सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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क्या भारत में आम नागरिक की प्राइवेसी (निजता) खतरे में है? उद्योगपति रतन टाटा ऐसा ही सोचते हैं और इसलिए उन्होंने अपनी “प्राइवेसी” की हिफाजत के लिए सुप्रीम कोर्ट की पनाह ली है। नीरा राडिया के टेपों में जिन लोगों की बातचीत दर्ज है, उनमें से ज्यादातर टाटा से सहमत हैं। इन टेपों में हालांकि उद्योग जगत के कई मशहूर लोगों और लॉबिस्ट्स की बातचीत दर्ज है, लेकिन इसकी ज्यादा चर्चा टाटा और मुकेश अंबानी ग्रुप की लॉबिस्ट नीरा राडिया की कुछ मशहूर पत्रकारों से बातचीत के सामने आने की वजह से हुई है। उन पत्रकारों और उनके बचाव में उतरे उनके सहयोगियों का भी यही सवाल है कि आखिर इन

‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

सूचना का अधिकारसूचना का अधिकार (आरटीआइ) क्या है?
सूचना का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। अनुच्छेद 19 (1) कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। यह कानून के तहत भारत के नागरिकों को केंद्र और राज्य सरकार के रिकॉर्ड से संबंधित सूचना हासिल करने का अधिकार प्रदान करता है।

जमीन अधिग्रहण की परंपरा बंद हो। जमीन पर किसानों के पूर्ण स्वामित्व को मान्यता मिले।
    गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों में किसानों के अधिग्रहित जमीन के उचित मुआवजे के लिए चल रहा आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह, मशहूर समाजसेविका अरुणा राय और वंदना शिवा तथा फिल्म स्टार राज बब्बर किसान आंदोलन को नेतृत्व देने के लिए आगे आ चुके हैं। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार आंदोलन को बेरहमी से कुचलने में लगी हुई है। सरकार के इशारे पर पुलिस महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को घरों में घुस कर पीट रही है। प्रशासन ने दादरी के

वह दिन देश के इतिहास का बड़ा ही गौरवशाली दिन होगा, जिस दिन बस चालक एवं खलासी के पास भी बी.ए. एम.ए. की डिग्री होगी। रिक्शा वाले, रेहड़ी-पटरी वाले, जन-मजदूर, किसान, आदि सभी शिक्षित हों, यह कौन नहीं चाहता? पर इस लक्ष्य को हासिल करने के नाम पर देश की कोई संस्था अनपढ़ लोगों को रिक्शा चलाने, रेहड़ी-पटरी लगाने, मजदूरी या खेती करने के अधिकार से वंचित कर दे, तो यह शायद किसी को हजम नहीं होगा। और मुद्दा वही पुराना फिर उठ खड़ा होगा कि गरीबी हटानी है या गरीबों को हटाना है? अशिक्षा दूर करनी है या अशिक्षितों को दूर करना है? पिछड़ापन दूर करना है या पिछड़ों को ही दूर भगा देना है?

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