सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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जब आप यूरोप में यात्रा करें तो आमतौर पर आपको ट्रेन या बस में अापके टिकट की जांच करने वाला टिकट इंस्पेक्टर दिखाई नहीं देता। आप ऐसी कई यात्राएं कर सकते हैं, जिसमें आपके टिकट की जांच ही न हो। किंतु काफी समय बाद अचानक न जाने कहां से तीन-चार इंस्पेक्टर प्रकट होंगे। सारे दरवाजों पर खड़े हो जाएंगे और तेजी से टिकटों की जांच कर लेंगे। जिसके पास टिकट नहीं होगा, उसे तत्काल वास्तविक कीमत का 150 गुना दाम चुकाना होता है। कोई बहाना नहीं चलता है। जुर्माना नहीं भरा तो आपको हिरासत में ले लिया जाएगा। हर यात्रा
तो हमने उबर पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके साथ एप आधारित सारी टैक्स कंपनियों पर भी पाबंदी लगा दी, क्योंकि मोबाइल एप कंपनी में रजिस्टर्ड ड्राइवर ने टैक्सी में सवार दिल्ली की युवती से दुराचार किया था। कारण बताया गया कि उबर ने पंजीयन नहीं कराया और उस प्रक्रिया का पालन नहीं कराया, जो एक रेडियो कंपनी को करना चाहिए और स्वतंत्र रूप से अपने ड्राइवरों की पृष्ठभूमि की पर्याप्त जांच नहीं की। उनका सत्यापन नहीं कराया। बेशक, सरकार ने नहीं बताया कि कंपनी को दुराचार की घटना होने के पहले महीनों तक क्यों काम करने दिया गया।
भारत में न्याय मिलने में विलंब के लिए कई प्रक्रियागत खामियां जिम्मेदार हैं। न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। 
स्वायत्तता के तमाम प्रावधानों के बावजूद भारत में न्यायपालिका आज भी आर्थिक रूप से सरकार पर ही निर्भर है। कहने को न्यायपालिका हमारी प्रणाली का एक अहम और पृथक अंग है पर न्यापालिका के लिए अलग से कोई बजट नहीं होता है, जैसा कि रेलवे के लिए होता है। 
दिल्ली में पिछले शुक्रवार की रात उबेर नामक कंपनी के एक टैक्सी ड्राईवर द्वारा एक कंपनी में कार्यरत महिला पर बलात्कार कर लिया गया. महिला ने बहादुरी के साथ अपना संयम खोये बगैर उस टैक्सी का फोटो अपने कैमरे पर ले लिया और शनिवार की सुबह उसने पुलिस में इस घटना की रिपोर्ट कर दी. शाम होते होते वह टैक्सी ड्राईवर मथुरा में अपने आवास से गिरफ़्तार भी हो गया. जिस संयम से उस बहादुर महिला ने अपने सम्मान से खेलने वाले को कानून के हाथों में पहुंचाया था उसके बाद वास्तव में वह महिला बुद्धिमानी से भरी बहादुरी की मिसाल बन जाना चाहिये था. टीवी पर उसकी समय
दिल्ली से देवभूमि उत्तराखंड आए युवा सैलानी जोड़े की हत्या और लूटपाट की अप्रत्याशित घटना ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र चकराता को सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इन सुर्खियों ने स्थानीय जनजाति समाज को शर्मसार कर दिया है, क्योंकि ऐसी घटना इस क्षेत्र के लिए किसी बड़ी अनहोनी जैसी है। सैलानियों को सिर-माथे बिठाने की परंपरा वाले जौनसार-बावर के इस जनजातीय समाज को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि उनके बीच के युवक ऐसा वीभत्स कांड कर सकते हैं। लेकिन जब सच सामने आया, तो उन्होंने अनूठे ढंग से सामूहिक प्रतिक्रिया दी।
पिछले पखवाड़े एक ही दिन दो खबरें आईं। दोनों इतनी विपरीत थीं कि मैं चकरा गया। दोनों खबरें लोकतांत्रिक संस्कृतियों से आई थीं। अखबारों में फोटो थे, जिनमें युवा लड़के-लड़कियों को पुलिस हिरासत में लेती दिखाई दे रही थी। ये किस ऑफ लव डे के बहाने विभिन्न संगठनों द्वारा नैतिक पुलिस बनकर उन्हें परेशान करने का विरोध कर रहे थे। यह हालत तब है जब उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन भी नहीं किया होता है।
 
कोझीकोड के एक कैफे से इसकी शुरुआत हुई, जिसमें
गुजरात में नगरपालिकाओं और पंचायतों में मतदान को अनिवार्य बनाने की जद्दो-जहद का अंनतः पटाक्षेप हो ही गया। अब गुजरात के सभी मतदाताओं को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों में अनिवार्यतः मतदान करना पड़ेगा। इस कानून का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है। उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहते इसे दो बार- दिसंबर 2009 और मार्च 2011 में पारित किय गया, किंतु तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध मानती थीं और उन्होंने अप्रैल 2010 में इसे पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। नए राज्यपाल ओपी कोहली ने तीन
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा द्वारा वेश्यावृति को कानूनी मान्यता दिलाने संबंधी बयान भले ही देश में बहस का मुद्दा बन गया हो लेकिन देश में वेश्यावृति के माध्यम से जीवन यापन करने वाली लाखों सेक्स वर्कर्स को सुरक्षा, गरिमा और स्वास्थ प्रदान करने का एक मात्र यही तरीका है। 
 
दुनिया के कई देशों नें वेश्यावृति कानून में बदलाव कर और इसे कानूनी वैधता प्रदान कर उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए हैं। उदाहरण के लिए नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड,

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