श्रम सुधार मे ढेरो सम्भावनाये

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के लिए साक्षात्कार से वापस आ रहे लाखों युवक रेल की छत पर यात्रा को मजबूर हुए. इनमें से 19 की करेंट से मौत हो गयी. भर्ती के लिए दो लाख लोगों ने अर्जी दी थी. यह घटना दर्शाती है कि देश में बेरोजगारी कितनी व्यापक हो चुकी है. मिस्र् एवं ट्यूनीशिया में हाल में भड़के जनांदोलनों के पीछे भी बेरोजगारी ही है. यानि यह समस्या वैश्विक है.

हमारे प्रधानमंत्री का मानना है कि रोजगार उत्पन्न करने के लिए श्रमसुधार आवश्यक है. सही है कि रोजगार सृजन के लिए श्रमसुधार जरूरी है, परंतु श्रम सुधार मात्र से रोजगार उत्पन्न होंगे, इसमें संशय है. यह भी संभव है कि श्रमसुधार की आड़ में केवल संगठित श्रमिकों के वेतन में कटौती हो. अत यह कदम जरूरी होते हुए भी इस दिशा में संभलकर कदम उठाना चाहिए.

कई उद्योग जैसे- खांडसारी, टूरिज्म ओद मौसमी होते हैं. यहां श्रमिकों की जरूरत साल में कुछ माह की होती है, परंतु श्रम कानूनों के कारण उद्यमी को श्रमिकों को 12 महीने रखना पड़ता है. श्रमिकों के वेतन ऊंचे निर्धारित कर दिये जाते हैं. श्रमिकों को बर्खास्त करना भी कठिन होता है. इस प्रकार उद्यमी का खर्च बढ़ता है.

वह प्रयास करता है कि अधिकाधिक कार्य मशीन से करा लिया जाये, जैसे वैक्यूम क्लीनर से रूम की सफ़ाई करने में श्रम कम लगता है. सत्तर के दशक में सामान्य चीनी मिल में 2000 श्रमिक काम करते थे. आज के दिन प्लांट की क्षमता दुगनी हो जाने के बावजूद केवल 500 श्रमिक कार्य करते हैं.

तमाम कार्य जैसे ट्रक से गन्ने को अनलोड करना, खोई को ब्वायलर में डालना, चीनी के बोरों को सिलना अब मशीनों से होने लगा है. यही कारण है कि संगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की संख्या 1997 में 282 लाख से घटकर 2005 में 264 लाख रह गयी. यद्यपि इस अवधि में आर्थिक विकास की दर में वृद्धि हुई है.आर्थिक विकास में तीव्रता आने के साथ-साथ रोजगार हनन चल रहा है.

आर्थिक प्रगति और रोजगार का यह परस्पर अंतर्विरोध विकास की प्रक्रिया में निहित है. ओर्थक प्रगति का अर्थ होता है पूंजी की वृद्धि. अधिक मात्रा में उपलब्ध होने से पूंजी सस्ती हो जाती है, बिल्कुल उसी तरह जैसे मंडी में आलू ज्यादा आने से सस्ता हो जाता है.

उद्यमी द्वारा निरीह श्रमिक का शोषण एवं उत्पीड़न न हो, इसलिये सरकार ने ट्रेड यूनियन कानून बनाया है. संगठन के माध्यम से श्रमिक अपने हितों की रक्षा कर पाते हैं, जैसे वेतन वृद्धि और कैंटीन की सुविधा की मांग कर पाते हैं. श्रम कानून के कारण उद्यमी के लिए श्रमिक को मुअत्तल करना कठिन हो गया है.

परंतु श्रम का मूल्य बढ़ जाने से उद्यमी का प्रयास रहता है कि वह कम से कम संख्या को रोजगार दे. वह मशीनों का उपयोग अधिक करता है. अर्थव्यवस्था में रोजगार कम होते जाते हैं. श्रम कानूनों के दो परस्पर विरोधी प्रभाव दिखते हैं. संगठित क्षेत्र के 3 करोड़ श्रमिकों के लिए ये वरदान है.

उन्हें वेतन, जॉब सिक्योरिटी तथा प्रॉविडेंट फ़ंड जैसी सुविधाएं मिल जाती हैं. परंतु देश के साठ करोड़ असंगठित श्रमिकों के लिए ये हानिप्रद है. श्रम कानूनों के कारण उद्यमी द्वारा मशीनों का प्रयोग अधिक एवं श्रम का कम किया जाता है. जो रोजगार उत्पन्न हो सकते थे, उनसे ये वंचित हो जाते हैं.

इस परिस्थिति में यदि श्रम कानूनों को नरम बनाया जाता है, तो संगठित क्षेत्र के श्रमिकों का नुकसान होगा. इसके विपरीत यदि श्रम कानूनों को यथावत रखा जाता है, तो बेरोजगारी की समस्या विकट होती जायेगी, क्योंकि रोजगार सृजन धीमा पड़ेगा. हमारे एक तरफ़ कुआं है, तो दूसरी तरफ़ खाई. इनके बीच रास्ता निकालना है.

श्रमसुधारों की उपयोगिता है किंतु यह बेरोजगारी दूर करने वाला अस्त्र नहीं है. इसके साथ-साथ ऐसी नीतियां लागू करनी होंगी, जिससे उद्यमी के लिए बड़ी संख्या में रोजगार बनाना लाभप्रद हो जाये. कम वेतन वाले रोजगार पर सब्सिडी अधिक और ऊंचे वेतन वाले रोजगार पर सब्सिडी शून्य होनी चाहिए. ऐसा करने से उद्यमों के लिए कम क्षमता वाले गरीब श्रमिकों को रोजगार देना लाभप्रद हो जायेगा. इससे ज्यादा संख्या में रोजगार बनेंगे. अत पहली जरूरत उद्यमों को रोजगार सृजन के लिए प्रोत्साहन देने की है.

-डॉ भरत झुनझुनवाला