छड़ी दिखाने से निवेश नहीं आएगा

अपने पड़ोस में खूबसूरत इंडिया पार्क की कल्पना करें। इसमें झूले हैं, प्राकृतिक पगडंडियां हैं, फूलों की क्यारियां, खेल की सुविधाएं और वॉकिंग ट्रैक, क्या नहीं है। सबकुछ अद्‌भुत सिर्फ एक चीज छोड़कर। बच्चे वहां खेलने नहीं आते। ऐसा इसलिए  है, क्योंकि उसका इस्तेमाल वरिष्ठ नागरिक करते हैं, जिन्हें बच्चे अंकल कहते हैं। सौ से ज्यादा अंकल सुबह और शाम की सैर, सोसायटी की बैठकों और योगा क्लास के लिए इस पार्क का उपयोग करते हैं।
 
हर अंकल के पास एक छड़ी होती है, जिसका उपयोग वे उन बच्चों पर करते हैं, जो पार्क में आने का साहस दिखाते हैं। यदि कोई बच्चा ज्यादा उछल-कूद करे, किलकारियां मारे, पेड़ पर चढ़ जाए या क्रिकेट खेले तो अंकल उस बच्चे को छड़ी लगा देते हैं। आखिरकार अंकलों को लगता है कि पार्क में व्यवस्था कायम रहनी चाहिए। अंकलों ने वहां बड़ा-सा माइक्रोफोन लगा दिया ताकि बच्चों को तमीज से पेश आने की चेतावनी दी जाती रहे। पार्क में अंकलों का राज है।
 
जैसी कि अपेक्षा थी बच्चों ने जल्द ही उस पार्क में आना छोड़ दिया। कौन अपनी स्वाभाविक गतिविधियों के लिए छड़ी खाना चाहेगा! वे शहर के उस पार के चाइना पार्क में जाने लगे, जहां उन्हें वाकई लगता  कि उनका स्वागत किया जा रहा है। उस पार्क में भी नियम-कायदे हैं, पर बहुत ही सरल से। पार्क को साफ रखें, किसी को चोट न पहुंचाएं। इसके अलावा उन्हें प्रोत्साहित किया जाता कि वे खुद को चुनौती दें और पार्क का मजा लें यानी उद्यान में नई बातें लाएं, उसमें खोज करें। खुद भी आनंद लें और उद्यान का भी विकास करें। अब वे ही बच्चे इंडिया पार्क का इस्तेमाल करते, जिन्होंने अंकलों को खुश करने का तरीका खोज लिया था। जब भी वे पार्क में आते अंकलों के लिए कुछ न कुछ लेकर आते, मिठाई का डिब्बा, कोल्ड ड्रिंक्स या अखबार। फिर अंकल उन्हें थोड़ा खुला छोड़ देते।
 
हालांकि, ऐसा करने वाले बच्चों की संख्या कम होती, क्योंकि अंकलों को रिश्वत देना ऐसी बात नहीं है, जिसे अधिकांश अच्छे बच्चे करना चाहें। जाहिर है इंडिया पार्क ज्यादातर खाली पड़ा रहता और उसका ज्यादा उपयोग नहीं हो पाता। अंकल इंडिया पार्क में बैठे-बैठे सोचते रहते, ‘यहां इतने कम बच्चे क्यों आते हैं, जबकि इससे 20 गुना बच्चे तो चाइना पार्क में जाते हैं? चाइना पार्क में ऐसी क्या बात है?’ अंकल अपनी टोपी में छड़ी खोंसकर पार्क में मीटिंग करते और इसका हल ढूंढ़ने पर विचार करते हैं। काफी विचार-विमर्श और बहस के बाद वे पार्क के बाहर बड़ा-सा साइन बोर्ड लगाने का फैसला करते हैं, ‘बच्चों का स्वागत है।’ हालांकि, इससे पार्क की दशा में कोई बदलाव होता नजर नहीं आया। 
 
इस कहानी में अंकल की जगह भारत सरकार, बच्चों की जगह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले, मजा लेने की जगह जायज मुनाफा और इंडिया पार्क की जगह भारत रख दीजिए और आपके सामने सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा। संक्षेप में यह वैश्विक निवेशक समुदाय के प्रति हमारे व्यवहार की कहानी है। हम यह तो चाहते हैं कि वे आकर हमारे देश में निवेश करें ताकि आर्थिक वृद्धि की दर बढ़ें, लेकिन हम उन्हें छड़ी से पीटना चाहते हैं और जिस क्षण वे थोड़ा मजा लेने लगें (यानी जायज मुनाफे के रूप में अपने जोखिम के बदले में पुरस्कार पाएं) तो उन पर चिल्लाना चाहते हैं। यही वजह है कि प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ के नारे के मुताबिक उपलब्धियां हासिल करने की दिशा में हमें लंबा रास्ता तय करना है। इसका सबसे कठिन हिस्सा इसके लिए जरूरी आधारभूत ढांचे का निर्माण हासिल करना नहीं है बल्कि ‘काबू में रखने की सनक’ है जो सत्ता के हमारे गलियारों (थोड़ी-सी भी सत्ता रखने वाली किसी भी भारतीय संस्था) में मौजूद है।
 
हम कहते हैं कि हम कभी भी रिट्रॉस्पेक्टिव टैक्स कानून (जो सरकार को पिछले साल के कर कानून बदलने और पैसा वसूलने का अधिकार देते हैं, विचित्र बात है, नहीं?) का इस्तेमाल नहीं करेंगे, लेकिन हम यह कानून हटाते भी नहीं हैं। अंकल कहते हैं, हम छड़ी तो रखेंगे पर इसका उपयोग नहीं करेंगे। अब कई बच्चे तो छड़ी देखकर ही बिदक जाते होंगे। ठीक है, हो सकता है अंकल इसे आज नहीं इस्तेमाल करें। यदि कल कोई दूसरा अंकल आ जाएगा तो क्या होगा? क्या नियम-कानून अंकल के व्यक्तित्व पर निर्भर होंगे? हम चाहते हैं कि दुनियाभर की कंपनियां हमारे देश में आकर निवेश करें, किंतु सरकार इतने नियंत्रण और अनुमतियां लागू कर देती हैं कि हर बिज़नेस पर उसका नियंत्रण स्थापित हो जाता है। खुली अर्थव्यवस्था का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। हम इसे मुक्त बाजार वाला पूंजीवाद कहते हैं, लेकिन असल में यह सरकार नियंत्रित पूंजीवाद है। अंकल आपको बिज़नेस करने दें इसका एक ही तरीका है कि आप उन्हें पर्याप्त भेंट चढ़ाते रहें। इसी तरह तो स्वतंत्रता के बाद से ही देश को चलाया जाता रहा है और यही वजह है कि इस मानसिकता को बदलना इतना कठिन है।
 
यह सब ठीक होता पर दुर्भाग्य से अंकल और छड़ी के इस मॉडल के कारण पार्क हमेशा खाली रहता है। यदि निवेशक नहीं आते तो हमें नौकरिया नहीं मिलेंगी अथवा हमारे यहां आर्थिक विकास नहीं होगा। बच्चे तो किसी और पार्क में खेल लेंगे। एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, पूर्वी यूरोप और लैटिन अमेरिका सब निवेशकों के डॉलर हासिल करने और उत्पादन नगरों (मैन्यूफैक्चरिंग हब) को बसाने की होड़ में लगे हैं। निवेशकों को लाने का एक ही तरीका है कि नियम-कायदे स्पष्ट, सरल हों और नेता के व्यक्तित्व पर निर्भर न हों। ऐसा लिखित में तो होना ही चाहिए पर उसकी भावना और व्यावहारिक  स्तर पर भी हमें खरा उतरकर दिखाना होगा।
 
यदि हम वाकई ‘मेक इन इंडिया’ चाहते हैं तो सरकार को व्यावसायिक जगत पर पकड़ कुछ ढीली करनी होगी। बिज़नेस के नियम तो रखिए पर अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक। सरकार को बिज़नेस से बाहर लाइए। न सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने के संदर्भ में बल्कि निजी व्यवसाय पर भी मनमाने या विवेकाधीन नियंत्रण न रखने के अर्थ में भी। इस सबका संबंध शासक के व्यक्तित्व से बिल्कुल नहीं होना चाहिए यानी जैसा शासक वैसी नीतियां, यह ठीक नहीं है। मौजूदा वित्तमंत्री हो सकता है निवेशकों के अनुकूल हों। संभव है अगला वित्तमंत्री निवेश के अनुकूल न हो। यदि मैंने देश में पैसा लगाया है तो मुझे इस बारे में कैसे पक्का भरोसा हो सकता है कि अगला व्यक्ति मेरे पीछे छड़ी लेकर नहीं दौड़ेगा? यदि हमें आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार में बढ़ोतरी भी चाहिए तो इन सब मुद्‌दों को हल करना होगा। यहीं वे बातें हैं, जो ‘अच्छे दिन’ साकार करेंगी। अंकलो, छड़ी को जाने दीजिए, बच्चों को आकर खेलने दीजिए।
 
 
- चेतन भगत, अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार
- साभारः दैनिक भास्कर