नई राजनीति की तलाश

जब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम 28 फरवरी को संप्रग-2 का आखिरी बजट पेश करने के लिए उठे थे तो लोग यह कल्पना रहे थे कि वह सब्सिडी और वोट के लिए कुछ और लोक-लुभावन योजनाओं की शुरुआत करने की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह जिम्मेदार बजट निकला, जिसने राजस्व घाटे को 4.8 प्रतिशत पर रोकने का संकल्प व्यक्त किया। विडंबना यह रही कि यह उन अपेक्षाओं के लिहाज से अपर्याप्त रहा जो भारत की उच्च विकास दर के संदर्भ में की जा रही थीं।

संयोग देखिए कि बजट पेश करने से एक दिन पहले ही न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में भारतीय शोधार्थी सुगता मित्रा ने 10 लाख डॉलर का टीईडी (टेक्नॉलाजी, एंटरटेनमेंट एंड डिजाइन) पुरस्कार जीता। यह पुरस्कार दुनिया भर में शिक्षकों और माता-पिता को प्रोत्साहित करेगा। सुगता मित्रा ने बच्चों के सीखने की प्रक्रिया के लिए नवाचार को बढ़ावा दिया। बहुत से लोगों के लिए यह पुरस्कार भारत की नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती सफलता की अवधारणा को मजबूत करने वाला था, चीन की तरह ऊपर से नीचे नहीं, जिसे सरकार ढांचागत संरचना के जरिये हासिल करती है। इससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि भारत प्रशासन के बगैर बढ़ रहा है, न कि इसके कारण।

बेशक भारत में समृद्धि बढ़ रही है, लेकिन प्रशासन बेहद कमजोर है। लोग सामान्य-सी सुविधा पाने को भी हताश रहते हैं। जब सरकार को कानून एवं व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने के पानी जैसी सेवाएं मुहैया कराने की जरूरत है तब इन सभी मोर्चो पर सरकार कमजोर साबित हो रही है। जहां जरूरत नहीं है, वहां यह ज्यादा सक्रिय है। इसलिए भारतीय निजी सफलता और सरकारी स्तर पर असफलता की कहानी बयान करते हैं। यह कहते हुए कि भारत रात में तरक्की करता है, जब सरकार सोती है। लेकिन, एक देश असफल प्रशासन के बावजूद उच्च विकास वाली अर्थव्यवस्था कैसे बन सकता है? गिरती अर्थव्यवस्था प्रतीक है कि भारत ने रात में बढ़ने की सीमाएं जान ली हैं। दो साल पहले तक भारत दुनिया के लिए उम्मीद की किरण था। अपना देश वैश्विक आर्थिक संकट से भी बच गया। भारत में घरेलू प्रतिद्वंद्विता में लगी दर्जनों कंपनियां हैं, जो वैश्विक मंच पर दिखने लगी हैं। भारत 1991 के आर्थिक सुधारों पर सवार होकर बढ़ रहा था। यहां तक कि धीमे आर्थिक सुधार भी हमें दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की ओर बढ़ा रहे थे, लेकिन कांग्रेस नीत मौजूदा संप्रग सरकार ने विनाशकारी गलतियां कीं।

सोनिया गांधी और उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रभाव में इसने मान लिया कि सुधारों का लाभ सिर्फ अमीरों को पहुंच रहा है, आम आदमी को नहीं। यह सच नहीं है। सुधार शुरू होने के बाद से हर साल एक प्रतिशत गरीब गरीबी रेखा से ऊपर उठ रहे हैं। संप्रग सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में वाम सहयोगियों के साथ मिलकर यह धारणा कायम की कि विकास का पुराना मॉडल गलत था और समग्र विकास का नया नारा दे डाला। इससे सड़कें बनाने के बजाय उसका फोकस सस्ता भोजन, ऊर्जा और श्रम साध्य काम मुहैया कराने पर हो गया। बिजनेस विरोधी रवैया अपनाकर उसने नई औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देना बंद कर दिया। इससे महंगाई बढ़ गई, विकास दर गिर गई, राजस्व घाटा बढ़ गया और भारतीय अर्थव्यवस्था घुटनों के बल आ गिरी। यदि राजग सरकार के बाद संप्रग सड़क निर्माण जारी रखती तो आज भारत की तस्वीर कुछ और होती। विश्व बैंक की रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है, जिसमें कहा गया है कि स्वर्णिम चतुर्भुज योजना से विनिर्माण, नौकरियों और उत्पादकता में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई थी। एक समस्या भूमि अधिग्रहण रही। संप्रग सरकार ने इसे और बढ़ा दिया।

नए भूमि अधिग्रहण विधेयक के तहत एक एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने में कम से कम दो साल लग जाएंगे, क्योंकि प्रस्ताव को सैकड़ों हाथों से गुजरना पड़ेगा। सामाजिक विश्लेषण होगा। फिर निचली समितियों की रिपोर्ट को राष्ट्रीय समितियां प्रमाणित करेंगी। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य एनसी सक्सेना खुद कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण संबंधी प्रस्तावित विधेयक किसान विरोधी जरूर है, लेकिन सिविल सोसायटी समर्थित है। इसका क्या जवाब है? भारत के लिए उम्मीद अब भी युवाओं में दिखाई देती है, जो अभी देश की जनसंख्या में एक तिहाई हैं और एक दशक बाद आधे होंगे। उनके पास अपना वोट देने के लिए कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि कोई भी राजनेता लोकहित की भाषा में बात नहीं करता।

मौजूदा राजनीतिक दल मतदाताओं को लाचार, अनदेखी भीड़ समझते हैं। महत्वाकांक्षी युवा भी भ्रम में हैं कि उनका सहिष्णु राष्ट्र धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता तो देता है, लेकिन आर्थिक आजादी देने में असफल हो जाता है। एक ऐसे देश में जहां प्रत्येक पांच में से दो स्वउद्यमी हैं, एक कारोबार शुरू करने में लंबा वक्त लग जाता है और उद्यमी लालफीताशाही व भ्रष्टाचार का पीडि़त बन जाता है। कोई हैरानी नहीं होती जब वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का 119वां और कारोबार की सहूलियत देने में 134वां स्थान आता है। इस तरह सुधार गुप्त रूप से बंद हो गए, क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल को यह समझाना नहीं पड़ता कि आर्थिक सुधार आम आदमी के लिए फायदेमंद हैं। आर्थिक निर्णय भ्रष्ट राजनेताओं और अधिकारियों के बजाय बाजार के हाथ में होना बेहतर है।

सुधारकर्ताओं ने बाजार समर्थित और बिजनेस समर्थित होने में अंतर नहीं समझाया। लिहाजा लोगों में यह धारणा बन गई कि उदारवादी सुधार सिर्फ अमीरों के लिए ही फायदेमंद हैं। वे यह नहीं समझते कि बाजार समर्थित होने का मतलब प्रतिद्वंद्विता में भरोसा करना है, जिससे वस्तुओं के दाम कम रहते हैं, उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ती है और एक नियम आधारित पूंजीवाद बनता है, जो हर किसी के लिए फायदेमंद है। बिजनेस समर्थित होने का मतलब है आर्थिक फैसलों पर राजनेताओं और अधिकारियों के साथ बाजार का नियंत्रण रखना और इससे क्रोनी कैपिटलिज्म पनपता है। केंद्र में सुधारों और बाजार में भरोसा करने वाला राजनीतिक दायरा रिक्त है और हमारे देश का मौजूदा कोई भी राजनीतिक दल इसे भरने वाला नहीं है।

महत्वाकांक्षी भारत के लिए जवाब सिर्फ एक नई उदारवादी पार्टी हो सकती है, जो आर्थिक परिणामों के लिए अधिकारियों से ज्यादा बाजारों पर भरोसा करे और जिसका फोकस लगातार संस्थागत सुधारों पर बना रहे। हो सकता है कि ऐसे राजनीतिक दल को हाथों-हाथ वोट न मिल पाएं, लेकिन यह प्रशासनिक सुधारों को केंद्र में ले आएगा और धीरे-धीरे मतदाताओं के सामने साबित कर देगा कि खुले बाजार और नियम आधारित सरकारें ही जीवन स्तर सुधारने और समृद्धि के वितरण का सही रास्ता है।

- गुरचरण दास (लेखक जाने-माने स्तंभकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण

गुरचरण दास

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.