विकसित देशों की ओर भी देखें

उत्तराखंड में जो भयानक नुकसान हमने पिछले सप्ताह देखा, उसके पीछे छिपे हैं कई सवाल, जिन्हें हम सिर्फ आपदा आने के समय ही पूछते हैं। बला टल जाती है, तो हम भी उन सवालों को पूछना बंद कर देते हैं। इसलिए हम आज तक समझ नहीं पाए हैं विकास और पर्यावरण का नाजुक रिश्ता और न ही हमारे शासकों ने समझने की कोशिश की है कि विकसित देशों में विकास के बावजूद पहाड़ क्यों सुरक्षित हैं, नदियां क्यों साफ हैं।

पहाड़ी इलाकों में न शहरीकरण को रोका जा सकता है, और न तीर्थयात्रियों-पर्यटकों को। अगर स्विट्जरलैंड में बन सकते हैं पहाड़ों में बड़े-बड़े शहर, तो हिमालय में क्यों नहीं? यह सवाल अपने देश में न शासक पूछ रहे हैं और न ही पर्यावरण बचाने वाली संस्थाएं। कई सवाल और भी हैं। उत्तराखंड में जब अवैध इमारतों का निर्माण हो रहा था गंगाजी के ऐन किनारे, तब कहां थे स्थानीय अधिकारी?

क्या सो रही थी सारी नगरपालिकाएं? क्या जानते नहीं थे कि हर साल की तरह इस साल भी तीर्थयात्री पहुंचेंगे चारधाम के दर्शन करने लाखों की तादाद में और उनकी सुरक्षा के लिए खास इंतजाम करना जरूरी है? जब मालूम पड़ा कि 60,000 से ज्यादा लोग लापता हैं, तो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने हेलीकॉप्टर से दौरा किया और दुख जताया, लेकिन उन्होंने उत्तराखंड के कांग्रेसी मुख्यमंत्री को पहले से ठीक इंतजाम करने को क्यों नहीं कहा?

यहां यह भी कहना जरूरी है कि कसूर उन गंगा-सेवकों का भी है, जिन्होंने तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश पर दबाव डालकर गंगा पर बन रहे तमाम बांधों को रुकवा दिया था। इन लोगों ने कुछ वर्ष पहले दिल्ली में एक सम्मेलन किया था, जहां मैंने देखा कि किस तरह का दबाव डाला गया पर्यावरण मंत्री पर। जब मंत्री जी ने समझाने की कोशिश की कि कुछ बड़े बांधों का आधा निर्माण हो चुका है और उन्हें रोकने से खतरा बढ़ सकता है, तो उन लोगों ने नहीं सुनी।

सो बांधों पर काम पूरा रोक दिया गया और बड़ी-बड़ी सुरंगें, जो उनके नीचे बन चुकी थीं, उनको खाली छोड़ दिया गया। अब विशेषज्ञ कहते हैं कि उनमें बांध का पानी भर गया होगा, जो अचानक धमाके की तरह निकल पड़ा होगा। पहले क्यों नहीं ये बातें सुनने को मिलीं? क्यों नहीं सुरंगों को भरने का काम बरसात आने से पहले पूरा किया? अगर बांधों का निर्माण खतरनाक था, तो निर्माण शुरू क्यों होने दिया? कौन से अधिकारी हैं जिन्होंने इनकी इजाजत दी और क्यों? और उनके साथ अब क्या होगा?

हमेशा क्यों दंडित होते हैं सिर्फ वे ठेकेदार, जिन्होंने इमारतों का निर्माण किया था, हमेशा क्यों बच जाते हैं वे अधिकारी जिन्होंने इजाजत दी? जिस दिन सरकारी अधिकारियों को जेल भेजना शुरू कर देंगे हम, अवैध इमारतों का निर्माण रुक जाएगा, बेगुनाह लोग बेमौत नहीं मारे जाएंगे और न ही गलत तरीकों से विकास होगा। बात चाहे केदारनाथ की हो या मुंबई की, जरा-सी तहकीकात के बाद मिल जाते हैं उन सारे अधिकारियों के नाम, जो असली गुनहगार हैं। हमने आदत-सी डाल ली है कि अपने देश में ऐसी चीजें तो होती ही आई हैं और होती रहेंगी, क्योंकि जनता में इतनी समझ नहीं है कि हक मांगे।

जनता तो इस पर भी नहीं एतराज जताती कि हर बार क्यों सेना को बुलाया जाता है, जब भी कोई आपदा आती है। सेना के हवाले कर दिया जाता है हर बार नगरपालिकाओं और राजनेताओं की गलतियां सुधारने का काम और न जनता कुछ कहती है, न हम मीडिया वाले। उत्तरकाशी में बाढ़ के पहले दिन तो टीवी पर सुर्खियों में रहा बेकार, बेमतलब सा मंत्रिमंडल में किया गया फेरबदल और आडवाणी जी को मनाने के प्रयास।

यह तमाशा इतनी देर तक चला कि अभिनेता कबीर बेदी ने ट्वीट किया कि सिर्फ भारत में मंत्रिमंडल में फेरबदल की खबर अहमियत रख सकती है, लोगों के मरने से ज्यादा। हमें सिर्फ इतना मालूम हुआ कि क्रिकेट हरभजन सिंह भी उत्तराखंड में थे तीर्थयात्रा पर और उनको सेना की मदद से बचाया गया। बाकी मरने वाले आंकड़े बनकर रह गए हैं और ऐसा होता ही रहेगा, जब तक दोषी अधिकारियों को कड़ी से कड़ी सजा न दी जाएगी, जब तक हम-आप वे सारे सवाल नहीं पूछना शुरू करेंगे, जो वर्षों पहले पूछे जाने चाहिए थे। वरना अपना यह भारत महान देश ऐसी ही चलता रहेगा।

 

- तवलीन सिंह

साभारः अमर उजाला

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.