कश्मीर पर मेरा नैतिक धर्मसंकट

कश्मीर में ताजा संकट ने उन प्रेतों को फिर जगा दिया है जिन्हें हमने सोया मन लिया था ! मेरे भीतर एक उदार आवाज उठती है, जो कहती है कि लोगों को यह चुनने का हक है कि जैसा जीवन वह जीना चाहते है और किस मुल्क में रहना चाहते है ! इसलिए घाटी के चालीस लाख लोगों को उनके  इच्छा के विरुध्द भारत में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए ! उदारवादी इसे आत्म- निर्णय का अधिकार कहते है ! इसी सिध्दांत के बल पर हमने ब्रिटेन से आजाद होने की लड़ाई लड़ी थी और यही अब हमें कश्मीर पर लागू करना चाहिए ! दूसरी ओर, उस देश कि पुकार भी मेरे भीतर उठती है जिसने पिछले साठ सालों से मुझे पाला-पोसा है ! इसी से मेरे भीतर राष्ट्रीयता का बोध विकसित हुआ है जिसकी वजह से कश्मीर के अलग होने का खयाल जेहन में आते ही मै कॉप उठता हूं !

हमारे राष्ट्र के जन्म के समय जन्मे और अजन्मे सभी भारतीयों ने संविधान के सिध्दांतो के अनुरूप जीने का सामाजिक अनुबंध स्वीकार किया था ! इसलिए अचानक एक दिन उठकर  कोई अलगाववादी दूसरों  की मंजूरी के बगैर इस अनुबंध को रद्द नहीं कर सकता !

लिहाजा मै सचमुच नैतिक दुविधा या धर्मसंकट महसूस कर रहा हूं! क्या मै अपने नैतिक अंतःकरण और भारत राष्ट्र  दोनों के प्रति एक साथ ईमानदार हो सकता हु? मेरे अधिकार है लेकिन अन्य भारतीयों के प्रति मेरे कर्तव्य भी है! चूंकि हमारा राष्ट्र सहमति के आधार पर बनाया गया था. इसलिए इससे रिश्ते तोड़ने से पहले मुझे भारतीय जनता की सहमति लेनी होगी! मै अचानक एक दिन उठकर अलग नहीं हो सकता! संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन ने भी दो कर्तव्यों के बीच इसी दुविधा का सामना किया था  - गुलामी के खिलाफ संघर्ष का कर्तव्य और अलगाववादियों के आत्म-निर्णय के अधिकार की रक्षा का कर्तव्य!

उन्हें अमेरिकन साउथ को अलग होने से रोकने के लिए खूनी गृहयुध्द लड़ना पड़ा था!

राजनीति के प्रथम सिध्दान्तो में से एक यह है कि आप निजी नैतिकता को राज्य के ऊपर नहीं थोप सकते! महान समाजशास्त्री मैक्स वेबर हमें सिखाते है कि शासक को हर हल में 'उत्तरदायित्व  की नैतिकता ' का पालन करना चाहिए, न कि ' अंतःकरण की नैतिकता ' का! जब देश से अलग होने कि बात आती है, तो मनमोहन सिंह को केवल अपने निजी अंतःकरण के बारे में सोचने कि सुविधा नहीं है! अगर अलगाव की  मांग धर्म पर  आधारित हो तो उन्हें बहुलतावादी भारत के विचार के जख्मी होने की चिंता भी करनी पड़ेगी! अगर एक और विभाजन कि सम्भावना दिखाई दे, तो उन्हें लाखो मुसलमानों के जीवन की रक्षा की चिंता भी करनी पड़ेगी!

भारत ने कई गलतियां की है! मानवधिकारों का उल्लंघन किया है, चुनाव में धोखाधड़ी की, भीषण ढंग से राजकाज चलाया! तब भी मेरी नजर में यह वैध लोकतंत्र है! हमारा संविधान अलग होने का अधिकार नहीं देता, क्योंकि विक्षुब्ध अल्पसंख्यक समुदाय अलगाव का इस्तेमाल रणनीतिक सौदेबाजी के औजार और बहुसंख्यक शासन पर वीटो के रूप में करके लोकतंत्र  पर कुठाराघात कर सकते है ! इसी वजह से मै लेखिका अरुंधती राय, स्तम्भकार वीर संघवी और स्वामीनाथन अय्यर से असहमत हूं ! जिन्होंने हाल में कश्मीर के अलग होने की हिमायत की है ! मै भाजपा के अरुण जेटली से भी असहमत हु जिनके लिए क्षेत्रीय एकता का किसी भी कीमत पर उल्लंघन नहीं होना चाहिए ! मेरे तई सभ्य राष्ट्रीयता सर्वानुमति में निहित है ! कश्मीर को सर्वानुमति से अलग होने कि इजाजत होनी चाहिए, जैसे नार्वे ने १९०५ में स्वीडन से अलग होकर किया था ! इसके लिए हमारे मूल सामाजिक अनुबंध  के तहत कश्मीर में ही नहीं, पूरे भारत में जनमत संग्रह करवाना होगा ! अगर कोई हिस्सा देश से अलग होने कि मांग करता है तो सारे भारतीयों को चाहिए कि वे अपने को एक बार आईने में देखे ! हममें क्या कमी है जिसकी वजह से हमारी टीम का एक सदस्य हमेशा के लिए अलग होना चाहता है ! साफ तौर पर राजकाज भारत की कमजोरी है, खासकर नागरिको को बुनियादी सेवाएं मुहैया करवाने में राज्य की विफलता ! पुलिस, अदालत और नौकरशाही के मामलों में हमने अपने लोगों को निराश किया है!

संस्थाए पतन की ओर जा रही है ! अलगाव की एक भी मांग उठती है तो हमें संस्थाओ की बेहतरी के लिए जुट जाना चाहिए ! हमें भारत को और बेहतर बनाना होगा!

- गुरचरण दास
(7 सितंबर 2008 के दैनिक भास्कर से साभार)