वर्चस्ववादी नीतियों से है नुकसान

जब अमेरिका और यूरोप मंदी से त्रस्त हैं और शेष दुनिया पर भी इसका कमोबेश असर दिखता है, तब रेशनल एक्सपेक्टेशंस थ्योरी के दो प्रणेताओं, क्रिस्टोफर ए सिम्स और थॉमस जे सार्जेंट को अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार देने की घोषणा का अर्थ है। हालांकि इन दोनों ने अलग-अलग काम किया है, लेकिन बीती सदी के साठ और सत्तर के दशक में किया गया इनका अध्ययन न सिर्फ एक दूसरे का पूरक है, बल्कि कई दशक पहले किए गए उनके अध्ययन की प्रासंगिकता आज कई गुनी बढ़ गई है।

इन दोनों ने दरअसल केन्स के उस सिद्धांत को खारिज किया, जिसमें कहा गया था कि मंदी के समय सरकारी पैकेज बढ़ाने से अर्थव्यवस्था सुधर जाती है। केन्स के उस सिद्धांत के उलट इन्होंने यह स्थापना रखी कि सरकारी स्तर पर हस्तक्षेप से अर्थव्यवस्था तो नहीं सुधरती, उलटे इससे लोगों के बीच सरकार की छवि खराब होती है। आज इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। अमेरिकी सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए कई पैकेज दिए। यूरोप के देशों को भी कर्ज संकट से उबारने की वित्तीय कोशिशें हुईं। इन सबका कोई लाभ तो नहीं ही हुआ, उलटे वहां की सरकारों के बारे में जनता की राय बदल गई।

कहीं बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं, तो कहीं किफायत बरतने के सरकारी निर्देशों को जनता ने खारिज कर दिया है। सिम्स का मानना है कि सरकारों को अर्थव्यवस्था के बारे में अपनी राय नहीं बनानी चाहिए। चलन यह है कि सरकारें पहले ही विकास दर के बारे मे एक लक्ष्य बना लेती है, और उसी के अनुरूप आर्थिक नीतियां तय करती हैं। अपने यहां मुद्रास्फीति कम करने के लिए ब्याज दर बढ़ाने को रामबाण मान लिया गया है। रेशनल एक्सपेक्टेशंस थ्योरी इसी प्रवृत्ति को निशाना बनाती है, जिसका ध्येय वाक्य है कि आप जनता को बेवकूफ नहीं बना सकते। भूमंडलीकरण का ही उदाहरण लें।

सरकारें कहती हैं कि इसे लागू करने से गरीबों की आय बढ़ी है। बेशक उनकी आय बढ़ी है, लेकिन जब वे देखते हैं कि उनकी आय के अनुपात में महंगाई भी बढ़ी है और अमीरों की आय उनकी तुलना में न सिर्फ कई गुना बढ़ी है, बल्कि नई आर्थिक नीतियां ऐसे अमीर लोगों को भ्रष्ट तरीके से और भी धनवान बना रही हैं, तो उन्हें अपने ठगे जाने का एहसास होता है। बेशक यह सिद्धांत मंदी से लड़ने का कोई कारगर रास्ता नहीं सुझाता, जैसा कि नियंत्रित अर्थव्यवस्था के दौर में केन्स ने दिखाया था, लेकिन इसके आलोक में सरकारें अगर आर्थिक मामलों में अपनी वर्चस्ववादी नीतियां त्यागने की कोशिश करें, तो अर्थव्यवस्था को इसका लाभ ही मिलेगा।

- अमर उजाला