सांस्थानिक सुधारों का महत्व

देश के निजी क्षेत्र और उसके मजबूत नागरिक समाज की चाहे जो भी उपलब्धियां रही हों लेकिन इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं है कि अगर भारतीय राज्य की स्पष्ट दिखाई दे रही गड़बडिय़ों में सुधार नहीं लाया गया तो देश बहुत आगे तक नहीं जा पाएगा। भारतीय राज्य की जिन प्रमुख कमियों पर ध्यान केंद्रित है वे हैं भ्रष्टाचार का बढ़ता स्तर और देश के सार्वजनिक जीवन बढ़ता बिकाऊपन। निश्चित रूप से इन चीजों पर इस तरह ध्यान दिया जाना आवश्यक है लेकिन इसकी उतनी ही महत्त्वपूर्ण सीमा है भारतीय राज्य की क्षमताओं में कमी का दिखना। यह एक ऐसा मसला है जिस पर जरूरत के मुताबिक ध्यान नहीं दिया गया है।

चूंकि आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया देश में काफी पहले चालू हो चुकी है इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र के द्वारा प्रतिभाओं को आकर्षित करने के क्रम में नाटकीय परिवर्तन आया है। यह बात देशी की संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला पर लागू होती है। इसमें में एकदम सामने के मोर्चे पर काम करने वाली संस्थाओं से लेकर वह तमाम जटिल माहौल भी शामिल है जिसमें एक राज्य को अपने काम को अंजाम देना पड़ता है। एक ओर जहां स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में रिक्तियों आदि की बात जगजाहिर है वहीं अत्यंत बेहतर माने जाने वाले सुरक्षा क्षेत्र के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2011 में भारतीय सेना में जरूरत से करीब 12 हजार अधिकारी कम थे, खुफिया ब्यूरो में भी 9443 पद रिक्त हैं। एक के बाद एक घटित हो रही आतंकवादी घटनाओं के बावजूद महाराष्ट्र राज्य आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) में 447 पद रिक्त पड़े हैं। एक ओर जहां बड़ी बेफिक्री से नए नियामक संस्थानों का गठन किया जा रहा हैं वहीं आमतौर पर होता यह है कि उनमें नियुक्त करने के लिए कर्मचारी ही नहीं होते। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के लिए जिन पदों को मंजूरी दी गई है उनमें से आधे खाली पड़े हैं। इसके अलावा अगर गुणवत्ता की बात की जाए तो समस्या और अधिक गंभीर है।

सार्वजनिक संस्थानों में काम करने वालों की कमी क्यों हो रही है इसकी वजह जटिल है। इसमें शिक्षा व्यवस्था द्वारा सभी स्तरों पर और बड़े पैमाने पर कुशलता की गुणवत्ता बढ़ाने में असफलता के अलावा देश में और देश के बाहर रोजगार के बेहतर मौकों की मौजूदगी, समाज में शासकीय सेवाओं के लिए सम्मान में निरंतर आ रही कमी, भर्ती, प्रशिक्षण और प्रेरणा देने की कमजोर शैली आदि तो जिम्मेदार हैं ही साथ ही भर्ती के बाद उनमें विशेषज्ञता ला पाने में कमी और अकुशल कर्मियों को निकाल पाने अथवा किनारे करने की काबिलियत न होना भी इसकी एक वजह है।

बहरहाल, संस्थागत कारक भी महत्त्वपूर्ण हैं। केंद्रीय लोक सेवा आयोग देश का एक ऐसा संस्थान है जिसके संवैधानिक दर्जे ने उसे स्वायत्तता दिला रखी है।

लेकिन इस संस्थान के काम करने के तरीके ने समकालीन चुनौतियों के समक्ष इसकी प्रासंगिकता कम कर दी है। खासतौर पर इसकी परीक्षाओं पर आधारित भर्ती प्रक्रिया प्रतिभागियों की विषय की तात्त्विक समझ पर आधारित है। आखिर कोई व्यक्ति यह कैसे पता लगा सकता है कि भारतीय वन सेवा का एक सफल उम्मीदवार जिसने परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया हो वह प्रकृति और वनों के प्रति भी प्यार रखता होगा या जंगलों में रहने वाले लोगों के प्रति समानुभूति की भावना रखता होगा? इसके अलावा प्रतिभागियों को एक से अधिक बार परीक्षा में हिस्सा लेने की अनुमति देकर उसने इस बात का जोखिम भी बढ़ा दिया है कि भर्ती होने वाले उम्मीदवार इस समूची प्रक्रिया में जो समय और लागत व्यय करते हैं उसकी वसूली के लिए वे गैर कानूनी ढंग से आय अर्जित करने की कोशिश करने में लग जाएं। इसके अलावा भी ये प्रत्याशी उस कदर रचनात्मक नहीं होते हैं जिनकी सरकार को तलाश है। इन सब सवालों के जवाब तलाशने के लिए सावधानीपूर्वक विश्लेषणात्मक अध्ययन करना होगा जिसमें कि उम्मीदवारों द्वारा परीक्षा में किए गए प्रदर्शन और काम के दौरान उनके प्रदर्शन का आकलन किया जाए और उसके बाद इसके नतीजों का इस्तेमाल परीक्षा की प्रक्रिया और उसकी विषयवस्तु में जरूरी परिवर्तनों के लिए किया जाए।

यह दुख की बात है कि इस संबंध में सरकार और अकादमिक क्षेत्र में कुछ ही विश्लेषणपरक अध्ययन मौजूद हैं। उच्च स्तरीय अकादमिक जगत में लोक प्रशासन से अधिक उबाऊ विषय दूसरा कोई नहीं है। इसके अलावा यह एक ऐसा विषय भी है जिसपर तमाम सरकारों ने बहुत कम ही ध्यान दिया है। देश के बुद्घिजीवी और कार्यकर्ताओं ने हमेशा राज्य पर इस बात के लिए जोर दिया है कि वह वैधानिक अथवा नीतिगत आदेशों के जरिए कदम उठाए। लेकिन व्यापक विश्लेषण और समझ के जरिए इस जटिल विषय को आसान बनाने और इस तरह सरकार की मदद करने की कोशिश कम ही लोगों ने की।

एक ओर जहां यूपीएससी का प्रदर्शन ईमानदार लेकिन सीमित कल्पनाशीलता वाला रहा है वहीं राज्य लोक सेवा आयोगों ने जबरदस्त कल्पनाशीलता का परिचय दिया है। लेकिन दुख की बात यह है कि उनकी कल्पनाशीलताअपनी ताकत के जरिए अपने रैंक में सुधार करने तक सीमित रही है। लोक प्रशासन के क्षेत्र में सुखद परिणाम इसलिए नहीं मिले हैं क्योंकि कोई भी प्रत्याशी जो नौकरी पाने की जद्दोजहद में भारी धनराशि का निवेश करता है वह यकीनी तौर पर अपने करियर का इस्तेमाल तेज गति से पैसे की यथा संभव वसूली में करेगा।

हमारा देश पाश्र्व तंत्र के जरिए प्रतिभाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में खासतौर पर असफल रहा है। इस वर्ष के आरंभ में आर्थिक सुधारों की 20 वीं वर्षगांठ मनाने के लिए आयोजित एक सम्मेलन में सबसे परेशान करने वाला पहलू यह था कि वर्ष 2011 में वहां पैनल में जो सदस्य आमंत्रित थे, हो सकता है वर्ष 2011 में भी वहां वही सदस्य होते। यहां तक कि 1980 के दशक में भी भारत आर्थिक क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों े के लिए प्रतिभाएं जुटाने में कामयाब रहता था। बाद में विशेषज्ञता की मांग की तुलना में आपूर्ति में कमी के चलते यह काम असंभव सा हो गया। भारत में अधिकांश सरकारी समितियों में शामिल लोगों की उम्र पर नजर डालिए।

कोई भी ऐसा देश जो भविष्य की ओर नजरें जमाए हुए हो वहां प्रतिभाओं की पहचान एकदम कम उम्र में की जानी चाहिए लेकिन हमारे देश में इसका उलटा हो रहा है। इस संबंध में यह तर्क दिया जा सकता है कि चूंकि अधिकांश समितियां किसी काम की नहीं हैं इसलिए इनसे कुछ खास नुकसान भी नहीं हुआ। लेकिन जब बात साइबर सुरक्षा जैसी नई मूलभूत चुनौती की आती है तो हम कह सकते हैं कि हमारा देश जिस तरह से ऐसी चुनौतियों से निपटने की कोशिश कर रहा है वह न केवल अपर्याप्त है बल्कि संभवत: नुकसानदेह भी है।

तकरीबन एक सदी से भी पहले की बात है, मैक्स वेबर ने कहा था कि संस्थानों का निर्माण कड़े बोर्ड में छेद करने की तरह लंबा और दुरूह कार्य है। भारत जैसे जटिल माहौल में जन संस्थाओं का पुनर्निमाण इससे भी कठिन साबित हो सकता है। लेकिन भारत को अगर अपना भविष्य बेहतर बनाना है तो उसके पास इसके सिवा कोई विकल्प भी नहीं है।

- देवेश कपूर
साभार: बिज़नेस स्टैंडर्ड  

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