बेलगाम होती राजनीति की भाषा

अगर इस चुनाव अभियान में जो अभी कायदे से शुरू भी नहीं हुआ है, नेताओं द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों और भाषा का उदाहरण देने की कोशिश की जाए तो इस आकार के कई लेख तो उन उदाहरणों से भर जाएंगे। सिर्फ यह कहकर ही बात शुरू की जाए कि हम बदजुबानी-असंसदीय भाषा और ठेठ देसी हिसाब से कहें तो गाली-गलौज की भाषा पर चर्चा करना चाहते हैं। किसी को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि हम राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, मुलायम सिंह यादव, कुमार विश्वास, शाजिया इल्मी, दिग्विजय सिंह समेत शीर्ष के उन सब नेताओं द्वारा हाल के दिनों में की गई बदजुबानी की चर्चा कर रहे हैं।
 
ऐसी भाषा के बाद जो चीज बचती है वह है सीधे-सीधे दो-दो हाथ कर लेना और वह काम भी आप तथा भाजपा के लोग कई जगहों पर कर चुके हैं। आसार नजर आ रहे हैं कि आम चुनाव में आयोग की सारी सावधानियों के बावजूद इस तरह के टकराव के अंदेशे बने हुए हैं। अब यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन किसी भी आम चुनाव को कम नहीं आंका जा सकता। सो यह बात महत्वपूर्ण है कि इसमें कैसी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। पर उससे भी महत्वपूर्ण यह जानना है कि ऐसा क्यों हो रहा है।
 
कोई भी यह कह सकता है कि राजनीति का स्तर गिर रहा है। यह बात संसद-विधानसभाओं की बहस के स्तर से लेकर आम राजनीति की भाषा पर लागू होती है। नेताओं के लिए पढ़ाई-लिखाई, विषयों का ज्ञान, लिखने-बोलने का कौशल विकसित करना भी कोई काम है यह राजनीति में आ रहे लोगों के लिए कोई मुद्दा नहीं है। हाल के राजनीतिक इतिहास में यह कभी मुद्दा रहा हो, याद नहीं पड़ता। मंत्री बनने के लिए उस विषय का ज्ञान और अनुभव भी कोई योग्यता है यह कहना भी आज हैरानी का विषय हो सकता है जबकि ऐसी ही काबलियत देखकर पंडित नेहरू ने न जाने कितने लोगों को महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे या ऑफर दिया था। जयप्रकाश नारायण को तो उप प्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया गया था। खैर, आज राजनीति में आना मतलब अधिक कमाई और ताकत बटोरने का जतन करना रह गया है।
 
ऐसे में अगर संसद की बहसों से लेकर टीवी डिबेट और सड़क की राजनीति की भाषा बिगड़ी है तो हैरानी की क्या बात है। कई लोग यह कह जाते हैं कि मंडल के जरिये जो ग्रामीण और पिछड़ा नेतृत्व आगे आया है उससे भी भ्रष्ट भाषा का प्रयोग चला है। हालांकि इस दलील में ज्यादा दम नजर नहीं आता। यह सही है कि गांव के लोग कुछ ज्यादा नफासत वाली भाषा नहीं बोलते पर यह जो बदजुबानी दिखती है वह आक्सफोर्ड-कैम्ब्रिज-हार्वर्ड से पढ़कर लौटे लोगों में ज्यादा है। गांव से आए लोग अशुद्ध हिंदी या अंग्रेजी बोल सकते हैं, लेकिन लिहाज के मामले में वे सबसे आगे होते हैं और शहरी वातावरण में उनकी झिझक को दूर होने में बहुत वक्त लगता है।
 
पर इस गड़बड़ की उससे भी बड़ी वजह है राजनीति का लोगों से, लोगों के मुद्दों से, लोगों के जीवन से दूर जाना। आज लोग महंगाई से कराहें या भ्रष्टाचार से परेशान हों, बेरोजगारी झेलें या दुष्कर्म जैसे अपराध झेलें, उनका जल-जंगल-जमीन लुट जाए या उनके जींस तक का सौदा हो जाए कोई दूसरा बोलने वाला नहीं है। और राजनेता तो एकदम ही नहीं। वह जुमलेबाजी की तलाश में लगा रहता है जिससे लोगों की नजरों में बना रहे। वह एसी से बाहर आकर सड़क पर या लोगों के आंदोलन में जेल जाकर पसीने बहाने की जगह दिन में चार बार ड्रेस बदलकर टीवी में या मीडिया में चर्चा पा लेना चाहता है। लोगों में खासतौर पर अपने मतदाता वर्ग में चर्चा का विषय बनना चाहता है।
 
किस मुद्दे को संसद में उठाना है, किसे सड़क पर उठाने से लाभ होगा, किसकी चर्चा पहले गोष्ठियों और पैनल डिस्कशन में होनी चाहिए यह भेद भुला दिया गया है। इसलिए सिर्फ भाषागत अराजकता और भदेसपन ही नहीं दिखता संसद और विधानसभाओं में चर्चा का स्तर भी गिर गया है। अव्वल तो वहां हंगामा ज्यादा होता है और बहस कम, पर जो भी बहस होती है उसका स्तर एकदम घटिया होता है। संसद अपराधी जनप्रतिनिधियों को चुनाव में उतरने की इजाजत देने से लेकर सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने जैसे मामलों पर जैसी एकता दिखाती है, सबको भोजन के अधिकार और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर कभी नहीं दिखाती और इस गाली-गलौज, हंगामे और मारधाड़ से जिसे सचमुच परेशान होना चाहिए वह कभी चौंकता भी नहीं है। जब नेता और सांसद-विधायक अशालीन भाषा का प्रयोग करें, असंसदीय आचरण करें, हिंसा-हंगामा करें तो सबसे पहले उनके दल के नेतृत्व को चिंतित और शर्मिंदा होना चाहिए। कई बार लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष तो इन हंगामों से परेशान हो जाता है। छोटे कद के संगमा बड़ी कुर्सी पर उठक-बैठक ही करते लगते थे तो मीरा कुमार का मुंह 'बैठ जाइए, बैठ जाइए' चिल्लाने के लिए ही बना लगता है। पर जो सचमुच का अनुशासन ला सकते हैं वे या तो चुप रहते हैं या चीखने-चिल्लाने वाले को ही पुरस्कृत करते हैं।
 
विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की हाल की टिप्पणी पर राहुल गांधी ने तुरंत अप्रसन्नता दिखाई तो बात रुक गई, वरना अक्सर ऐसे बयानवीर पुरस्कृत ही होते हैं। खुद राहुल या उनकी पार्टी ने दिग्विजय को कितनी 'आजादी' दे रखी थी बल्कि पूरी पार्टी में सबसे अमर्यादित भाषा अक्सर पार्टी प्रवक्ताओं की ही होती है और उन्हें इसका पुरस्कार राज्यसभा की सदस्यता जैसी चीजों के रूप में मिलता है। उदाहरण कम नहीं हैं। पिछले चुनाव के 'सफल' प्रवक्ता अरुण जेटली और कपिल सिब्बल को ही लीजिए। वे आज पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार हैं। मुश्किल यह है कि अक्सर इस गलती का इलाज अदालत-पुलिस के जिम्मे आता है जिसे बने-बनाए कानून के तहत मानहानि और चरित्रहनन जैसे आरोप सिद्ध करने होते हैं या बयान से कानून-व्यवस्था की समस्या उठने जैसा सबूत देना होता है। एक तो ऐसा साबित करना मुश्किल होता है खासकर तब जब मामला शासक दल से जुड़े लोगों का हो और कई बार जब फैसले तक बात आती है तो माफी मांग ली जाती है, तब तक गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका होता है और चुभने वाली बात भी आई-गई हो चुकी होती है। कई बार तो मानहानि साबित हो जाने पर भी पीडि़त पक्ष अपने को बड़ा दिखाने के चक्कर में जुर्माना वसूलने से बचता है। फिर इस सब में इतना वक्त लगता है कि कई लोग स्वर्ग सिधार चुके होते हैं।
 
इसलिए कानूनी प्रक्रिया में बदलाव, प्रभावी कायदे-कानून, संसद-विधानसभाओं में प्रभावी मुस्तैदी और सबसे बढ़कर पार्टियों के अंदर इस सवाल पर जागरूकता जरूरी है और इन सबके ऊपर लोगों की सत्ता तो है ही जिसे ऐसे लोगों को सजा देने में कभी परहेज नहीं करना चाहिए। उस अदालत में भी जाति-संप्रदाय-क्षेत्र-भाषा और वैचारिक रुझान वाले सवाल ऊपर आ जाते हैं। पहले वहीं से सख्ती होगी तभी निश्चित सुधार होगा।
 
 
- अरविंद मोहन
 
फेलो, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज, दिल्ली 
 
साभारः दैनिक भाष्कर

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