैं।1प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने, संघर्ष करने से सफलता जरूर मिलती है। मारवाड़ियों, पारसियों और सिंधियों का उदाहरण सामने है। इन सबने कठिन परिस्थितियों में संघर्ष किया और संपन्न बने।
अब दलितों का समय है। दलित व्यापार में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। चंद्रभान प्रसाद का कहना है- हम भी बाबा साहब अंबेडकर की तरह सूट पहनते हैं। अंग्रेजी बोलते हैं। हम आरक्षण के बल पर नहीं, अपने दम पर आगे बढ़ना चाहते हैं। 1महाराष्ट्र में दलित उद्यमी वास्तव में तेजी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। रियल एस्टेट से लेकर दस्ताने बनाने तक के अनेक छोटे-बड़े क्षेत्रों में दलित सफलता अर्जित कर रह हैं और हजारों लोगों को रोजगार दे रहे हैं। महाराष्ट्र में चीनी मिल के कारोबार में नए लोगों के प्रवेश के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। विपरीत हालात में 20 सालों के लंबे प्रयास के बाद तीन साल पहले स्वप्निल भिंगारदवे महाराष्ट्र के पहले दलित चीनी मिल मालिक बने। उनके कुछ कारोबार पहले से भी चल रहे थे। उनके सभी कारोबारों का सालाना टर्नओवर 90 करोड़ रुपये है। उन्होंने 250 लोगों को रोजगार दिया है। महाराष्ट्र में इन युवा दलित उद्यमियों के बढ़ते कदमों की आहट अभी धीमी है, लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं। 300 दलित कारोबारियों से मिलकर बनी डिक्की का सालाना टर्नओवर पांच हजार करोड़ का है। अभी यह पहल शैशवावस्था में ही है। इस मुहिम के साथ देशभर के दलित उद्यमियों का जुड़ना शेष है।
हाल ही में डिक्की ने दलित उद्यमियों के लिए एक ट्रेड फेयर ‘दलित डीप एक्सपो’ का आयोजन पुणो में किया। उस आयोजन को देखने के लिए देश भर से व्यवसायी एकत्रित हुए। आयोजकों ने इस बात का विशेष ख्याल रखा कि आयोजन का आर्थिक बोझ ट्रेड फेयर में स्टॉल लगाने वाले छोटे उद्यमियों पर ना पड़े। उन्हें नाममात्र की दरों पर स्टाल उपलब्ध कराए गए। यह आयोजन का कमाल ही था कि कम प्रचार के बावजूद इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली के लगभग सौ व्यवसायी शामिल हुए। सवाल है कि देश में फिक्की, एसोचैम, सीआइआइ जैसी बड़े-बड़े कॉरपोरेट संगठन और व्यावसायियों के हितों का ख्याल रखने वाली संस्थाएं पहले से मौजूद हैं। अब तक इन्होंने दलितों के लिए क्या किया है? इनमें दलितों की भागीदारी कितनी है? जाहिर है इन सवालों का जवाब निराशाजनक ही होगा। इसमें कोई शक नहीं कि पूंजीवादी भावना के कारण ही दलितों का उत्थान हुआ है।
पहले दलित दो ही काम कर सकते थे, राजनीति या सरकारी नौकरी। अब दलित नौजवान कारोबारी बनना चाहते हैं। उन्हें डिक्की के जरिये पूंजी और तकनीक मुहैया कराई जा रही है। सरकार ने नियम बना दिया है कि एसएमई से होने वाली 30 फीसद खरीद दलित एसएमई से ही होनी चाहिए। टाटा मोटर्स में भी यही व्यवस्था की गई है। यह बेहतरीन मौका है। पिछले साल मुंबई में दलित एक्सपो में रतन टाटा और गोदरेज भी आए थे। टाटा ने शालीनता से कहा कि वह दलित उद्यमियों को सलाम करते हैं। 
कभी दलितों के हाथ का छुआ न खाने वाले आज कारोबार में उनकी भागीदारी का स्वागत कर रहे हैं। नैनो, पल्सर, हीरो होंडा बनाने में दलितों की भागीदारी है। भारत में करीब 20 करोड़ दलित हैं। दलित चिंतक डी श्याम बाबू के मुताबिक देश की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी छठे भाग के बराबर है, पर उनके पास देश की संपत्ति का सिर्फ एक फीसद हिस्सा है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त और विकास निगम जैसी सरकारी संस्थाओं के गठन के बावजूद दलित कारोबारी समुदाय को पूंजी हासिल करने में हमेशा दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। कुल मिलाकर अब दलित सरकारी नौकरियों पर ही निर्भर नहीं रहे। वे कारोबार की दुनिया में दस्तक दे रहे हैं। वे नए सपने देख रहे हैं और उन्हें साकार करने में जुटे हैं।
 
 
- विवेक शुक्ला (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण