चीन के साथ विकास की राह

बेशक हम चाहें या न चाहें, भारत के आर्थिक विकास और प्रगति पर होने वाली किसी भी चर्चा में चीन के बढ़ते उल्लेख से बचा नहीं जा सकता। चीन इससे बखूबी वाकिफ है, मगर वह यह भी समझता है कि सर्वाधिक युवा श्रम बल के साथ सूचना व संचार तकनीकी की महाशक्ति और दुनिया के दूसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले भारत की अनदेखी नहीं की जा सकती। यही वजह है कि भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे पहले फोन पर बधाई देने वालों में वैश्विक नेताओं में चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग भी शामिल थे।
 
तकरीबन दो हफ्ते बाद चीन के विदेश मंत्री और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विशेष दूत वांग यी ने भारत पहुंचे, और उन्होंने नरेंद्र मोदी से चीन की पुरानी मित्रता का हवाला देते हुए दोनों देशों के बीच के संबंधों को मजबूत बनाने की इच्छा जताई। गौरतलब है कि बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी अपने राज्य में चीन के निवेश को बढ़ावा देने के लिए पहले भी चार बार वहां जा चुके हैं। दरअसल चीन की खासियत है कि वह लंबे समय के लिए रिश्ते बनाने में यकीन करता है, और अपने दोस्तों को भूलता भी नहीं है। इस संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का उदाहरण दिया जा सकता है, वाटरगेट कांड के बाद भी जिनके साथ चीन ने अपने रिश्ते तल्‍ख नहीं होने दिए थे।
 
बेहतरीन वेशभूषा वाले सौम्य और शिष्ट वांग यी ने चीन की ओर से सारे सकारात्मक संकेत दिए। उनके मुताबिक भारत में नई सरकार के नेतृत्व में जो बदलाव की लहर बह रही है, उससे दोनों देशों के संबंधों को मजबूत और आधुनिक बनाने में मदद मिलेगी। वांग की यात्रा को केवल औपचारिक नहीं माना जा सकता। इस दौरान उन्होंने भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ तमाम द्विपक्षीय मसलों पर भी बात-चीत की।
 
वांग यी ने साफगोई से चीन का पक्ष रखा, मगर उसमें कुछ संभावनाएं भी दिखीं। उन्होंने बताया कि 14 देशों के साथ चीन के सीमा विवाद रहे हैं, जिनमें से भारत समेत दो को छोड़कर सारे सुलझा भी लिए गए हैं। रही बात घुसपैठ की तो उन्होंने साफ किया कि जब दो देशों के बीच सीमाएं ठीक ढंग से न खिचीं हों, तो इससे बचा नहीं जा सकता।
 
गौरतलब है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी ने भी एक बार कहा था कि भारत और चीन की सीमाएं पतली पेंसिल से खींची गई लगती हैं। चीन के विदेश मंत्री के मुताबिक नत्‍थी वीजा को सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए। विवादों के समाधान तक स्‍थानीय लोगों को यात्रा करने की सुविधा देने के लिए महज शिष्टता के नाते की गई यह एक ‌कोशिश थी। द्विपक्षीय समस्याओं के शांतिपूर्ण और पारस्परिक सहमति पर आधारित समाधान ढूंढने के लिए दोनों देशों की प्रतिबद्धता पर उन्होंने खास जोर दिया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‌बगैर किसी समझौते के सीमा विवाद का हल ढूंढना बेमानी होगा।
 
दरअसल चीन को लगता है कि गुजरात के विकास पुरुष मोदी उसके लिए बिल्कुल सटीक शख्स हैं। यही वजह है कि जब मोदी भूटान की यात्रा पर थे, तब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का पांच सदस्यीय दल भाजपा के मुख्यालय में चर्चा के लिए आया हुआ था। यह दुर्लभ दृश्य था, क्योंकि शायद किसी ने कल्पना की होगी कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के साथ रूबरू होंगे। इससे यह भी पता चलता है कि चीन की विदेश नीति में भावुकता के लिए कोई जगह नहीं है। अपनी आर्थिक नीतियों को चीन भले ही 'समाजवादी पूंजीवाद' कहे, मगर उनकी विदेश नीति कुछ हद तक यथार्थवादी राष्ट्रीय हितों पर आधारित समझी जा सकती है।
 
जब बात चीन की हो, तो हमें कौटिल्य की नीति का पालन करना चाहिए। गौरतलब है कि चीन की अर्थव्यवस्‍था भारत की तुलना में चार गुनी बड़ी है, और दो-तीन वर्षों में इसके अमेरिका से भी आगे बढ़ जाने की उम्मीद है। भारत बेशक दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक बन कर उभरा है, मगर चीन का रक्षा बजट भारत से चार गुना बड़ा है। लिहाजा सीमा पर 'फॉरवर्ड पॉलिसी' जैसी भूल नहीं करनी चाहिए जैसा कि जनरल बी एम कौल के समय किया गया था, जिसकी परिणति 1962 के युद्ध के रूप में सामने आई थी।
 
ऐसे में समझना होगा कि चाहे अक्साईचिन का मुद्दा हो, या अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में चीनी घुसपैठ का मामला हो, हम सैन्य ताकत के बलबूते चीन को नहीं रोक सकते। मगर हम गैर-सैन्य उपायों का सहारा ले सकते हैं। सबसे पहले तो हमें अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत बढ़ानी होगी, ताकि चीन सहित कोई भी देश सीमा पर हमारे लिए मुश्किलें न खड़ी कर सके।
 
समझने वाली बात यह भी है कि अमेरिका को पछाड़कर महाशक्ति बनने की कगार पर खड़े चीन की निगाह अपने आर्थिक सशक्तिकरण पर है। ऐसे में वह भारत के साथ उलझ कर अंदरूनी कलह क्यों बढ़ाना चाहेगा ? कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन नहीं चाहता कि भारत वैश्विक ताकत के तौर पर उभरे, इसीलिए वह हमारे लिए मुश्किलें पैदा करता रहता है। चीन के मामले में हमें दो उद्देश्यों पर साथ में काम करना होगा।
 
एक ओर हमें चीन के साथ शांति वार्ता को आगे बढ़ाना होगा, साथ ही, अपनी सैन्य तैयारियां भी पुख्ता करते रहनी होंगी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, नेपाल और भूटान में चीन की उपस्थिति किसी से छिपी नहीं है। मगर हमें अपने पड़ोसियों के साथ रिश्ते मजबूत करने से आखिर किसने रोका है। अगर हम एक वैश्विक ताकत बनना चाहते हैं, तो हमें चीन से उलझने के बजाय अपनी एक रणनीति तैयार करनी होगी। और लगता है कि मोदी इसको अच्छी तरह समझते हैं।
 
मोदी सौभाग्यशाली हैं कि दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्‍थाएं (अमेरिका, चीन और जापान) भारत के साथ रिश्ते मजबूत करना चाह रही हैं। और इसकी वजह है भारत में मौजूद निवेश की अकूत संभावनाएं। भारत को इसी तरह विदेशी निवेशकों के आकर्षण का केंद्र बनाए रखना मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
 
 
- सुरेंद्र कुमार
साभारः अमर उजाला