हकीकत है निवेश की जरूरत

हाल में टीवी पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने बड़े नाटकीय अंदाज में कहा, ‘भारत सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वह वालमार्ट के साथ है कि इस देश के आम आदमी के साथ’।

मैंने जब उनका यह वक्तव्य सुना तो कुछ क्षणों के लिए हैरान रह गई। क्या ममता दी इतना भी नहीं समझ सकी हैं कि इस तरह की बातें करके वे भारत माता की तौहीन कर रही हैं? क्या इतना भी नहीं समझी हैं कि इतने विशाल, शक्तिशाली देश को विदेशी निवेशकों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है? क्या इतना भी नहीं याद है उन्हें कि कितनी गुरबत हुआ करती थी इस देश में जब विदेशी निवेशकों का नामोनिशान न था?

फिर मैं खुद इन सवालों के जवाब ढूंढ़ने बैठी। याद आया मुझे कि ममता दी ने अपने राजनीतिक और आर्थिक विचार उस जमाने में सीखे जब ‘विदेशी हाथ’ हमारे राजनेताओं ने हौवा बना रखा था। जब विदेशी निवेशकों का नाम सुनते ही यादें ताजा हो जाती थीं ईस्ट इंडिया कंपनी की। और फिर ममता दी उस प्रदेश में पली-बढ़ी हैं जहां तीस वर्ष राज रहा मार्क्सवादियों का, जहां दस्तूर बन गया था कि मार्क्सवादी नीतियों पर प्रश्न उठाना गद्दारी है। ममता दी ने अब साबित कर दिया है कि उनकी आर्थिक सोच वामपंथियों से भी वामपंथी है, सो विदेशी निवेशक अगर आना चाहते हैं भारत तो उनको दूर रहना चाहिए ममता दी के राज्य से।

समस्या यह है कि जिस सोच को बंगाल की मुख्यमंत्री ने व्यक्त किया उसमें विश्वास करते हैं इतने लोग कि भारत के मध्यमवर्ग की मंशा बन गया है वामपंथी सोच। इसमें विश्वास सिर्फ राजनेता नहीं करते हैं विश्वास करते हैं नए किस्म के राजनेता भी और वे तमाम लोग जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़ गए हैं। ऐसा लगता है कि ये सब मानते हैं कि भारत इतना निर्बल, इतना कमजोर देश है कि मुट्ठी भर विदेशी दुकानदार अगर आ जाते हैं तो तबाह हो जाएगा यह देश।

नए वामपंथियों की टोली इतनी बढ़ गई है, हौसले बुलंद हैं उनके इतने कि उन्हें अपने झूठे विचारों को टीवी पर व्यक्त करने में कोई संकोच नहीं। पिछले सप्ताह प्रसिद्ध पर्यावरणविद् वंदना शिवा को बीबीसी पर ऐसे झूठ बोलते हुए मैंने सुना कि यकीन करना मुश्किल हो गया कि यह महिला गंभीरता से बोल भी रही है कि नहीं। वंदना जी ने कहा कि 1997 से पहले इस देश के किसानों का जीवन खुशहाल और संपन्न था और प्रकृति से रिश्ता इतना मजबूत था कि उन्हें किसी भी चीज की जरूरत नहीं महसूस होती थी।

या तो वंदना जी ने उस जमाने में दिल्ली से बाहर जाने की कोशिश ही नहीं की थी कभी या फिर शायद भूल गई हैं कि इस राजधानी से थोड़ी ही दूर मिलते थे ऐसे गांव वाले जो शर्मनाक गुरबत में रहते थे। छोटी-मोटी खेती पर निर्भर हुआ करती थी ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था। जिस साल बरसात धोखा देती थी तो भूख से मरते थे किसानों के परिवार। ऐसा लगने लगा है कि आजकल हम सब भूलते जा रहे हैं वे दिन जब विदेशों से समुद्री जहाजों में आया करता था अनाज भारतवासियों के पेट भरने के लिए। वंदना जी तो जरूर भूल गई हैं वे दिन, क्योंकि उन्होंने हरित क्रांति को भी गलत कहा।

वंदना जी की बातें हजम ही कर रही थी मैं कि मेधा पाटकर की संस्था से इमेल आया मुझे, जिसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि ‘समय आ गया है विकास का विरोध करने का’। विकास के तहत आते हैं स्कूल, अस्पताल, बिजली, पानी और सड़कें। तो क्या इस विकास का विरोध करके हम जाना चाहते हैं वापस उस जमाने में जब अस्सी फीसद ग्रामीण भारतीयों को ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं?

बेतुकी हैं ऐसी बातें और इनका सख्त विरोध करना चाहिए जिम्मेदार राजनेताओं को, लेकिन राजनीति के मैदान में वामपंथियों का लाल झंडा इतना ऊंचा लहरा रहा है इन दिनों कि उसका असर भारतीय जनता पार्टी पर भी पड़ गया है। वरना जो राजनीतिक दल अपने आपको वामपंथी न कहने में गर्व करता था, क्यों करता एफडीआई का इनता विरोध कि पिछले सप्ताह संसद को चलने ही नहीं दिया? भारत सरकार ठीक कहती है कि उनको पूरा अधिकार था, एफडीआई पर निर्णय लेने का और बिल्कुल जरूरत नहीं थी संसद की मर्जी जानने की, लेकिन ऐसा हंगामा किया विपक्ष ने जैसे विदेशी निवेशकों की लंबी लाइन लग गई है भारत में आने की।

पूर्व की तरफ अपनी आंखें उठा कर देखने का कष्ट करते ये लोग तो दिखते उन्हें इंडोनेशिया, म्यांमा और विएतनाम जैसे देश, जो हर क्षेत्र में विदेशी निवेश का बाहें खोल कर स्वागत कर रहे हैं। भारत में निवेश करने क्यों आएंगे विदेशी निवेशक जब दूर से दिखता है वामपंथियों का लाल झंडा, जब दूर से सुनाई देती हैं वामपंथी आवाजें? भारत को जरूरत है विदेशी निवेशकों की, उनको यहां आने की नहीं। उनके लिए न बाजारों की कमी है और न ही ऐसे देशों की, जो स्वागत करते हैं विदेशी निवेशकों की।

- तवलीन सिंह
(जनसत्ता से साभार)