तरुणाई में दिखा गंभीर, युवावस्था में हुआ अधीर

विगत 13 मई को भारतीय संसद ने स्थापना के साठ वर्ष पूरे कर लिए। इन साठ वर्षों के दौरान दुनिया ने सबसे बड़ी लोकतंत्रिक व्यवस्था को तरुणाई की दहलीज लांघ युवावस्था में पहुंचता देखा। इस दौरान इस व्यवस्था से सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएं और उम्मीदें जुड़ी रहीं। किसी ने इसे विश्व की आर्थिक महाशक्ति के तौर पर देखा तो किसी को इसमें वैश्विक राजनैतिक नेतृत्व की झलक दिखी। किसी ने इसे सामरिक दुनिया के सेनापति के तौर पर देखा। वर्ष 1947 में अहिंसा की अनकही, अनसुनी, अनदेखी ताकत के बल पर ब्रिटानी हुकूमत की जंजीरों से आजाद हो गणतंत्र बने इस राष्ट्र और इसकी व्यवस्था से    ये उम्मीदें बेजां भी नहीं थी। संदन ने शुरूआती वर्षों में ठीक वैसा ही प्रदर्शन किया जिसकी उम्मीद थी। आरंभिक वर्षों के दौरान जवाहरलाल नेहरू, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, हीरेन मुखर्जी, राम मनोहर लोहिया, मावलंकर, दीनू मसानी, जे बी कृपलानी, अटल बिहारी वाजपेयी, जगजीवन राम, सोमनाथ चटर्जी जैसे तमाम सांसदों ने अपनी काबिलियत, जिम्मेदाराना रवैये और वाकपटुता से यह प्रदर्शित कर दिया कि देश सही राह पर है। इसके बाद जैसे जैसे समय बीतता गया संसद आरंभिक अवस्था से बाहर निकलकर तरुणावस्था में पहुंचा। यह वह समय था जबकि संसद ने आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक जैसी सभी आंतरिक व वाह्य चुनौतियों का मिलजुल कर सामना किया और अपनी गंभीरता का परिचय दिया।

इसके बाद का काल संक्रमण काल के जैसा रहा। पहले इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान लोगों की वाक-अभिव्यक्ति के अधिकार को हतोत्साहित करने के प्रयास किये गए। उसके बाद राजनीति के अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, सांसदों की खरीद-फरोख्त, पैसे लेकर प्रश्न पूछने, बेवजह हंगामा काटने जैसी गतिविधियां सदन की आदत और उसके बाद पहचान बनने लगी। इसकी गरीमा लगातार घटने लगीं और जो नेता जनता के लिए आदरणीय थें उनकी छवि में गिरावट आने लगी। बाहुबल व धनबल की सीढ़ी चढ़ सदन तक पहुंचने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि होने लगी। हर पार्टी द्वारा सत्तालोलुपता के वशीभूत हो अपराधियों को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने की परंपरा शुरू हो गई। कुछ एक अपराधिक छवि वाले सदस्यों के साथ शुरू होकर यह संख्या डेढ़ सौ से अधिक पहुंच गई। राजनैतिक दलों की रूचि जन कल्याण में कम और वोट बैंक की नीति स्वहित की ओर ज्यादा उन्मुख होने लगी। आलम यहां तक पहुंच गया कि वर्ष 1997 में जब देश आजादी की 50वीं वर्षगांठ मना रहा था तब सदन में अपराधियों के प्रवेश पर रोक लगाने की चर्चा हो रही थी। सभी दलों ने इस बाबत बढ़चढ़कर भाषण दिए और राजनीति के अपराधिकरण व अपराधियों के राजनीतिकरण पर रोक लगाने के लिए कड़े कदम उठाने पर सहमति जताई।

यह वह समय था जब संसदीय व्यवस्था युवावस्था में प्रवेश कर रही थी और उससे और अधिक गंभीर व जनकल्याणकारी होन की उम्मीद की जा रही थी। इसके बाद वे दिन एकदम से लुप्त हो गए जब सत्तापक्ष विपक्ष को सदन का आवश्यक अंग मान उनकी बातों, आपत्तियों आदि पर गंभीर विचार करता था। सदन की कार्रवाई के दौरान एक-एक बिल पर प्रर्याप्त विचार मंथन हुआ करते थे और सबके संतुष्ट होने के बाद ही उसे पास किया जाता था। संसद के इतिहास में कई ऐसे पल देखने को मिले जहां जनहित में नेताओं ने अपने ही दल की नीतियों व पार्टी व्हिप को अनदेखा करते हुए भी कदम उठाए। बाद में यही पार्टी व्हिप कार्य में बाधा बनने लगी और न चाहते हुए भी सदस्यों को अपनी पार्टी के स्टैंड का समर्थन करने को बारबार मजबूर होना पड़ा।

आज एक बार फिर जब हम संविधान की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ मना रहे है और फिर वहीं पुरानी चर्चा दोहराई जा रही है। आज फिर से सदन की गरीमा को बरकरार रखने और कार्रवाई के सुचारू तौर पर चलने देने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा आह्वान किया जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री की इस अपील का सदस्यों पर क्या और कितना प्रभाव पड़ेगा यह देखने वाली बात होगी। क्या ही अच्छा होता कि कुछ ऐसे प्रावधान किए जाते जिनकी मांग न केवल लंबे समय से लंबित पड़ी है बल्कि वर्तमान परिदृश्य में अवश्यंभावी भी है। उदाहरण के लिए जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार (राइट टू रिकॉल), आपराधिक छवि वाले सदस्यों (लोकसभा, राज्यसभा) के मामलों की सुनवाई कार्यकाल के पहले वर्ष तक निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना करना आदि। ऐसी छवि वाले सदस्यों की सुनवाई निचली अदालतों व उसके बाद एक एककर अन्य अदालतों में पहुंचने और इसमें व्यय होने वाले समय को देखते हुए सीधे हाईकोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के प्रावधान भी किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त गैरलाभकारी विधेयकों को पास होने से रोकने के लिए सभी विधेयकों का पास किए जाने के पूर्व सदन में पढ़ा जाना अनिवार्य करने व सनसेट क्लाज के आधार पर किसी भी कानून के अधिकतम पांच वर्ष के लिए प्रभावी होने और जरूरत होने पर अगले पांच वर्षों के लिए लागू किए जाने का प्रावधान करना भी बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। किसी भी योजना की घोषणा करने के पूर्व उस मद में होने वाले खर्च के आगम स्त्रोत का खुलासा करना न केवल पारदर्शिता पैदा करेगा बल्कि बेवजह की घोषणाओं पर रोकथाम लगाने का भी काम करेगा।

गठबंधन सरकार की स्थिति में देशहित व लोक कल्याणकारी योजनाएं लागू किए जाने की राह में पैदा होने वाले व्यवधान को दूर करने के लिए किसी भी दल द्वारा सरकार के खिलाफ नो कांफिडेंस वोट का आह्वान करने से पहले वैकल्पिक सरकार के गठन का तरीका सुझाना भी अवश्यंभावी किया जा सकता है। इससे न केवल सरकार का कार्यकाल पांच वर्ष तक सुनिश्चित हो सकेगा बल्कि जनता पर मध्यावधि चुनाव का भार भी नहीं पड़ेगा।

एक अन्य महत्वपूर्ण कदम के तौर पर किसी मंत्रालय के प्रभार को सौंपने का अधिकार पूर्ण रूप (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) से प्रधानमंत्री के पास होना चाहिए। प्रधानमंत्री को योग्य मंत्री के चयन के लिए चयनित सदस्यों की बाध्यता से मुक्त रखना भी बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। किसी योग्य (विषय विशेषज्ञ) व्यक्ति को बाहर से लाकर मंत्री बनाने का अधिकार भी प्रधानमंत्री के पास होना चाहिए ताकि कार्यों के संपादन के दौरान गुणवत्ता बरकरार रहे। आमतौर पर ऐसा देखने को मिलता है कि संख्या बल के आधार पर सरकार को समर्थन दे रही पार्टियां चुनिंदा मंत्रीपद के लिए ब्लैकमेलिंग तक करने लगती हैं। चयनित व गैर चयनित सदस्यों के मंत्री बनाने का अनुपात 50-50 भी किया जा सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव सदस्यों को पार्टी व्हिप की मजबूरी से बाहर निकालना हो सकता है। सदस्यों को किसी भी मुद्दे पर अपनी मर्जी से वोट करने का अधिकार प्रदान किया जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि अक्सर यह देखने में आता है कि सदस्य जनहित के मुद्दों पर भी पार्टी के स्टैंड से बंधे रहने को मजबूर हो जाते हैं और कल्याणकारी योजनाएं पारित नहीं हो पातीं। ये कुछ ऐसे सुझाव हैं जिनपर दुनिया के कई देश अमल कर एक स्वच्छ एवं विश्वसनीय सरकार के गठन में सफल साबित हुई हैं।

- अविनाश चंद्र