निराश करती राजनीति

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में मतदान हो जाने के बाद अब सारी लड़ाई राजस्थान और दिल्ली में केंद्रित हो गई है। इन दोनों राज्यों में मतदान की घड़ी करीब आने के साथ ही राजनीतिक दल एक-दूसरे पर बढ़त हासिल करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान और दिल्ली उन राज्यों में शामिल हैं जहां मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच है। स्वाभाविक रूप से दोनों दलों के प्रमुख नेता एक के बाद एक चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और इस प्रकार की रैलियों को सफल दिखाने के लिए उनमें लोगों की भीड़ जुटाने के लिए भी अतिरिक्त मेहनत की जा रही है। नेताओं के एक दिन में होने वाली सभी रैलियों में भाषण कुल मिलाकर एक जैसे होते हैं। इन भाषणों में विरोधी दलों को हर तरह से कोसने के साथ-साथ अपनी कुछ उपलब्धियों का भी बखान किया जाता है। लगभग सभी बड़े नेता अपने भाषणों में विरोधी राजनीतिक दलों पर कीचड़ उछाल रहे हैं और संभवत: यही कारण है कि निर्वाचन आयोग के पास शिकायतों का ढेर भी बढ़ता जा रहा है। चुनाव के इस अवसर पर नेताओं की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ जो कुछ भला-बुरा कहा जा रहा है उसके पीछे शायद ही उनके पास कोई मजबूत आधार हो। अगर भाजपा ने कांग्रेस को भ्रष्टाचार के मसले पर घेरने की कोशिश की तो उसे मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ राहुल गांधी के हमलों का भी सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ सरकार भी इसी आधार पर राहुल गांधी के निशाने पर रही।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में कांग्रेस को अनेक मोर्चो पर घेरने की कोशिश की। उन्होंने गरीबी से लड़ने की कांग्रेस की मंशा पर सवाल खड़े किए और यह दावा किया कि केवल कानून बनाने से गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। गरीबी हटाने के लिए जमीन पर कार्य होना आवश्यक है। उनका इशारा साफ तौर पर खाद्य सुरक्षा कानून की ओर है, जिसे कांग्रेस अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। ऐसी ही स्थिति राजस्थान में भी देखने को मिली। मोदी ने कांग्रेस को सारी समस्याओं की जड़ बताया तो राहुल गांधी ने भाजपा को भ्रष्टाचार की मास्टर बता दिया।

बयानबाजी के इस दौर में दोनों ही दलों के नेता यह स्पष्ट करने से बच रहे हैं कि बेरोजगारी पर नियंत्रण और विकास के लिए उनकी नीतियां क्या होंगी? दिल्ली की ही बातें करें तो यह तथ्य सामने आना चौंकाने वाला है कि 40 प्रतिशत आबादी अभी भी सीवर और पेयजल कनेक्शन की सुविधा से वंचित है। दिल्ली में 15 वर्ष से शासन कर रही कांग्रेस यह बता पाने में नाकाम है कि यह स्थिति क्यों है? उसकी ओर से यह भी स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि अगर एक बार फिर उसे जनादेश मिलता है तो जन सुविधाओं के अभाव को कैसे दूर किया जाएगा? लगभग यही हाल भाजपा का भी है। उसके प्रत्याशी भी सीवर, पेयजल, सड़क, बिजली, यमुना की सफाई जैसे मुद्दों पर कांग्रेस को तो घेर रहे हैं, लेकिन यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि इनसे संबंधित समस्याओं का समाधान कैसे किया जाएगा? उन्हें इसका अहसास होना चाहिए कि एक दिन में पांच-सात जनसभाएं कर एक जैसी बातें बोल देने से कुछ नहीं होने वाला।

देश में आज अर्थव्यवस्था की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। गिरती विकास दर ने अनेक समस्याओं को गंभीर कर दिया है। बेरोजगारी एक ऐसी ही समस्या है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा एक लंबे अर्से से केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार और नीतिगत निष्क्रियता के कारण घेर रही है। दिल्ली और राजस्थान में वह कांग्रेस को सत्ता से बेदखल भी करना चाहती है, लेकिन उसे विकास, जनकल्याण, महंगाई पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर अपनी रूपरेखा भी स्पष्ट करनी चाहिए। इस संदर्भ में केवल घोषणापत्र का हवाला देना सही नहीं है, क्योंकि हर कोई यह जानता है कि ऐसे घोषणापत्र रस्म अदायगी से अधिक कुछ नहीं होते। चुनाव के अवसर पर राजनेता अपने भाषणों में जनता से मुफ्त अथवा रियायती दर पर बिजली, पानी, खाद्यान्न देने जैसी अनेक लोकलुभावन घोषणाएं करते हैं-बिना इसकी परवाह किए कि ऐसी घोषणाओं को पूरा करने से कैसी समस्याएं उभरेंगी? क्या किसी ने सोचा है कि रियायती दर पर अथवा मुफ्त बिजली देने से बिजली कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी?

कुछ यही स्थिति सस्ते खाद्यान्न वितरण की योजनाओं के मामले में भी है। ऐसी योजनाएं कुल मिलाकर वोट बटोरने का हथियार मात्र हैं। मुफ्त अनाज बांटकर हम गरीबों की समस्या का फौरी इलाज ही कर सकते हैं, लेकिन इससे राजकोष पर जो बोझ पड़ता है वह अंतत: निर्धन-वंचित आबादी समेत समाज के सभी वर्गो पर भारी पड़ता है। छत्तीसगढ़ सरीखे कुछ राज्यों ने रियायती दर पर अनाज वितरण की योजनाओं को प्रभावशाली ढंग से लागू किया है, लेकिन उन्हें भी इस घाटे की भरपाई अन्य स्नोतों से करनी पड़ी।

गरीबी किसी भी सभ्य समाज के लिए एक अभिशाप है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने देश में निर्धनता निवारण की योजनाएं गरीबों को वित्तीय अथवा खाद्यान्न की मदद देने पर आधारित हैं। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार उन्हें स्वावलंबी बनाने की दिशा में प्रतिबद्ध नजर नहीं आती। मुफ्त में अनाज बांटना निर्धनता निवारण की सही नीति नहीं हो सकती। राष्ट्रीय दलों के रूप में कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेताओं के भाषण यह भरोसा नहीं देते कि वे निर्धनता निवारण की किसी दूरदर्शी नीति पर अमल करेंगे। यही बात सामाजिक भेदभाव की समस्या के संदर्भ में कही जा सकती है। दरअसल दोष समाज का भी है, जो अपनी सभी समस्याओं के समाधान के लिए राजनीतिक दलों की ओर ही ताकता है। हमारे समाज के अंदर बहुत सी ऐसी कुरीतियां हैं जो उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं और जिनका समाधान समाज के स्तर पर ही संभव है। एक आदर्श नेता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाज को इन कुरीतियों से लड़ने के लिए प्रेरित करे। दुर्भाग्य से राजनेता ऐसा करने से बचते हैं और चुनाव के समय तो उनके लिए ऐसा करना और भी मुश्किल हो जाता है। राजनीतिक दलों से देश और समाज को दिशा देने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन वे अपनी यह जिम्मेदारी पूरी करते नजर नहीं आते। लगता है कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो के फेर में वे यह भूल से गए हैं कि उन्हें जनता को देश निर्माण के लिए किस तरह प्रोत्साहित करना है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि राजनेता चुनाव के अवसर पर कोरी भाषणबाजी ही न करें, बल्कि समस्याओं के समाधान संदर्भ में अपना दृष्टिकोण भी स्पष्ट करें। उनके बीच बहस विकास के मॉडलों पर होनी चाहिए, न कि आरोपों-प्रत्यारोपों पर। जब ऐसा होगा तभी मतदाताओं को यह निर्णय लेने में आसानी होगी कि किसका विकास मॉडल सबसे अच्छा है।

 

- संजय गुप्ता

साभारः दैनिक जागरण