‘पूजा स्पेशल ट्रेन’ की मेरी स्पेशल यात्रा...

राजधानी व शताब्दी सहित कुछ इक्का दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय रेल में यात्रा करने का मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। दूर दराज के छोटे शहरों तक पहुंचने का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भारतीय रेल सेवा का प्रयोग करना मजबूरी ही होती है। ट्रेन में बर्थ की अनुपलब्धता, टिकट के लिए मारामारी के बाद रही सही कसर यात्रा के दौरान पेंट्रीकार का खाना और गंदे बेडिंग से पूरी हो जाती है। और तो और सामान्य रेलगाड़ियों के अप्रशिक्षित कोच अटेंडेंट, उनकी बेतरतीब गंदी वर्दी और टायलेट की स्थिति यात्रा को ‘सफर’ बनाने के लिए काफी होती है। हर बार सरकार व रेल मंत्रालय द्वारा रेलसेवा में सुधार के दावे महज सिगूफा ही साबित होकर रह जाते हैं। हालांकि भारतीय रेल की मेरी पिछली यात्रा यादगार न सही संतोषजनक अवश्य रही।

एक घरेलू आयोजन में हिस्सा लेने के लिए पिछले माह मुझे नई दिल्ली के आनंद विहार से मुगलसराय तक की यात्रा ‘पूजा स्पेशल ट्रेन’ से  करनी पड़ी। ऐसा इसलिए क्योंकि सभी रेग्युलर ट्रेनों में वेटिंग तक रिग्रेट हो चुका था। उत्तर रेलवे द्वारा दुर्गा पूजा के दौरान घर जाने वालों की भीड़ को देखते हुए कुछ स्पेशल ट्रेने चलाने की घोषणा अखबार में पढ़ते ही ऑनलाइन टिकट बुक कराने के लिए कम्प्युटर के सामने बैठ गया। लेकिन यह क्या? स्पेशल ट्रेन की घोषणा के चंद घंटों के भीतर ही सभी सीटें फुल दिखाई पड़ने लगीं। ट्रेवेल एजेंटों और दलालों की अति सक्रियता मेरी सक्रियता पर भारी पड़ गई। खैर थर्ड एसी में वेटिंग टिकट किसी प्रकार मिल ही गया। लेकिन बीस दिनों पूर्व टिकट लेने के बावजूद यात्रा के एक दिन पूर्व तक बर्थ कन्फर्म न होने पर ‘तत्काल कोटे’ से एक हल्की सी उम्मीद जगी लेकिन भारतीय रेलवे की वेबसाइट के ऐन मौके पर धोखा देने के कारण वह भी धराशायी हो गई। किसी प्रकार हेड क्वार्टर कोटे से ट्रेन में बर्थ कन्फर्म करा पाने में सफल हुआ। लेकिन कन्फर्म बर्थ पाने की ये जद्दोजहद और स्टेशन पहुंचने पर ट्रेन के तय समय से तीन घंटे की देरी से चलने की सूचना ने यात्रा के शुरू होने से पहले ही ‘सफर’ में तब्दील होने की झलक दिखा दी।

खैर, किसी प्रकार रात लगभग बारह बजे हमारी ट्रेन आनंद विहार स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 2 पर ‘प्लेस’ हुई। भारतीय रेलवे को कोसता हुआ मैं जब कोच के भीतर दाखिल हुआ तो मुझे मामला कुछ ‘गड़बड़’ लगा। अपनी सीट पर पहुंचने के बावजूद एक बार फिर सामान सहित ट्रेन से उतरकर गेट पर चस्पा लिस्ट में अपना नाम, बर्थ नंबर और ट्रेन का नाम-नंबर कन्फर्म होने पर दुबारा कोच में दाखिल हुआ। दरअसल, पहली बार कोच में प्रवेश करते ही एक ‘आकर्षक वर्दीधारी’ कोच अटेंडेंट द्वारा चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया गया था। और अंदर से आ रही भीनी भीनी खुशबू, साफ सुथरे पर्दे, साफ फ्लोर आदि देख मुझे भ्रम हो गया था कि हो ना हो यह किसी मंत्री अथवा अधिकारी का प्राइवेट ‘सैलून’ है। वर्ना, थर्ड एसी उपर से स्पेशल ट्रेन की, ऐसी चीजे कहां देखने को मिलती हैं? बर्थ चार्ट दुबारा देखने के बावजूद सीट पर बैठने से पूर्व मैनें यूं ही एक दो सहयात्रियों से ट्रेन, कोच नंबर इत्यादि की पुष्टि कर ली। फिर भी पूरी संतुष्टी तब तक नहीं मिली जबतक कि टीटी टिकट व बर्थ चेक कर चला नहीं गया।

जारी है...
शेष अगले लेख में
- अविनाश चंद्र