सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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भारतीय कानूनी व्यवस्था अब भी कई मामलों में दकियानूसी है। देश में अब भी सैकड़ों कानून हैं, जिनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। लेकिन अब भी वे लागू हैं। यह और बात है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं इनका खुद भी इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन अगर चाहें तो वे इन कानूनों के जरिए आम लोगों को परेशान कर सकती हैं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो  इसे उनका एहसान ही माना जाना चाहिए, एक ऐसा एहसान जो कभी भी बंद किया जा सकता है। पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने करीब 11 सौ से अधिक ऐसे अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को हटा दिया है। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों कानून

क़ानून क्या है? इस बारे में ऑस्टिन का कथन है कि क़ानून संप्रभु की आज्ञा है। राज्य के सन्दर्भ में अगर बात करें तो राजतंत्र वाली व्यवस्था में राजा का आदेश ही क़ानून होता था। शासन की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी क़ानून की परिभाषा कमोबेस वही है। सवाल है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में क़ानून लोकहित के लिए हैं या लोकहितों को ही क़ानून के मापदंड पर रखकर देखना होगा? निश्चित तौर पर लोक का हित सर्वोपरी हो, उसके साथ अन्याय न हो, क़ानून का उद्देश्य इतना भर है। क्या हम कानूनों को तैयार करते समय उन मानकों का ध्यान रखते हैं जो उक्त क़ानून के भूत, भविष्य और वर्तमान

डेनमार्क की पहचान आमतौर पर यूरोप के खूबसूरत देश के तौर पर हैं लेकिन यहां की एक खासियत एक और है जिसे कम ही लोग जानते हैं। यहां दुनिया में सबसे तेजी से अदालती कार्रवाई पूरी होती है। डेनमार्क ही नहीं उसके पड़ोसी देश नॉर्वे और फिनलैंड की गिनती भी ऐसे ही देशों में होती है जहां तेजी से मुकदमों का निपटारा होता है।

फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का सबसे बेहतरीन न्यायिक सिस्टम डेनमार्क का है जहां एक समय सीमा में केसों का निपटारा कर दिया जाता है। दूसरा नंबर नॉर्वे का है। नॉर्वे की

- फ्रेजर इंस्टिट्यूट व सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा जारी वैश्विक रैंकिंग में 102 से फिसलकर 112वें स्थान पर पहुंचा भारत
- आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भूटान (78), नेपाल (108) व श्रीलंका (111) से पिछड़ा पर चीन (113), बांग्लादेश (121) व पाकिस्तान (133) से रहा आगे
- आर्थिक रूप से स्वतंत्र देशों की सूची में हांगकांग शीर्ष पर, सिंगापुर व न्यूजीलैंड क्रमशः दूसरे और तीसरे पायदान पर

नई दिल्ली। फ्रेज़र इंस्टिट्यूट, कनाडा द्वारा जारी वार्षिक आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक सूची (इकोनॉमिक फ्रीडम

आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाय तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती? इतनी खामियां और नाकामियां होती? शायद नही क्योंकि बाजार या व्यवसाय की एक नैतिकता है जिसका आधार प्रतिस्पर्धा और ग्राहक संतुष्टि है। लेकिन ये दोनों ही मूलभूत तत्व भारतीय शिक्षा व्यवस्था से नदारद है। शिक्षा का अधिकार कानून आए एक अरसा बीत गया है। जितनी उम्मीदें लोगों और सरकार की इससे थीं उतनी फलीभूत नही हुईं। पहले से ही

न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ और लम्बित मामलों की तुलना में जजों की संख्या में भारी कमी का हवाला देते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर पिछले दिनों एक कार्यक्रम में भावुक हो गये। उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे। एक खबर के मुताबिक़ भावुक होते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि निचली अदालतों में 3 करोड मामले लंबित हैं। मात्र बीस हजार जजों के कंधों पर दो करोंड़ मामलों की सुनवाई का दबाव है। लाखों लोग इसलिए जेलों में हैं क्योंकि जज उनके मामले ही नहीं सुन पा रहे हैं, लेकिन इसके लिए जजों को दोष न

वक्त के साथ-साथ तौर-तरीके बदलते हैं, जरूरते बदलती हैं और उन्हीं के मुताबिक कानून-कायदे भी। वक्त की वजह से पीछे छूट जाने वाले अतीत अथवा संग्रहालय का हिस्सा हो जाते हैं। उनके बारे में जानना व देखना अच्छा लगता है, लेकिन ऐसे पुरातन कानून जिनका अब मतलब नहीं रह गया है, फिर भी वे वजूद में हैं। उनके बारे में आप क्या कहेंगे? दिल्ली में 'पंजाब विलेज एंड स्मॉल टाउंस पेट्रोल एक्ट 1918' आज भी लागू है। इस कानून के मुताबिक दिल्ली के गांवों व कस्बों में हर रात वहां के व्यस्क पुरुषों को बारी बारी से गश्त करना जरूरी है। ऐसा न करने पर उन पर पांच रूपए का

दशकों तक भारत में अर्थशास्त्र का तात्पर्य गरीबी का अध्ययन रहा है। कुछ समय पहले तक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने की शुरुआत 'गरीबी के दोषपू्र्ण चक्र' नामक सिद्धांत (Theory of vicious circle of poverty) से की जाती थी। इस सिद्धांत के अनुसार गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता। गरीब लोग तथा गरीब राष्ट्र के लिए गरीब रहना नियति है। वास्तव में यह कोरी बकवास है। यदि यह सत्य होता तो संसार आज भी पाषाण युग में होता। जीवनियों (biography) का इतिहास 'गरीबी से अमीरी का सफर' करने वाली कथाओं से भरा पड़ा है। हांगकांग और अमेरिका गरीब अप्रवासियों (

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