आगे बढ़ती भारतीय महिलाएं

शहरी महिलाओं ने इधर एक नया आसमान छू लिया है। इस काम में उनकी सबसे ज्यादा मदद की है आर्थिक आजादी ने। एक मार्केट रिसर्च फर्म आईएमआरबी के मुताबिक शहरी महिलाओं की आमदनी में पिछले दशक के दौरान आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। यह अब बढ़कर करीबन दोगुनी हो गई है। औसतन प्रति भारतीय की आय से यह कहीं ज्यादा है। इसी अवधि में शहरी आय में करीब 100 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि शहरी महिलाओं की आय में 110 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इस बदलाव का सीधा असर महिलाओं की हैसियत और घर के रखरखाव पर पड़ता दिख रहा है। महिलाएं अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आत्मविश्वास से खरीदारी करती हैं। समझदारी से खर्च करने का यह गुण भी उनमें पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। यह फर्क कहीं न कहीं शहरी पारिवारिक जीवन - स्तर के साथ - साथ बाजार को भी तेजी से प्रभावित कर रहा है। दरअसल उनकी खरीदारी महज अपने लिए नहीं , परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए भी होती है। अक्सर वे अपने लिए बाद में और परिवार के सदस्यों के लिए खरीदारी पहले करती हैं। यह फर्क कमोबेश हर स्तर के शहर की महिलाओं में साफ नजर आ रहा है। यही कारण है कि बाजार भी अब अपनी रणनीति में परिवर्तन कर रहा है। वह अपने ज्यादातर सर्वे महिलाओं के विचारों पर ही आधारित रखने लगा है।

पढ़ी - लिखी शहरी महिलाओं की आय में हुई इस तेज बढ़ोत्तरी का सीधा असर उन कामकाजी महिलाओं पर भी पड़ा है जो अशिक्षित होने की वजह से सिर्फ शारीरिक श्रम कर सकती हैं। आय बढ़ने के कारण अच्छी नौकरियां कर रही महिलाएं अब घर के अनेक कामकाज खुद न करके ऐसी अशिक्षित महिलाओं से करवाने लगी हैं। पहले करीब 91 प्रतिशत महिलाएं घरेलू कामकाज खुद ही कर लिया करती थीं , लेकिन अब ऐसी महिलाएं सिर्फ 71 प्रतिशत रह गई हैं।

ऐसे बदले माहौल में यह स्वाभाविक है कि बहुत कम पारिवारिक खरीदारी ऐसी बची रह जाए जिसे पुरुष ही करें। सच तो यह है कि पुरुषों की जरूरतों की ज्यादातर चीजें भी महिलाएं ही बेहतर खरीद पाती हैं। आजाद भारत का यह एक ऐसा खुशनुमा चेहरा है जिससे स्वत : स्फूर्त ढंग से कई रूढ़ियां खुद ब खुद टूट रही हैं। कामकाजी बहू और बेटी के अपने पैरों पर खड़े होने के चमत्कार ने पुराने विचारों को पीछे धकेला है। इस परिवर्तन ने स्त्री में ऐसी नई जान फूंकी है कि वह अब वैचारिक स्तर पर भी पुरुष की बराबरी अधिक बेहतर ढंग से कर रही है। अच्छी बात यह है कि नई पीढ़ी के साथ साथ पुरानी पीढ़ी भी इस बदलाव को न सिर्फ समझ रही है बल्कि इसके साथ चलने में खुशी भी महसूस कर रही है।- स्निग्धा द्विवेदी