सार्वजनिक नीति - कानून और न्यायपालिका - लेख

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अंतत: आठ साल चली लंबी लड़ाई के बाद महाराष्ट्र में डांस बार पर पाबंदी खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार पर प्रतिबंध खत्म करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को कायम रख सही फैसला दिया है। इसके पहले भी राज्यपाल ने प्रतिबंध संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। लेकिन राज्य सरकार पाबंदी लागू करने पर अड़ी रही और मध्यवर्ग की 75 हजार से ज्यादा युवतियां बेरोजगार हो गईं। इससे खराब बात तो यह हुई कि सरकार ने कोर्ट और मीडिया में उन पर जो अश्लील आरोप लगाए उनकी वजह से वे कोई दूसरा काम करने लायक नहीं रहीं। सरकार ने डांस बार को ऐसी जगह बताया जहां लोग लड़कियों से

 

राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दखल से लोग इतने नाराज हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट के दो हालिया फैसलों का स्वागत ही करेंगे। इनमें एक किसी भी सजा पाए व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकता है, भले ही उसने ऊंची अदालत में सजा के खिलाफ अपील कर रखी हो। दूसरा जेल में बंद व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाता है, फिर चाहे उन्हें अस्थायी तौर पर पुलिस या न्यायिक हिरासत में ही क्यों न रखा गया हो। दोनों फैसले कुछ अपराधियों को चुनाव से दूर रख सकते हैं, लेकिन उनके साथ यह जोखिम भी जुड़ा है कि कुछ इज्जतदार लोग भी इसके चलते चुनाव लड़ने से रह जाएं। कई बदमाश जेल से चुनाव जीते

 

खराब नीतियों द्वारा थोपे गए नुकसान भयानक हो सकते हैं, लेकिन टीवी के एंकरों का ध्यान इन पर कभी नहीं जाता। जनता की नजर भी इन पर तभी जाती है, जब कोई विशाल संख्या ऐसे नुकसानों के साथ नत्थी कर दी जाती है (मसलन 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक्स के मामले)। इन मामलों से जुड़ी संख्याएं बाद में बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई प्रतीत हुईं, लेकिन हर तरफ फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के गुस्से को आकार देने में इनकी एक भूमिका जरूर रही। दुर्भाग्यवश, खराब कानूनों और लालफीताशाही से होने वाले नुकसान को लेकर हमारे पास कोई आकलन ही नहीं है। ये चीजें आर्थिक सक्रियता की राह में

 

एक मामूली गरीब महिला है विजय कुमारी। उसकी कहानी इतनी आम है कि उसके बारे में आप न तो टेलीविजन के चैनलों पर सुनेंगे और न ही अखबारों में पढ़ेंगे।

बीबीसी पर पिछले दिनों अगर उसकी कहानी न दर्शाई गई होती, तो शायद मुझे भी उसके बारे में कुछ मालूम न होता, बावजूद इसके कि मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती कि हूं उन अनाम, रोजमर्रा की नाइंसाफियों के बारे में लिखने की, जो अदृश्य रह जाती हैं। तो सुनिए, विजय कुमारी की कहानी।

यह कहानी शुरू होती है कोई बीस साल पहले, जब विजय

 

सांप्रदायिक दंगों के मामलों में राजनेताओं सहित सभी दोषियों को दंड मिलने से हिंसा रुकने का रास्ता खुलेगा।

न्याय पाने की उम्मीद भी लुटा चुकेलोगों की सारी नजरें अब कुछ बड़े दिग्गज ‘परीक्षण मामलों’ पर टिकी हैं, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे वरिष्ठ राजनेता शामिल हैं। लोग मानते हैं कि इन्होंने नरसंहार करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया था।

जिला जज आर्यन ने जैसे ही कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को बरी करने का फैसला सुनाया, कोर्ट केभीतर बुरी तरह

 

भद्रजनों का खेल माने जाने वाले क्रिकेट के दामन पर एक और दाग लग गया है। दिल्ली पुलिस ने स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों समेत करीब एक दर्जन सट्टेबाजों को गिरफ्तार किया और इसके साथ ही इंडियन प्रीमियर लीग के पूरी तरह साफ-सुथरे होने का दावे पर नए सिरे से सवाल खड़े हो गए। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है जब क्रिकेट में खिलाड़ियों के मैच फिक्सिंग अथवा स्पॉट फिक्सिंग में लिप्त होने का मामला सामने आया हो। 1999-2000 में जब पहली बार दिल्ली पुलिस ने ही दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई श्रृंखला के फिक्स होने का दावा किया था और इसमें

आशीष नंदी पर मामला दर्ज हो गया और कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम को तमिलनाडु में दिखाए जाने की अनुमति तभी मिली जब वह इसके सात दृश्यों को हटाने को तैयार हो गए। सलमान रुश्दी को कोलकाता जाने नहीं दिया गया और नवीनतम घटनाक्रम में कश्मीर में लड़कियों के रॉकबैंड में गाने-बजाने के विरुद्ध फतवा जारी किया गया है। हाल के वषरें में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। हमेशा तर्क दिया जाता है कि इससे किसी विशेष जाति, संप्रदाय या वर्ग की भावना आहत होती है। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल मीठी-मीठी बातें करना है जिसमें किसी की निंदा या आलोचना न हो तो उस

प्रतिबंध को समस्या का एकमात्र समाधान मानने के दुष्परिणाम के रूप में राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक व गुटखे पर लगी पाबंदी के बावजूद खुले आम बिक्री, प्रयोग और सेवन के तौर पर देखा जा सकता है। गुटखे पर लगे प्रतिबंध के लगभग तीन माह और प्लास्टिक पर प्रतिबंध को एक माह बीत जाने के बावजूद दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक बैग व गुटखों की उपलब्धता व प्रयोग खुलेआम न दिखता हो। और तो और डलाव व कूड़ा घरों में कूड़े से ज्यादा प्लास्टिक व पॉलीथीन देखने को मिल रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि गुटखा उत्पादकों ने इस प्रतिबंध का भी आसान तोड़ निकाल लिया है। चूंकि पान मसाला व

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