नए नेतृत्व का एजेंडा

दुनिया आशावाद और निराशावाद में बंटी हुई है। आर्थिक आशावादियों का विश्वास है कि यदि सरकार बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश करे और उद्यमियों के समक्ष मौजूद बाधाओं को दूर करे तो बड़ी तादाद में नौकरियों के सृजन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का विकास संभव होगा। इससे कर राजस्व बढ़ेगा, जिसका निवेश गरीबों पर किया जा सकेगा। यदि कुछ दशक तक हम इस नीति का अनुकरण करें तो हमारा देश धीरे-धीरे मध्य वर्ग में तब्दील हो जाएगा। दूसरी ओर निराशावादियों की भी कुछ चिंताएं हैं, जिनमें असमानता, क्रोनी कैपिटलिज्म, पर्यावरण का क्षरण, शहरीकरण की बुराई आदि शामिल हैं। ये समस्याएं वास्तविक हैं, लेकिन आशावादियों का ध्यान अवसरों पर केंद्रित है। यहां हमें नहीं भूलना चाहिए कि सफल देशों का नेतृत्व आशावादी ही कर रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही एक आशावादी थे। अपनी पार्टी में निराशावादियों की मौजूदगी के बावजूद उन्होंने ऐसी नीतियों पर ध्यान केंद्रित किया जिससे उच्च विकास दर हासिल की जा सकी। उनका भारत शाइनिंग था, लेकिन उनके बाद की संप्रग सरकार का नजरिया आधा गिलास खाली वाला रहा। संप्रग सरकार में शीर्ष स्तर पर आशावादी नेतृत्व के बावजूद निराशावाद हावी रहा। इस सरकार ने विकास की बहस को समानता की ओर मोड़ दिया, जिससे उच्च मुद्रास्फीति या कहें महंगाई को बल मिला और विकास की गाड़ी पटरी से उतर गई।

आज वर्ष 2014 में भारत एक बार फिर से संक्रमण के दौर में है। हमें उम्मीद रखनी चाहिए कि 2014 के चुनाव में संप्रग सरकार के एक दशक तक चले निराशावादी शासन के बाद फिर से आशावादियों की जीत होगी। इस दिशा में हमें आठ नए विचारों पर ध्यान देना होगा, ताकि विकास की उच्च दर हासिल हो सके। यहां पहली आवश्यकता आर्थिक विकास की है, जिसके लिए विकास तथा समानता के बीच संतुलन बिठाने जैसी झूठी बातों को खारिज करना होगा। यह नीति संप्रग एक के शासनकाल में वामपंथियों और संप्रग दो के समय में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अनुचित दखल की देन है। विकास दर तेज होने से टैक्स आदि के माध्यम से सरकारी राजस्व में वृद्धि होती है, जिसका निवेश कल्याणकारी कार्यक्रमों में किया जा सकता है। इस समय इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस बारे में अब मजबूत प्रमाण भी है कि स्वर्णिम चतुभरुज योजना से राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास दस किमी के दायरे में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हुआ।

दूसरी बात यह कि कोई भी उद्यम शुरू करने के लिए तकरीबन 70 स्वीकृतियां लेनी होती हैं (योजना आयोग की नई विनिर्माण नीति के मुताबिक)। इन्हें खत्म करके हमें सिंगल विंडो सिस्टम शुरू करना चाहिए। इस लक्ष्य को हमारे प्रतिस्पर्धी देश हासिल कर चुके हैं। भारत में कुख्यात लालफीताशाही के कारण ही विश्व बैंक की बिजनेस रिपोर्ट में हमारे देश को निचले पायदान पर रखते हुए 134वां स्थान दिया गया है। प्रत्येक देश को अपने पर्यावरण की रक्षा अनिवार्य रूप से करनी चाहिए, लेकिन कोई भी देश अपनी सैकड़ों परियोजनाओं को इस प्रक्रिया के तहत अटका कर नहीं रख सकता। लालफीताशाही के कारण हमारे देश की एक ऐसी छवि बन गई है कि ईमानदार उद्यम खड़ा करने के लिहाज से भारत सर्वाधिक प्रतिकूल देश है। यहां यह जोड़ना गलत नहीं होगा कि कई राज्यों में इंस्पेक्टर राज के कारण छोटे उद्यमियों का पनप पाना बहुत ही मुश्किल है। इसका सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव राजस्व विभाग पर पड़ता है, जिनमें आयकर, उत्पाद कर और सीमा शुल्क शामिल हैं। यह सही है कि इस तरह की बाधाओं का सामना बड़े व्यापारी कर सकते हैं, लेकिन छोटे उद्यमियों के पलायन का यह एक बड़ा कारण है। हालांकि सच यही है कि छोटे उद्योगों में ही बड़े पैमाने पर रोजगारों का सृजन होता है। इस संदर्भ में तीसरा अच्छा कदम अथवा काम है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को हकीकत में लाना ताकि भारत एक राष्ट्रीय बाजार बन सके। जीएसटी से अप्रत्यक्ष करों की बुराई खत्म होगी, जिनमें राज्य बिक्री कर, केंद्रीय बिक्री कर, उत्पाद शुल्क, सेवा कर, प्रवेश कर आदि शामिल हैं। इसके अमल से कर राजस्व बढ़ेगा, काले बाजार की अर्थव्यवस्था खत्म होगी।

चौथा कदम, श्रम कानूनों में सुधार करके बड़ी तादाद में औपचारिक नौकरियों के सृजन का है। सरकार और नियोक्ताओं के अंशदान से एक श्रमिक कल्याण कोष बने, जिससे अस्थायी बेरोजगारों को वित्तीय मदद और प्रशिक्षण देने का काम हो। सफल देशों में कर्मचारियों को रखने और निकालने की छूट होती है, लेकिन उन्हें अन्य सुरक्षा उपायों से संरक्षण दिया जाता है। भारत के श्रम कानून आजीवन नौकरी की वकालत करते हैं। यही कारण है कि भारतीय कंपनियां स्थायी नियुक्ति के बजाय नब्बे फीसद अस्थायी नियुक्तियां करती हैं। हमारी आधी से अधिक आबादी कृषि कार्यो में लगी हुई है, इसलिए देश में दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता है। इसके लिए कई कदम उठाने होंगे। पहला काम कृषिगत उत्पाद बाजार समितियों या एपीएमसी को खत्म करने का है, क्योंकि यह मंडियों में थोकविक्रेता संघ के रूप में काम करते हैं। खुले बाजार में व्यापारियों और किसानों को स्वतंत्र रूप से खरीद-बिक्री का अधिकार होना चाहिए। जब बड़े फुटकर विक्रेता किसानों से खरीदारी करते हैं तो वह शीत भंडारण गृह के माध्यम से खाद्यान्नों को सड़ने से बचाते हैं। इससे किसानों का लाभ बढ़ता है और उपभोक्ता कीमतों में गिरावट आती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली भी खत्म होनी चाहिए। जीएम फसलों पर संप्रग सरकार का फैसला नुकसानदायक साबित हुआ है। बीटी कपास से पांच वर्षो में भारत का कपास उत्पादन दोगुना हो गया और हम दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक बने। कृषि उत्पादों के मद्देनजर हमें एक स्थिर आयात-निर्यात नीति बनानी होगी। इसके अलावा हमें उन अतार्किक शर्तो को भी खत्म करना होगा जो वैश्विक खुदरा व्यापारियों को भारत आने से रोकती हैं। इस संदर्भ में भाजपा को अपने विरोध को लेकर नए सिरे से विचार करना चाहिए।

छठा कदम वैसे होटलों, एयरलाइन, बैंक और अप्रतिस्पर्धी सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का है, जिनसे देश को नुकसान हो रहा है। कोल इंडिया का भी एकाधिकार खत्म होना चाहिए। सातवें कदम के तहत सभी तरह की सब्सिडी खत्म की जाए और यह पैसा संबंधित परिवारों की महिला मुखिया के खाते में नकद जमा कराया जाए। मनरेगा, पीडीएस, खाद्य निगम समेत अन्य सभी हानिकर योजनाएं बंद हों। अंत में शिक्षा क्षेत्र में लाइसेंस राज को खत्म किया जाए ताकि बेहतर निजी स्कूलों के माध्यम से जरूरतों को पूरा किया जा सके। यह एक बड़ा एजेंडा है, जो आशावादी नेतृत्व के हाथों ही क्रियान्वित हो सकता है। नए नेतृत्व को न केवल इन नीतियों की घोषणा करनी चाहिए, बल्कि इनकी प्रगति की निगरानी भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

 

- गुरचरन दास

(लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी से जुड़े हुए हैं और प्रख्यात स्तंभकार हैं)

साभारः दैनिक जागरण

गुरचरण दास