सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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मोदी सरकार के मंत्री जितेन्द्र सिंह ने अनुच्छेद 370 की प्रासंगिकता पर एक बार पुन: बहस की शुरुआत कर दी है। इस पर स्वस्थ बहस का स्वागत करने के बजाय उमर अब्दुल्ला ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यह ठीक नहीं है। किसी विषय पर स्वस्थ बहस लोकशाही की सबसे बड़ी ताकत होती है और संविधान के अनुच्छेद 370 सहित ऐसा कोई भी विषय नहीं है जिसको बहस की स्वस्थ परंपरा से वंचित रखा जाना चाहिए। उमर अब्दुल्ला जैसे कुछ लोग अनुच्छेद 370 को जम्मू-कश्मीर की ब्रह्मनाल के रूप में निरूपित करते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे अलगाववाद का मुख्य कारक मानते हैं।
इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) क्रिकेट का सातवां संस्करण जैसे जैसे अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, इस खेल का रोमांच और खेल प्रेमियों के बीच उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। हालांकि बीच बीच में आईपीएल के पिछले संस्करण के दौरान की "स्पॉट फिक्सिंग" की घटना से संबंधित खुलासे से मन में कड़वाहट घुल जाती है। फिर अचानक से क्रिकेट के इस प्रारुप पर प्रतिबंध लगाने की मांग शुरू हो जाती है। नाराज लोग विशेषकर खेल विश्लेषक हर तरह की सट्टेबाजी पर रोक लगाने और फिक्सरों और सट्टेबाजों को जेल में डालने की मांग करने लगते हैं। 
देश का राजनीतिक नेतृत्व आदर्शों की दुहाई देता फिरता है लेकिन अपनी सुविधाओं का मोह नहीं छोड़ पाता। आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में बताया गया है कि 22 ऐसे पूर्व मंत्री हैं, जिनका अभी भी सरकारी बंगले पर कब्जा है। इनमें से पांच मंत्री ऐसे हैं, जिन्होंने सितंबर 2012 में ही अपना पद छोड़ दिया था। बंगले पर कब्जा जमाने वालों में कांग्रेस, टीएमसी, आरजेडी और डीएमके के नेता शामिल हैं। हां, इनमें से लालू यादव के अनुरोध पर सरकार ने उन्हें एक साल तक मंत्री वाले बंगले में रहने की इजाजत दे दी है। लेकिन और लोगों ने अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी है
भारत की आर्थिक विकास दर 9 फीसदी सालाना से घटकर 4.5 फीसदी हो जाने की एक बड़ी वजह यह है कि इन्क्लूसिव ग्रोथ के नाम पर न्यायपालिका और विधायिका ने पूरी तरह जायज कारोबार को भी बेहद मुश्किल बना दिया है। अभी एक नई कोयला खदान शुरू करने में 12 साल लग जाते हैं। यह इन्क्लूसिव ग्रोथ नहीं है। इसे ठहराव या गतिहीनता कहते हैं। नए भूमि अधिग्रहण कानून का मकसद है किसानों से जल्दी और विधिसम्मत तरीके से जमीन लेना।
 
लेकिन औद्योगिक नीति और उत्पादन विभाग
देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिए पर रहे हैं। शासन और प्रशासन द्वारा हमेशा से उन्हें शहर की समस्या में ईजाफा करने वाले और लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा माना जाता रहा है। हालांकि सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), नासवी व सेवा जैसे गैर सरकारी संगठन देशव्यापी अभियान चलाकर छोटे दुकानदारों और फेरीवालों की समस्याओं को दूर करने के लिए उचित संवैधानिक उपाय की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए पिछले दिनों लोकसभा से प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड एंड
विभिन्न मामलों में न्यायपालिका द्वारा दी जाने वाली व्यवस्थाओं और टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस पर आश्चर्य होता है कि आखिर हम भारतीय लोग अधिकांश समय न्यायाधीशों को इस तरह की सक्रियता दिखाने के लिए क्यों विवश करते हैं। इस संदर्भ में जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वह यह कि भारत में आज जिस तरह की न्यायिक निगरानी व्यवस्था है यदि वैसा कुछ नहीं होता तो क्या होता? फिर बात चाहे 2जी घोटाले की रही हो, खनन घोटाले की या फिर कोयला खदानों के आवंटन में हुए घपले-घोटालों की, इन सभी मामलों की निगरानी के कार्य में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण और सक्रिय
अगर इस चुनाव अभियान में जो अभी कायदे से शुरू भी नहीं हुआ है, नेताओं द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों और भाषा का उदाहरण देने की कोशिश की जाए तो इस आकार के कई लेख तो उन उदाहरणों से भर जाएंगे। सिर्फ यह कहकर ही बात शुरू की जाए कि हम बदजुबानी-असंसदीय भाषा और ठेठ देसी हिसाब से कहें तो गाली-गलौज की भाषा पर चर्चा करना चाहते हैं। किसी को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि हम राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, मुलायम सिंह यादव, कुमार विश्वास, शाजिया इल्मी, दिग्विजय सिंह समेत शीर्ष के उन सब नेताओं द्वारा हाल
आपराधिक मामलों का सामना कर रहे विधायकों-सांसदों के मामलों की सुनवाई एक वर्ष में पूरी करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश न केवल राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बल्कि न्याय प्रक्रिया के प्रति आम लोगों के भरोसे को बढ़ाने वाला भी। ऐसे किसी फैसले की जरूरत इसलिए थी, क्योंकि आम तौर पर निचली अदालतों में विधायकों-सांसदों के मामलों की सुनवाई वर्षो तक खिंचती रहती थी। जब तक उनके मामलों का निस्तारण होता था तब तक उनका कार्यकाल पूरा हो जाता था। इस दौरान संबंधित राजनीतिक दल इस तर्क की आड़ लेकर यह उपदेश देते रहते थे कि जब तक

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