विचारः किसानों को आजादी दिलाते कृषि कानून

किसानों का एक तबका आंदोलन कर रहा है, जो झूठे प्रचारों के द्वारा गुमराह हैं। जबकि दूसरी तरफ खेती किसानी करने वाले बहुसंख्यक किसान जो कि दलित और गरीब हैं, अपनी अनुपस्थित के साथ सुस्पष्ट हैं।

वर्ष 2019 की अप्रैल की शुरुआत में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने ‘किसानों की आजादी के लिए घोषणा पत्र’ (फारमर्स मेनिफेस्टो फॉर फ्रीडम) जारी किया। यह एक प्रगतिशील दस्तावेज था जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रिटिश औपनिवेशक कानूनों से स्वतंत्रता प्राप्त होने के सात दशकों के बीत जाने के बाद भी किसान, जो कि जनसंख्या का सबसे बड़ा तबका है, आज भी नियमों और कानूनों की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है।’

घोषणा पत्र में ‘व्यापार करने की आजादी’ की मांग की गई थी और विलाप किया गया था कि मौजूदा कानून किसानों को ‘कहां, कैसे और किस भाव पर अपने उत्पादों को बेचना है’ की आजादी नहीं देते हैं। इसके साथ ही कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) को कुछ गिने चुने ‘लाइसेंसधारी व्यापारियों’ को ‘कानूनी एकाधिकार’ देने वाला बताया गया था जो कि ‘किसानों का गला घोंटते हैं।’ इसके अलावा ‘अनुबंध आधारित कृषि (कॉंट्रैक्ट फार्मिंग)’ सहित भूमि के प्रयोग पर प्रतिबंध को खत्म करने और एपीएमसी और आवश्यक वस्तु अधिनियम के समापन की भी मांग की गई थी। यहां तक कि सभी कृषि उत्पादों में ‘वायदा कारोबार (फ्यूचर ट्रेडिंग)’ को अनुमति देने के लिए भी कहा गया था।

एपीएमसी की शुरुआत ब्रिटिश राज के दौरान मध्य भारत में हुई थी। इसका उद्देश्य कपास उत्पादक किसानों को उनके उत्पाद को सरकार द्वारा चलाए जाने वाले मंडियों में बेचने के लिए बाध्य करना था ताकि इंग्लैंड में स्थित मिलों को भारत से सस्ते कच्चे माल की आपूर्ति की जा सके। स्वतंत्रता के बाद, ताकतवर ग्रामीण लॉबी ने इस विरासत को जारी रखना सुनिश्चित कराया। इससे शुरुआती वर्षों में किसानों को कुछ लाभ अवश्य हुआ और हरित क्रांति से पहले के कठिन दौर से निकलने में मदद मिली। लेकिन आज जैसा कि बीकेयू का घोषणापत्र भी कहता है, एपीएमसी ‘बिचौलियों’ का गढ़ बन गया है जिनसे किसानों को बचाने की जरूरत है।

हाल ही में बने तीनों नए कृषि सुधार कानूनों का उद्देश्य भी ऐसा ही करने का है। आश्चर्य की बात ये है कि वही बीकेयू आज सड़को पर है और सुधारों के विरोध में कथित किसानों के आंदोलनों का नेतृत्व कर रहा है। पहले वे दलील देते थे कि किसान ब्रिटिश काल के कानूनों की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। अब उनकी दलील है कि उन्हीं जंजीरों को जारी रखना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि भविष्य में किसान को प्राइवेट कृषि उद्यमशीलता की जंजीरों में जकड़ जाएं। 

संयोग से, 4 अप्रैल, 2019 को किए गए एक ट्वीट के माध्यम से बीकेयू नेतृत्व ने कांग्रेस और राहुल गांधी के द्वारा मांगों के ‘कुछ हिस्सों’ को अपनाये जाने को लेकर प्रसन्नता जाहिर की थी और कहा था कि ‘देखते हैं कि बीजेपी और नरेंद्र मोदी क्या अपनाते हैं।’ कांग्रेस अब बीकेयू नेतृत्व के दोरंगेपन का समर्थन कर रही है, जबकि मोदी सरकार अपने घोषणापत्र के कार्यान्वयन में जुटी हुई है। यह कदम आजादी के बाद कृषि के क्षेत्र में सबसे साहसिक और ऐतिहासिक सुधार के कदम हैं। किसान भारत का एक मात्र निजी उत्पादक है जिसे अब तक अपने उत्पादों को बेचने की आजादी नहीं है। राम मनोहर लोहिया ने 1963 में कृषि सुधारों को लेकर अपने दृष्टिकोण को प्रदर्शित करते हुए कहा था कि ‘भारत के किसानों! अब से तुम अपनी पैदावार के स्वयं मालिक हो।’ मोदी ने इस दृष्टिकोण को वास्तविकता के धरातल पर उतारा है।

एपीएमसी वाली शासन पद्धति एक विसंगति थी जिसके तहत किसानों को अपने उत्पादों को केवल एपीएमसी में बेचने के लिए बाध्य किया जाता था। राजनैतिक कारणों से केंद्र व राज्यों में एक के बाद एक बनी सरकारों न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली व्यवस्था को विस्तारित करती रहीं जिससे न केवल मूल्य आधारित व्यवस्था बर्बाद होती रही बल्कि इसने उत्पादन के स्वरूप को भी बिगाड़ दिया। नए कानून उन विसंगतियों को दूर करते हैं। अब किसान अपने उत्पाद को जहां भी बेहतर कीमत मिले वहां बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। यह स्थान मंडी या निजी खरीद केंद्र कोई भी हो सकती है। अब वे अपने उत्पादों की कीमत मांग के अनुसार तय कर सकते हैं। अब वे कॉरपोरेट्स और निजी एग्री बिजनेसेज (कृषि व्यापारियों) के साथ अनुबंध में शामिल हो सकते हैं और यहां तक कि वायदा कारोबार भी कर सकते हैं।

इन सुधारों का विरोध कृषक समुदाय के लिए आत्मघाती है। इसके बावजूद किसानों का एक तबका सड़कों पर है और दिल्ली की धमनियों को जाम कर रहे हैं। कुछ मामलोंं को लेकर आशंकाएं वास्तविक हो सकती हैं जैसे कि निजी उद्यमी के द्वारा किसानों का शोषण करने की स्थिति में उन्हें एमएसपी का संरक्षण प्रदान करना आदि। सरकार इन आशंकाओं और चिंताओं पर चर्चा करने के लिए तैयार है। लेकिन यह दुष्प्रचार कि नए कानून किसानों को निजी व्यवसायियों का गुलाम बना देंगे, निर्मूल हैं। ये कानून किसानों की भूमि को प्रत्येक प्रकार के शोषण की स्थिति में संरक्षण प्रदान करते हैं, यहां तक कि चूक यदि किसानों की तरफ से तब भी।

किसानों के एक तबके द्वारा किया जा रहा आंदोलन दुष्प्रचारों का परिणाम है। जबकि खेती किसानी करने वाला बहुसंख्यक वर्ग जिसमें कि दलित और गरीब शामिल हैं, अपनी अनुपस्थिति के साथ सुस्पष्ट हैं। सरकार को किसानों के साथ सीधे जुड़ना चाहिए और इन कानूनों के फायदों को बताना चाहिए। एक दो सुधारों को मान लिया जाना चाहिए लेकिन उससे अधिक कुछ भी कृषि के भविष्य के लिए बर्बादी का सबब साबित होगा।

- राम माधव (लेखक भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं और इंडिया फाउंडेशन के निदेशक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।

फोटोः बिप्लव भुयान / एचटी फोटो

नोटः यह लेख मूल रूप में हिंदूस्तान टाइम्स समाचार में अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुआ था। आजादी.मी पर इस लेख का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख को मूल रूप में https://www.hindustantimes.com/analysis/how-the-agriculture-reforms-fina... पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है