बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विकास का रास्ता हैः कपिल सिब्बल

बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) विकास का रास्ता है जिसके माध्यम से सरकार छोटे दुकानदारों, कारोबारियों, किसानों और युवाओं के हितों का पोषण करना चाहती है।

विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ऐसे भावुक भाषण देती हैं, मानो इस निर्णय से सब कुछ समाप्त हो जाएगा। लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है। विपक्ष का ध्यान कुर्सी पर, हमारा जनता क भलाई पर है। शर्म की बात है कि सुषमा जी सूदखोरों का समर्थन कर रही हैं।

यह नीति केवल 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों पर लागू होनी है। यानी केवल 53 शहरों में यह योजना लागू हो सकती है। इसमें से क ई राज्य इसका विरोध कर रहे हैं, जिसमें विपक्ष शासित राज्यों के अलावा हमारे सहयोगी दलों और कांग्रेस शासित भी राज्य हैं। इसे ध्यान में रखा जाए तब केवल 18 शहर ऐसे होंगे जहां यह नीति लागू हो सक ती है। ऐसे में विपक्ष की नेता का यह क हना पूरी तरह से निराधार है कि 18 शहरों में लागू होने से हिंदुस्तान बिक जाएगा, वॉलमार्ट हिंदुस्तान पर कब्जा कर लेगी। जब आप (भाजपा) सत्ता में होते हैं तब आपके लिए आर्थिक सुधार स्वदेशी वैश्वीकरण बन जाता है लेकि न जब आप सत्ता से बाहर होते हैं तब आप स्वदेशी को आर्थिक राष्ट्रवाद का विषय बना लेते हैं। इस नीति को आंध्र प्रदेश, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर जैसे कई प्रदेश लागू करना चाहते हैं।

विपक्ष खास तौर पर भाजपा लोकतंत्र और संघीय प्रणाली की बात करती है लेकिन यह कैसा लोकतंत्र है जहां कुछ राज्यों द्वारा दूसरे राज्यों को नीतियां लागू करने से रोका जाए।

वास्तविकता यह है कि बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई वाली कंपनियों को पहले 10 करोड़ डॉलर क निवेश करना होगा जिसमें से 50 प्रतिशत आधारभूत संरचना के विकास पर होगा। यह 50 प्रतिशत राशि उन्हें तीन वर्षों में निवेश करनी होगी। इसके अलावा इन कंपनियों को मध्यम एवं लघु क्षेत्र से 30 प्रतिशत उत्पाद खरीदने होंगे।

पिछले साल मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में 71 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी। आज चीन से लोग भारत आ रहे हैं जहां मेहनताने में इजाफा नहीं हुआ है। हमारे यहां इफीशिएंसी 17 फीसदी बढ़ गई है। पॉलिसी यह है कि 30 फीसदी सामान मध्यम और छोटे उद्यमों से खरीदने होंगे। अगर केईएभारत में फर्नीचर बनाएगी तो क्या वह लकड़ी आयात करेगी? वैश्विक बड़ी कंपनियां जो भी उत्पाद खरीदती हैं उनमें से 90 फीसदी स्थानीय बाजारों से खरीदे जाते हैं।

आठ करोड़ टन फल और सब्जियां हर साल स्टोरेज फैसिलिटी न होने के कारण नष्ट हो जाती हैं। किसानों को उनकी फसल का केवल 15-17 फीसदी मूल्य मिल रहा है। एफडीआई के बाद उन्हें ज्यादा पैसा मिलेगा, समय पर पैसा मिलेगा, टेक्नोलॉजी का सहयोग और पक्का बाजार मिलेगा विपक्ष तय करे कि वह किसानों के साथ है या बिचौलियों के साथ। हम भारत के युवाओं को देखकर अपनी नीतियां बनाते हैं। अगले 8 सालों में शहरी आबादी 12.50 करोड़ बढ़ जाएगी। हमें अपने नौजवानों को रोजगार देने हैं। उत्पादन को बढ़ावा देना है। वॉलमार्ट से कौन खरीदेगा देश के वे 30 फीसदी लोग जो मध्यम या उच्चमध्यम वर्ग के हैं और जो कारों में घूमते हैं।

इस नीति में कि सानों, छोटे कारोबारियों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है। चीन में वॉलमार्ट नाकाम हो गई है तो यहां लोगों को भय दिखाया जा रहा है कि वॉलमार्ट सबको खरीद लेगी। भाजपा कहती कुछ है और करती कुछ है। जब भाजपा सत्ता में थी तब उसने एफडीआई का पक्ष लिया था। कई मामलों में कांग्रेस ने उसका समर्थन किया था। लेकिन सत्ता से बाहर होने पर वह अपनी बात से पलट गई। 2004 के अपने विजन दस्तावेज में भाजपा ने रिटेल में एफडीआई का समर्थन किया था। 12 अप्रैल 2004 को जसवंत सिंह ने कहा था कि यह हमारे एजेंडे में है और हम इसके प्रति प्रतिबद्ध हैं। भाजपा के 2004 के घोषणापत्र में खुदरा क्षेत्र में 86 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति देने की बात कही गई है। मुख्य विपक्षी पार्टी यह बताए कि वह 2004 के अपने निर्णय से क्यों पलट गई।

यह कहा गया कि विदेशी रिटेल शृंखलाएं किसानों को कम कीमत देंगी और उत्पाद खराब बताकर आयात कर लेंगी। लेकिन मैं पश्चिम बंगाल का ही उदाहरण देता हूं, जहां तृणमूल और वामपंथी दल इसका विरोध कर रहे हैं। वहां वाममोर्चे की सरकार ने एफडीआई की नीति पर अमल किया और इससे किसानों को फायदा हुआ। पश्चिम बंगाल में पेप्सीको 60,000 मीट्रिक टन आलू खरीद रही है। इसके लिए उसने 10,000 किसानों से करार किया है और 7,000 एकड़ इलाके में आलू उगाए जा रहे हैं। कई लोग कहते थे कि केएफसी आएगी तो हमारे ढाबों को बाजार से खदेड़ देगी। क्या हुआ?  ढाबों ने केएफसी को खदेड़ दिया। हमारे ब्रांड्स को हल्का मत आंकिए।

हम सदन में किसी पक्ष में बैठें.. ऐसी नीतियां बनाते हैं जो जनता की भलाई के लिए हो। हम सदन की दीवारों से परे आम जनता का ध्यान रखते हैं, युवाओं का ध्यान रखतें हैं, जो भविष्य का सपना देखते हैं। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जब कंप्यूटर की बात की तो देश में सभी विपक्षी पार्टियों ने उसका विरोध किया था लेकिन आज कौन भविष्यद्रष्टा साबित हुआ। आज के युवा क्या कंप्यूटर के बिना रह सकते हैं। इसी तरह एफडीआई भी देशहित और भविष्य की इबारत है।

(लोकसभा में रिटेल में एफडीआई के फैसले पर बहस के दौरान दिए गए भाषणों के संपादित अंश)
साभारः दैनिक भास्कर