सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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सरकार में आरक्षण और शिक्षण संस्थाओं, नौकरी में आरक्षण दो अलग अलग मुद्दे हैं। पंचायत में अथवा संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए जो आरक्षण दिया गया है तथा इस दिशा में जो प्रयास किए जा रहे हैं वो उचित हैं। वह इसलिए कि सरकार का तो काम ही होता है कि वह लोगों का प्रतिनिधित्व करे। इसलिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अगर लिंग, समुदाय या क्षेत्र आधारित आरक्षण दिया जाता है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। पर यही बात नौकरी या शिक्षण संस्थाओं में दिए जाने वाले आरक्षण के बारे में नहीं कही जा सकती।
- जिस विषय पर संसद में बहस होनी चाहिए उस विषय पर सड़क पर हो रहा संघर्षः गुरचरन दास
 
- सरकार ऐसी व्यवस्था सुनिश्चत करे जहां भू स्वामी और खरीददार आपस में सौदा कर सकें: पार्थ जे शाह
 
 
नई दिल्ली स्थित कांस्टिट्यूशन क्लब में गुरूवार को 'लैंड एक्वीजिशन बिल एंड
विपक्ष के विरोध के बावजूद नया भूमि अधिग्रहण बिल कुछ संशोधनों के बाद लोकसभा में पास करा लिया गया। अब बिल उच्च सदन अर्थात राज्यसभा के पाले मे हैं। केंद्र सरकार के लोकसभा में बहुमत और राज्यसभा में अल्पमत में होने के कारण असल चुनौती बिल को इस उच्च सदन से पारित कराना है। हालांकि सीबीआई द्वारा अप्रत्याशित तरीके से पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को बतौर आरोपी समन जारी करने से विपक्षी दलों को ये आरोप लगाने का मौका मिल गया है कि सरकार उसपर दबाव बनाने का काम कर रही है।
 
राजस्थान हाइकोर्ट ने रेहड़ी पटरी विक्रेताओं को बड़ी राहत प्रदान की है। गुरुवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए हाइकोर्ट की जयपुर बेंच ने शहर से रेहड़ी पटरी विक्रेताओं को हटाने और उनके सामानों की जब्ती पर रोक लगा दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को शीघ्र अतिशीघ्र राजस्थान स्ट्रीट वेंडर ऐक्ट 2012 को लागू करने का भी आदेश जारी किया है।  
 
विदित हो कि वर्ष 2012 में प्रवासी दिवस के मौके पर सैकड़ों रेहड़ी पटरी वालों को उनके ठीए से
धन, धन होता है। यह काला और सफेद नहीं होता। धन को काले और सफेद (कानूनी और गैर कानूनी) में विभाजित करना ही असल समस्या है। जैसे ही सरकार अथवा कोई सरकारी संस्था धन को काले या सफेद में वर्गीकृत करती है, उक्त धन अपना नैसर्गिक गुण अर्थात और धन पैदा करने की क्षमता समाप्त कर देता है। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान, मौजूदा धन की सहायता से और धन पैदा न कर पाने की क्षमता पहुंचाती है। आगे बढ़ने से पहले हमें गैरकानूनी अर्थात काले धन की उत्पत्ति को समझना होगा। मोटे तौर पर काले धन का मुख्य कारण सरकार द्वारा लोगों को अधिक आय अर्जित करने
खराब नीतियों द्वारा थोपे गए नुकसान भयानक हो सकते हैं, लेकिन टीवी के एंकरों का ध्यान इन पर कभी नहीं जाता। जनता की नजर भी इन पर तभी जाती है, जब कोई विशाल संख्या ऐसे नुकसानों के साथ नत्थी कर दी जाती है (मसलन 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक्स के मामले)। इन मामलों से जुड़ी संख्याएं बाद में बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई प्रतीत हुईं, लेकिन हर तरफ फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के गुस्से को आकार देने में इनकी एक भूमिका जरूर रही। दुर्भाग्यवश, खराब कानूनों और लालफीताशाही से होने वाले नुकसान को लेकर हमारे पास
क्या राजनैतिक दलों की कार्यप्रणाली पारदर्शी होनी चाहिए? यह सवाल हमारे सामने मई 1999 से मौजूद है जब विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था, ‘तर्क की कसौटी पर कसें तो यदि लोकतंत्र और जवाबदेही हमारी संवैधानिक प्रणाली के केंद्रीय तत्व हैं तो यही अवधारणा राजनैतिक दलों पर भी लागू होती है और उनके लिए बंधनकारी है। यह संसदीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं। राजनैतिक दल ही सरकार बनाते हैं, संसद का गठन करते हैं और देश की सरकार चलाते हैं। इस प्रकार राजनैतिक दलों
पिछले कुछ दिनों से 'पीके' फिल्म दो कारणों से चर्चा में है। पहला, कमाई के मामले में नित्य नए रिकॉर्ड बनाने के कारण और दूसरा, धर्म के नाम पर होने वाले आडम्बरों पर कटाक्ष करने और अपने खिलाफ होने वाले हिंसक प्रदर्शनों की मार झेलने के कारण। हालांकि विरोध प्रदर्शन के केंद्र बिंदू में अभिनेता 'आमिर खान' ही हैं। संभव है कि ऐसा उनके दूसरे धर्म यानि कि मुसलमान होने के कारण हो रहा हो, क्योंकि धर्म आधारित पाखंडों पर फिल्में पहले भी बनती रहीं हैं और हल्के फुल्के विरोध भी होते रहे हैं। श्रेष्ठ उदाहरण के

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