ये कैसी आजादी, अपराधी बाहर, फेसबुक पर पोस्ट करने वाले जेल में : श्रेया सिंघल

सेक्शन 66ए को रद्द करने के बाबत सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद से दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा श्रेया सिंघल काफी चर्चा में हैं। यूथ और नेटीजन्स के बीच श्रेया इतनी पॉपुलर हो गई हैं कि दो दिनों से ट्वीटर पर लगातार ट्रेंड कर रही हैं। हालांकि श्रेया खुद ट्वीटर पर नहीं हैं। फेसबुक पर भी श्रेया के कई फैंस क्लब और ग्रूप बन गए हैं। आजादी.मी ने श्रेया सिंघल की इस कामयाबी पर मुबारकबाद दिए और औपचारिक बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश 
 
 
प्रश्नः श्रेया, सबसे पहले हमारे पाठकों को आप अपने बारे में बताएं
 
श्रेयाः मेरा पूरा नाम श्रेया सिंघल है। मेरी उम्र 24 वर्ष है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ लॉ से एलएलबी कर रही हूं और सेकेंड ईयर की छात्रा हूं। मैनें ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी, यूके से एस्ट्रोफीजिक्स की पढ़ाई की है। वर्ष 2012 में मैनें सेक्शन 66ए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। 
 
प्रश्नः सेक्शन 66ए के प्रति खिलाफत और सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने का ख्याल कब और कैसै आया?
 
श्रेयाः यूके से इंडिया आने के कुछ समय बाद ही मुझे मीडिया में आई एक खबर ने चौंका दिया। महाराष्ट्र के पालघर की दो युवतियों को पुलिस ने सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया था कि उन्होंने फेसबुक के माध्यम से मुंबई बंद पर सवाल खड़े किये थे। गिरफ्तार युवतियों में से एक का कसूर तो सिर्फ इतना था कि उसने उस पोस्ट को लाइक किया था। इस खबर ने मुझे इतना आहत किया कि मैं बता नहीं सकती। मैंने निश्चय किया कि मैं इस कानून के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाऊंगी। इस बाबत जब मैनें अपने घरवालों से बात की तो उन्होंने भी मुझे पूरा सपोर्ट किया।
 
प्रश्नः एक कॉलेज गोईंग छात्रा के लिए ये सारी प्रक्रिया कितनी आसान और कितनी कठिन थी?
 
श्रेयाः दरअसल, मेरी पृष्ठभूमि कानूनविदों की रही है। मेरी मां मनाली सिंघल सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं। मेरी नानी सुनंदा भंडारे हाईकोर्ट की जज थी। मेरे घर में अन्य लोग भी ह्यूमन राइट्स और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट रहे हैं। जब मैनें अपने घर में राजनैतिक दलों व प्रभावशाली लोगों द्वारा सेक्शन 66ए के दुरुपयोग के विषय पर चर्चा की तो मेरी मां ने मुझे पीआईएल दाखिल करने की सलाह दी। मैंने इसे गंभीरता से लिया और आज मुझे खुशी है कि अदालत ने भी इस पर वैसी ही राय जताई जैसा कि मेरी खुद की प्रतिक्रिया थी। अदालत में लगभग तीन साल तक चली इस पूरी प्रक्रिया के दौरान थोड़ी बहुत कठिनाई तो हुई लेकिन जैसे जैसे लोगों का समर्थन मुझे मिलता गया, राहें आसान होती गईं। पहले पूर्व एटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी बिना कोई शुल्क लिए कोर्ट में बहस के लिए तैयार हुए बाद में मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन भी मेरी मुहिम में शामिल हो गई। धीरे धीरे समाज के अन्य वर्गों से भी मुझे प्रोत्साहन मिलने लगा। इस प्रकार, मैं ये कह सकती हूं कि यदि आप किसी नेक उद्देश्य से काम कर रहे हैं तो आरंभिक मुश्किलों के बाद चीजें अपने आप आसान होती जाती हैं।  
 
प्रश्नः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाबत राजनैतिक दलों की तरफ से मिश्रित प्रतिक्रिया आ रही है। कुछ लोग इसके सपोर्ट में हैं तो कुछ नाखुश भी। क्या कहेंगी आप?
 
श्रेयाः जो लोग इस फैसले पर नाखुश हैं, उनसे बस मैं यही कहना चाहूंगी कि जिस देश में अपराधी बलात्कार और हत्या जैसा अपराध करके सालों साल घूमते रहते हैं उस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सेक्शन 66ए जैसे अव्यवहारिक कानून के माध्यम से कुचलना कहीं से भी ठीक नहीं है। सोशल साइट्स पर कमेंट करने वाला अपराधी नहीं है। राजनैतिक प्रभाव रखने वाले लोग इस कानून और अपने रसूख का इस्तेमाल कर लोगों को चौबीस घंटे के भीतर जेल भिजवाकर इसका दुरुपयोग करते रहे हैं। यह बिल्कुल सही नहीं है।
 
प्रश्नः एक आखिरी सवाल..। युवाओं को आप क्या सलाह/संदेश देना चाहेंगी?
 
श्रेयाः मैं बस यही कहना चाहूंगी कि भारत का इतिहास विरोध प्रदर्शनों (अहिंसक) के माध्यम से अपना हक मांगने का रहा है। हम सभी को अपने हक के लिए विरोध प्रदर्शित करने का अधिकार है और होना चाहिए। यदि हमारे इस अधिकार को छीनने की कोशिश होती है तो हमें उसका मुकाबला करना चाहिए। इस देश की न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा रखते हुए मामले को उसके समक्ष लाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि सत्य की अंततः विजय होगी। 
 
 
- अविनाश चंद्र से बातचीत पर आधारित