सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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समलैंगिकता के विरोधियों का तर्क है कि समलैंगिकता और अप्रजननमूलक यौनाचार परंपरा-विरुद्ध और पश्चिम से आयातित है। लेकिन इस बात के प्रमाण बड़ी संख्या में मिलते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष के बीच प्रजननमूलक यौन-क्रिया के अलावा विभिन्न प्रकार के यौन-संबंध हमेशा से बनते रहे हैं। साथ ही, ऐसे यौनाचारों को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएं भी रही हैं। पढ़ें :
 
समलैंगिकता: बहस के कुछ सन्दर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है। ट्विटर पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का काफी विरोध हो रहा है। सेक्शन 377 को खत्म करने की एक मुहिम चली हुई है। पढ़िए, जानेमाने लोगों ने क्या लिखा...

भारत ने प्रेम बैन कर दिया है। शेम...शेम।

तस्लीमा नसरीन, लेखिका

हम गे कपल्स के पीछे पुलिस लगा देंगे। क्या 21वीं सदी में ऐसा भारत होना चाहिए?

370 हटाने पर दृढ़, फैसला थोपेंगे नहीं
 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को हमें दो पहलुओं से देखना होगा। इसका ऐतिहासिक पक्ष और फिर मौजूदा स्थिति। आजादी के ठीक पहले देश का 60 फीसदी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया में था और 40 फीसदी हिस्सा रियासतों में बंटा हुआ था। आबादी के लिहाज से 30 करोड़ लोग ब्रिटिश इंडिया में रहते थे और शेष 10 फीसदी रियासतों में। कुल 552 रियासतें थीं, जिनमें जम्मू-

राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा जंग-ए-आजादी के समय लिखी गई कविता “अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी” आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि उस दौर में हुआ करती थी। महिलाओं की स्थिति के बाबत कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘वुमन्स रीजनल नेटवर्क’ (डब्लूआरएन) द्वारा प्रस्तुत शोधपत्र तो कम से कम यही प्रदर्शित करता है। संस्था द्वारा अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के कॉन्फ्लिक्ट जोन (संघर्ष वाले क्षेत्रों) में निवास करने वाली महिलाओं की स्थिति का सैन्यीकरण, सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे तीन महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर आंकलन किया गया।

पिछले कुछ महीनों से देश में एक अजीब-सी मायूसी छा रही थी। महत्वपूर्ण नीतियों में विलंब, भ्रष्टाचार और लोकमत को अनदेखा करने की प्रवृत्ति से निराशा का माहौल बन गया था। लेकिन हताशा के ये बादल अब धीरे-धीरे हटते नजर आ रहे हैं। शुक्रिया उन नागरिकों का जिन्होंने जनहित में लड़ाई लड़ी। इसके अलावा माहौल में परिवर्तन में न्यायालय के निर्णयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं की बदौलत राजनीतिक सुधारों के नागरिकों के प्रयास आंशिक रूप से ही सही, सफल हो पाए। आखिरकार जनता के दबाव और चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण सरकार को अंतत: कार्रवाई करनी ही पड़ी

18 सितंबर को ग्रीस के निवासी उस समय काफी आहत हुए जब उन्हें वामपंथी रैप गायक की हत्या और पूर्व में नियो नाजी पार्टी से संबंधित गोल्डेन डॉन के एक सदस्य द्वारा हत्या की बात कबूलने की बात पता चली। यह पार्टी उस समय देश में हो रहे ओपिनियन पोल्स में तीसरे क्रम पर चल रही थी। इस मामले को लेकर मचे बवाल के कुछ दिनों के बाद, लोक व्यवस्था मंत्री ने गोल्डेन डॉन से संबंधित 32 आपराधिक मुकदमों का खुलासा प्रमुख अभियोजन के समक्ष किया, जिसे पार्टी के आपराधिक संगठन होने के बाबत फैसला करना था। अगले सप्ताहांत (28 व 29 सितंबर) को गोल्डेन डॉन नेता निकोलस माइकलोलियाकोस, चार अन्य

राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ जारी अभियान अपने निर्णायक मोड़ पर है, लेकिन इसे अभी खत्म नहीं माना जा सकता। तब तो और नहीं, जब हमारे संसदीय लोकतंत्र की नैतिकता में लगातार गिरावट की चिंता स्पष्ट है और इस पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा भी हो रही है। इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला 10 जुलाई, 2013 को आया, जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (4) को निरस्त कर दिया। इसके तहत किसी भी मामले में दोषी और कम से कम दो साल की सजा पाए सांसद या विधायक की सदस्यता खत्म हो जाएगी। साथ ही, वह छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य होगा। इस

दागी नेताओं को अयोग्य ठहराने और नकारात्मक मतदान को वैधता देने वाले सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला, एक अरसे से लंबित चुनाव सुधार की जरूरत को बल प्रदान करने वाले हैं। इन फैसलों पर देश में व्यापक सकारात्मक प्रतिक्रिया का आना, संकेत है कि चुनाव सुधार के पक्ष में जनमत तैयार हो रहा है। सुधार को लेकर चुनाव आयोग पहले से ही कोशिशें करता रहा है, लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र में बदलाव और सुधार की जो प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए वैसा कुछ फिलहाल नहीं दिख रहा। जो समाधान लोकतंत्र के सर्वोच्च निकाय संसद से निकलना चाहिए वो न्यायालय से

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