कृषि सुधार कानून: कानूनी, आर्थिक और नीतिगत पहलुओं पर खास बातचीत

पिछले 30 दिनों से देश की राजधानी दिल्ली को घेरे बैठे किसानों को हालिया कृषि सुधार कानूनों को रद्द करने के अतिरिक्त और कुछ भी मंजूर नहीं है। किसान यह तो मानते हैं कि उनके उपज के लिए एक से अधिक खरीददार का होना उनके हित में है, लेकिन उन्हें डर है कि सरकार यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और बाद में सरकारी मंडियों को यदि समाप्त कर देती है तो उनका क्या होगा? उन्हें डर है कि यदि उन्हें सिर्फ बाजार और कारपोरेट के हवाले छोड़ दिया गया तो शोषण के अलावा उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। उनके डर को इस बात से भी बल मिला है कि नए प्रावधानों में उन्हें कोर्ट जाने की अनुमति नहीं दी गई है। उनके सभी प्रकार के विवादों का निपटारा एसडीएम के स्तर पर ही होगा। किसानों के मन में यह डर इतना घर कर गया है कि सरकार द्वारा किसी विवाद की स्थिति में कोर्ट जाने का अधिकार होने का लिखित आश्वासन देने के बाद भी।

इन्हीं मुद्दों पर बात करते हैं सुधांशु नीमा से जो एक पॉलिसी एनालिस्ट हैं और आर्थिक और कानूनी मामलों के जानकार हैं। उनसे बात कर रहे हैं आजादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र।