निजी क्षेत्र के लिए सरकार क्यों करे अधिग्रहण

विपक्ष के विरोध के बावजूद नया भूमि अधिग्रहण बिल कुछ संशोधनों के बाद लोकसभा में पास करा लिया गया। अब बिल उच्च सदन अर्थात राज्यसभा के पाले मे हैं। केंद्र सरकार के लोकसभा में बहुमत और राज्यसभा में अल्पमत में होने के कारण असल चुनौती बिल को इस उच्च सदन से पारित कराना है। हालांकि सीबीआई द्वारा अप्रत्याशित तरीके से पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को बतौर आरोपी समन जारी करने से विपक्षी दलों को ये आरोप लगाने का मौका मिल गया है कि सरकार उसपर दबाव बनाने का काम कर रही है।
 
हालांकि ऐसे ही आरोप पिछली सरकारों पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव व मायावती सहित अन्य राजनेता भी लगा चुके हैं। समय समय पर सरकार द्वारा सीबीआई के गलत इस्तेमाल के आरोप लगते रहते हैं। हालांकि आज हम जिस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं वह सीबीआई के दुरुपयोग की नहीं बल्कि नए भूमि अधिग्रहण बिल से संबंधित है। अपार विरोध व अन्ना हजारे द्वारा किसानों के साथ 30 मार्च से पदयात्रा शुरू करने की घोषणा, राज्यसभा में संख्याबल के आधार पर कमजोर होने के बावजूद आखिर नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर दृढ़ता दिखाने के बाद इस कानून (लोगों की सहमति के बगैर उनकी भूमि अधिगृहित करने) की आवश्यकता पर विचार करना जरूरी है।
 
आम तौर पर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बोलने वालों को विकास विरोधी साबित करने की कोशिश की जाती है। सरकार द्वारा भी यह बार बार जताने की कोशिश की जा रही है कि जमीन की अनुपलब्धता के कारण कई प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं और निवेश को योजना को धक्का लग रहा है। जमीन न होने के कारण अटके प्रोजेक्टों की अनुमानित लागत 4 लाख करोड़ रूपए तक बतायी जा रही है। हालांकि सरकार की तरफ से ऐसी कोई रिपोर्ट अब तक जारी नहीं हुई है जिससे यह स्पष्ट हो कि भूमि की अनुपलब्धता मुख्य समस्या है। यहां तक कि वर्ष 2015 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी ऐसी किसी बात का कोई जिक्र नहीं है। मीडिया के रिपोर्ट की माने तो विशेष आर्थिक जोन (एसईजेड) के लिए अधिगृहित भूमि का बड़ा हिस्सा अब भी बेकार पड़ा है और उसका कोई इस्तेमाल अबतक नहीं हो सका है। बताया जाता है कि सिर्फ पांच राज्यों के अधिगृहित भूमि का 45 फीसद हिस्सा बेकार पड़ा हुआ है और उसका कोई उपयोग नहीं हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पास भी 17 लाख एकड़ अतिरिक्त जमीन पड़ी हुई है। यदि वास्तव में सरकार सजग है तो सबसे पहले उक्त खाली और बेकार पड़ी जमीनों का सदुपयोग किया जाना चाहिए।
 
दरअसल, बगैर सहमति के भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया लोगों में सरकार की छवि कॉरपोरेट फ्रेंडली और अमीरों के लिए काम करने वाली सरकार के तौर पर बनाने में मददगार हो रही। वैसे संपत्ति के अधिकार के हिसाब से भी सरकार को नागरिकों के इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए ना कि इसका हनन। भू स्वामि के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी जमीन को बेचे अथवा नहीं। वैसे भी यदि सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण की जाए तो बात फिर भी समझ में आती है, किंतु निजी उद्योगों के लिए बलात् भूमि अधिग्रहण करना समझ से परे है। एसईजेड की असफलता से प्रधानमंत्री मोदी को यह बात समझ लेनी चाहिए कि उद्योग धंधों के लिए सिर्फ जमीन की उपलब्धता ही एकमात्र कारक नहीं है। यदि उद्योगपतियों को निवेश के लिए आकर्षित करना है तो देश से लाल फीताशाही की परंपरा को समाप्त करें।
 
पूर्व में भी तमाम उद्योगपतियों ने लाइसेंस राज के कारण पैदा होने वाली समस्याओं के बारे में अपने दर्द को बयां किया है। अच्छा होता कि उद्योगपतियों के साथ गंभीरता पूर्वक बैठक कर उनकी मुख्य समस्याओं का समाधान किया जाता। आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में दुनिया भर में भारत की स्थिति सबसे फिसड्डी देशों के रूप में होती है। ऐसा क्यों हैं और इसे कैसे दूर किया जा सकता है, जरूरत इसके जवाब को जानने और उन्हें हल करने की है। बाजारवादी अर्थव्यवस्था में, जहां मुक्त उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया जा रहा है, निजी क्षेत्र को बाजार में प्रचलित कीमत के मुताबिक जमीन के लिए खुली नीलामी में बोली लगाने को क्यों नहीं कहा जाता? क्या ऐसे प्रावधान नहीं किए जा सकते कि उद्योगपति और किसान आपस में लेनदेन करे और सरकार की भूमिका किसी के साथ अन्याय की स्थिति को रोकने भर की हो। 
 
- अविनाश चंद्र

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.