सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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सुशासन सुधारेगा हालात
 
विश्व बैंक की इस वर्ष की 'ईज टू डू बिजनेस' रिपोर्ट में भारत 142वें स्थान पर पहुंच गया। पिछड़ने के आधार वही हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन जैसे सरकारी महकमों से संबंधित कार्यों में अड़ंगे और विलम्ब। अन्य देशों की तुलना में व्यापार और कर संबंधी कानून भी कुछ सख्त और जटिल हैं। दूसरे देश इन कानूनों में तेजी से सुधार कर रहे हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा। दूसरी ओर देश की नई सरकार निवेश को बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन रद्द किए जाने का तात्कालिक असर बैंकों, निवेश के माहौल और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। जिन कंपनियों ने बैंकों से पैसा लेकर कोल ब्लॉकों में निवेश किया था वे कंपनियां अब बैकोें का पैसा शायद नहीं चुका पाएं। 
 
इससे बैंकों का पैसा फंस जाएगा। अर्थात एनपीए बढ़ेगा। इसकी भरपाई अंतत: सरकार को ही करनी पड़ेगी। सरकार ने निजी उद्यमियों से जो कांट्रेक्ट किए थे, वे ही रद्द हो गए हैं। इससे सरकारी
हम भारतीय दुख-परेशानी, अन्याय और संघर्षों से खुद को अलिप्त रखने में  बहुत माहिर हैं। हम ऐसे जिंदगी जीते हैं जैसे देश की बड़ी समस्याओं का वजूद ही नहीं है। मैं कोई फैसला नहीं दे रहा हूं। इतनी तकलीफों और असमानता वाले देश में इनसे निपटने का एकमात्र यही तरीका है। 
 
दूसरी बात, जिसमें हम सिद्धहस्त हैं वह है ऐसी किसी चीज पर विचार-विमर्श न करना जो समाज में वर्जित हो या इसमें सेक्स संबंधी कोई दृष्टिकोण हो। भारतीयों के लिए सेक्स का तो
दागी नेताओं को मंत्री बनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को कोई निर्देश देने के बजाय जिस तरह खुद को केवल सलाह देने तक ही सीमित रखा उसे देखते हुए यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दल उसकी राय को पर्याप्त महत्व देंगे। आसार इसी बात के अधिक हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद दागी समझे जाने वाले नेता मंत्री बनते रहेंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि दागी की कोई सीधी-सरल परिभाषा नहीं है।
 
राजनीतिक दलों के लिए दोषी
सांसदों के आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के बारे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सैद्धांतिक तौर पर सही है कि ऐसा करने से एक अलग श्रेणी बन जाएगी, लेकिन अगर महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई की जरूरत महसूस की जा रही है तो फिर ऐसा ही सांसदों के मामले में क्यों नहीं सोचा जा सकता? चूंकि फिलहाल यह प्रश्न अनुत्तरित है और सुप्रीम कोर्ट राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगाने के लिए संसद सदस्यों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए तैयार नहीं इसलिए अब देखना यह होगा कि मोदी सरकार इस सिलसिले में राज्यों से विचार-
रोशनी के लिए विभिन्न उत्पाद बनाने वालों के लिए तैयार की गई "कैंडलमेकर्स पिटिशन" (याचिका) संरक्षणवाद पर एक ख्यात व्यंग्य है। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री फ्रैडरिक बास्तियात द्वारा लिखित और प्रकाशित यह व्यंग्य 1845 में उनकी रचना इकानॉमिक सोफिज़्म का ही हिस्सा था। यह एक तरह से, एडम स्मिथ द्वारा शुरू की गई मुक्त बाजार बनाम वाणिज्यवाद (वणिकवाद) की बहस का विस्तार था।
 
बास्तियात ने इसके जरिये सरकार द्वारा कुटीर उद्योग को प्रतिस्पर्धा से बचाने के
इसी साल के फरवरी के महीने ने अपने आपको चार माह के अंदर उस समय फिर से दोहरा दिया जब प्रकाशक ब्लैकस्वान ने अपने यहां से प्रकाशित कुछ पुस्तकों को बाजार से वापस मंगाकर उनकी 'पुनर्समीक्षा' करने की घोषणा की। फरवरी में कुछ ऐसा ही पेंग्विन बुक्स ने उस समय किया था जब 'शिक्षा बचाओ आंदोलन संस्थान' के प्रमुख दीनानाथ बत्र ने अमेरिकी स्कॉलर वेंडी डोनीगर की पुस्तक 'दि हिंदूज: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री' के कुछ अंशों को अत्यंत आपत्तिजनक मानते हुए कोर्ट में एक मामला दायर किया था। इस बार बत्र ने शेखर बंदोपाध्याय की पुस्तक 'फ्रॉम प्लासी टू पार्टिशन, ए हिस्ट्री
मोदी सरकार के मंत्री जितेन्द्र सिंह ने अनुच्छेद 370 की प्रासंगिकता पर एक बार पुन: बहस की शुरुआत कर दी है। इस पर स्वस्थ बहस का स्वागत करने के बजाय उमर अब्दुल्ला ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यह ठीक नहीं है। किसी विषय पर स्वस्थ बहस लोकशाही की सबसे बड़ी ताकत होती है और संविधान के अनुच्छेद 370 सहित ऐसा कोई भी विषय नहीं है जिसको बहस की स्वस्थ परंपरा से वंचित रखा जाना चाहिए। उमर अब्दुल्ला जैसे कुछ लोग अनुच्छेद 370 को जम्मू-कश्मीर की ब्रह्मनाल के रूप में निरूपित करते हैं। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसे अलगाववाद का मुख्य कारक मानते हैं।

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