सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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दिल्ली में पिछले शुक्रवार की रात उबेर नामक कंपनी के एक टैक्सी ड्राईवर द्वारा एक कंपनी में कार्यरत महिला पर बलात्कार कर लिया गया. महिला ने बहादुरी के साथ अपना संयम खोये बगैर उस टैक्सी का फोटो अपने कैमरे पर ले लिया और शनिवार की सुबह उसने पुलिस में इस घटना की रिपोर्ट कर दी. शाम होते होते वह टैक्सी ड्राईवर मथुरा में अपने आवास से गिरफ़्तार भी हो गया. जिस संयम से उस बहादुर महिला ने अपने सम्मान से खेलने वाले को कानून के हाथों में पहुंचाया था उसके बाद वास्तव में वह महिला बुद्धिमानी से भरी बहादुरी की मिसाल बन जाना चाहिये था. टीवी पर उसकी समय
दिल्ली से देवभूमि उत्तराखंड आए युवा सैलानी जोड़े की हत्या और लूटपाट की अप्रत्याशित घटना ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र चकराता को सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इन सुर्खियों ने स्थानीय जनजाति समाज को शर्मसार कर दिया है, क्योंकि ऐसी घटना इस क्षेत्र के लिए किसी बड़ी अनहोनी जैसी है। सैलानियों को सिर-माथे बिठाने की परंपरा वाले जौनसार-बावर के इस जनजातीय समाज को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि उनके बीच के युवक ऐसा वीभत्स कांड कर सकते हैं। लेकिन जब सच सामने आया, तो उन्होंने अनूठे ढंग से सामूहिक प्रतिक्रिया दी।
पिछले पखवाड़े एक ही दिन दो खबरें आईं। दोनों इतनी विपरीत थीं कि मैं चकरा गया। दोनों खबरें लोकतांत्रिक संस्कृतियों से आई थीं। अखबारों में फोटो थे, जिनमें युवा लड़के-लड़कियों को पुलिस हिरासत में लेती दिखाई दे रही थी। ये किस ऑफ लव डे के बहाने विभिन्न संगठनों द्वारा नैतिक पुलिस बनकर उन्हें परेशान करने का विरोध कर रहे थे। यह हालत तब है जब उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन भी नहीं किया होता है।
 
कोझीकोड के एक कैफे से इसकी शुरुआत हुई, जिसमें
गुजरात में नगरपालिकाओं और पंचायतों में मतदान को अनिवार्य बनाने की जद्दो-जहद का अंनतः पटाक्षेप हो ही गया। अब गुजरात के सभी मतदाताओं को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों में अनिवार्यतः मतदान करना पड़ेगा। इस कानून का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है। उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहते इसे दो बार- दिसंबर 2009 और मार्च 2011 में पारित किय गया, किंतु तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध मानती थीं और उन्होंने अप्रैल 2010 में इसे पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। नए राज्यपाल ओपी कोहली ने तीन
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा द्वारा वेश्यावृति को कानूनी मान्यता दिलाने संबंधी बयान भले ही देश में बहस का मुद्दा बन गया हो लेकिन देश में वेश्यावृति के माध्यम से जीवन यापन करने वाली लाखों सेक्स वर्कर्स को सुरक्षा, गरिमा और स्वास्थ प्रदान करने का एक मात्र यही तरीका है। 
 
दुनिया के कई देशों नें वेश्यावृति कानून में बदलाव कर और इसे कानूनी वैधता प्रदान कर उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए हैं। उदाहरण के लिए नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड,
सुशासन सुधारेगा हालात
 
विश्व बैंक की इस वर्ष की 'ईज टू डू बिजनेस' रिपोर्ट में भारत 142वें स्थान पर पहुंच गया। पिछड़ने के आधार वही हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन जैसे सरकारी महकमों से संबंधित कार्यों में अड़ंगे और विलम्ब। अन्य देशों की तुलना में व्यापार और कर संबंधी कानून भी कुछ सख्त और जटिल हैं। दूसरे देश इन कानूनों में तेजी से सुधार कर रहे हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा। दूसरी ओर देश की नई सरकार निवेश को बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन रद्द किए जाने का तात्कालिक असर बैंकों, निवेश के माहौल और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। जिन कंपनियों ने बैंकों से पैसा लेकर कोल ब्लॉकों में निवेश किया था वे कंपनियां अब बैकोें का पैसा शायद नहीं चुका पाएं। 
 
इससे बैंकों का पैसा फंस जाएगा। अर्थात एनपीए बढ़ेगा। इसकी भरपाई अंतत: सरकार को ही करनी पड़ेगी। सरकार ने निजी उद्यमियों से जो कांट्रेक्ट किए थे, वे ही रद्द हो गए हैं। इससे सरकारी
हम भारतीय दुख-परेशानी, अन्याय और संघर्षों से खुद को अलिप्त रखने में  बहुत माहिर हैं। हम ऐसे जिंदगी जीते हैं जैसे देश की बड़ी समस्याओं का वजूद ही नहीं है। मैं कोई फैसला नहीं दे रहा हूं। इतनी तकलीफों और असमानता वाले देश में इनसे निपटने का एकमात्र यही तरीका है। 
 
दूसरी बात, जिसमें हम सिद्धहस्त हैं वह है ऐसी किसी चीज पर विचार-विमर्श न करना जो समाज में वर्जित हो या इसमें सेक्स संबंधी कोई दृष्टिकोण हो। भारतीयों के लिए सेक्स का तो

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