‘पूजा स्पेशल ट्रेन’ की मेरी स्पेशल यात्रा... (अंतिम भाग)

अब ट्रेन आनंद विहार से मुगलसराय के लिए चल पड़ी। थोड़ी ही देर में वर्दीधारी अटेडेंट चेहरे पर मुस्कान और हाथ में बेडिंग लिए हमारे समक्ष फिर अवतरित हुआ। ‘योर बेडिंग्स सर’ के साथ उसने साफ सुथरे बेडशीट, पिलो और टावेल हम सभी की सीटों पर रख दिए। जबकि आमतौर पर ट्रेन यात्रा में कोच अटेंडेंट्स से टॉवेल लेने के लिए खासी बहस करने की जरूरत पड़ती है। भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली में यह सुखद परिवर्तन मेरे अंदर के पत्रकार को इन सबके बारे में जानने के लिए उत्सुक करने लगा। सहयात्रियों के साथ बातचीत के बाद यूं ही हाथ-पैर सीधा करने के उद्देश्य से मैं गेट तक और फिल ‘लघुशंका’ महसूस न होने के बावजूद एकबार टायलेट का मुआयना कर लेना भी मैने ठीक समझा। टायलेट का ‘इंटीरियर’ देख तो अब मुझे पक्का यकीन हो चला था कि ‘कम्पार्टमेंट’ में जरूर कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी जरूर यात्रा कर रहा है।

अब मैने भारतीय रेल में आए इस बदलाव की ‘तफ्तीश’ शुरू कर दी। कम्पार्टमेंट के बाहर गेट के पास बने अपने लिए निर्धारित स्थान पर बैठे अटेंडेंट से बात शुरू करने के उद्देश्य से मैंने पूछा...

प्रश्नः ट्रेन मुगलसराय कब पहुंचेगी?

अटेंडेंटः सर, ट्रेन तीन घंटे लेट चल रही है। अगर और लेट नहीं होती है तो कल सुबह 11 बजे तक पहुंच जानी चाहिए।

प्रश्नः ट्रेन लेट क्यों हो गई?

अटेंडेंटः सर, इस रूट पर इतनी गाड़ियां हो गई है कि रेग्युलर गाड़ियों को समय पर चलाना मुश्किल हो रहा है। फिर ये तो स्पेशल ट्रेन ही है|

प्रश्नः बात तो सही है। वैसे ट्रेन में कोई मंत्री या वीआईपी यात्रा कर रहा है क्या?

अटेंडेंटः मुझे तो पता नहीं सर।

प्रश्नः फिर ट्रेन में सबकुछ ‘परफेक्ट’ क्यों दिख रहा है?

अटेंडेंटः परफेक्ट?

प्रश्नः परफेक्ट मतलब, पर्दे, फ्लोर, खिड़कियां, बेडिंग, टायलेट, तुम्हारी वर्दी। आज तो सबकुछ बड़ा साफ सुथरा और ‘चकाचक’ दिख रहा है। और आज तो तुमने बिना मांगे बेडिंग के साथ टॉवेल भी दे दिया।

अटेंडेंटः सर, अब तो रोज ऐसा ही होता है। कम से कम जब से मैं इस ट्रेन में चल रहा हूं ऐसा ही देखता आ रहा हूं।

प्रश्नः हम्म...। नई ज्वाइनिंग लग रही है। कब ज्वाइन किया? किस जोन का रिक्रूटमेंट है तुम्हारा?

अटेंडेंटः जोन? मैं तो दिल्ली से ही हूं।

प्रश्नः हां लेकिन परीक्षा कहां हुई थी? ज्वाइन कहां किया?

अटेंडेंटः परीक्षा तो नहीं हुई। दिल्ली में ही ज्वाइन किया।

प्रश्नः परीक्षा नहीं हुई? किसी की जगह पर लगे हो क्या?

अटेंडेंटः नहीं सर, किसी की जगह नहीं लगा। दरअसल, अधिकांश ट्रेनों में अब हाऊस कीपिंग सर्विस का काम प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर संभालने लगे हैं। अब यह काम रेलवे के जिम्में नहीं रहा। अब हमें नौकरी के लिए रिश्वत, सोर्स इन सबकी जरूरत नहीं पड़ती। हाऊस कीपिंग का काम कॉन्ट्रेक्टर के हाथ में आने के कारण सारे कर्मचारी बड़े एक्टिव रहते हैं। अब देखिए, मैं खुद पहले कई बार रेलवे भर्ती बोर्ड की कोच अटेंडेंट की परीक्षा में शामिल हो चुका हूं। मैनें एमए किया है, बड़ी तैयारी की, लेकिन मेरी नौकरी लगी। क्योंकि रिजर्वेशन, कोटा, सोर्स इसमें पिछड़ जाता था। वैसे भी, पहले एकबार जिसकी नौकरी लग जाती थी वो ये सोच कर बैठ जाता था कि सरकारी नौकरी मिल गई अब क्या करना है। वह बोलता जा रहा था। यहां तो कान्ट्रेक्टर के लोग व्यक्तिगत तौर पर सारी चीजों का निरीक्षण करते हैं। फीडबैक फार्म को भी काफी ध्यान से पढ़ा जाता है। किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पर या तो सैलरी कट जाती है या फिर नौकरी हाथ से चली जाती है।

अब मुझे ट्रेन में आए इस परिवर्तन का कारण अच्छी तरह समझ में आ चुका था। कंपार्टमेंट में वापस अपनी सीट पर आकर मैं देर तक सोचता रहा, कि कैसे लोग प्राइवेट सेक्टर में काम करते हुए अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाते हैं? सरकारी नौकरी करते समय इतना जागरूक क्यों नहीं रहते?

- अविनाश चंद्र