कसा ही रहा रेल पर राजनीति का शिकंजा

1995 में सीके जाफर शरीफ के बाद पवन कुमार बंसल रेल बजट पेश करने वाले पहले कांग्रेसी रेल मंत्री हैं। इसलिए लोग उम्मीद कर रहे थे कि इस बार 'रीजनल' नहीं 'नैशनल' रेल बजट आएगा। लेकिन कुछेक अपवादों को छोड़कर रेल बजट लकीर का फकीर ही साबित हुआ। 1990 के दशक में शुरू हुई गठबंधन राजनीति के नफा-नुकसान पर बहस हो सकती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसने भारतीय रेल का कबाड़ा कर दिया। इस दौरान रेल मंत्रालय को सहयोगी दलों को दहेज में दिया जाने वाला 'लग्जरी आइटम' मान लिया गया। सहयोगी दलों से बनने वाले रेल मंत्रियों ने इसका जमकर फायदा उठाया और उनमें रेलवे से जुड़ी परियोजनाओं को अपने-अपने गृह राज्य में ले जाने की होड़ मच गई। क्षेत्रीय असंतुलन के साथ इसका दूसरा नतीजा रेलवे की कंगाली के रूप में सामने आया। रेलवे को वोट बैंक की राजनीति से इस कदर जोड़ दिया गया कि कि किराये बढ़ाने का कलंक कोई अपने सिर नहीं लेना चाहता।

दूरदर्शिता की कमी

इसका दुष्परिणाम रेलवे के बढ़ते घाटे के रूप में सामने आया। 2005-06 में जहां रेलवे के पास 6193.3 करोड़ रूपये की अतिरिक्त राशि थी वहीं 2009-10 में यह घटकर महज 75 लाख रह गई। रेलवे को अपने रोजमर्रा के खर्चे के लिए भी सरकार से कर्ज लेना पड़ रहा है। इस कंगाली का ही नतीजा है कि सौ साल की उम्र पूरी कर चुके 28 हजार से ज्यादा पुलों पर कॉशन के सहारे गाड़ियां पास कराई जा रही हैं। वैगन, कोच और इंजनों की भीषण तंगी है। सुरक्षा के मामले में भी घोर लापरवाही बरती जा रही है। देश भर में अभी तक रूट रिले सिस्टम नहीं लग सका है। दुर्घटना रोकने के लिए एंटी कोलिजन डिवाइस नहीं है। ट्रेन प्रोटेक्शन वार्निंग सिस्टम भी नहीं लगाया गया। रेलवे को अपने मनमुताबिक चलाने वाले रेल मंत्रियों ने यात्री किरायों में घाटे की भरपाई माला भाड़े से करने की गलत परिपाटी शुरू कर दी। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे 'क्रॉस सब्सिडी' कहा जाता है। नतीजा यह हुआ कि माल भाड़ा तेजी से बढ़ा और माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा ट्रक कारोबारियों के पास चला गया। 1970-71 से अबतक कुल ढुलाई में रेलवे की हिस्सेदारी 70 से घटकर 30 फीसदी रह गई

कैसे होगा कायाकल्प

राष्ट्रीय के बजाए क्षेत्रीय जरूरतों को ध्यान में रखने से चुनिंदा लाइनों पर ही गाड़ियां बढ़ाई गईं, जिसका नतीजा बढ़ते कंजेशन व लेटलतीफी के रूप में सामने आया। दिल्ली-पटना संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस कभी टाइम टेबल से चलने में पटना राजधानी को टक्कर देती थी लेकिन अब यह गाड़ी घंटों विलंब से आती है। लोग उम्मीद कर रहे थे कि नए रेल मंत्री दिवंगत माधव राव सिंधिया की तरह रेल बजट पेश करेंगे और रेलवे एक बार फिर इकॉनमी की लाइफलाइन बनेगी। लेकिन रेल बजट रेलवे को वोट बैंक की राजनीति से बाहर निकालने में नाकाम रहा। रेलवे के कायाकल्प की कोई ठोस योजना पेश करने के बजाए रेल मंत्री संतुलन साधने में जुटे रहे। डीजल और बिजली के मूल्य में बढ़ोतरी के बावजूद रेलवे ने यात्री किराये में सीधे कोई बढ़ोतरी नहीं की लेकिन सभी कमोडिटी के भाड़े में एक समान फ्यूल एडजस्टमेंट कंपोनेंट डाल दिया। यह स्कीम 1 अप्रैल 2013 से लागू होगी। यात्रियों से पैसे निकलवाने की कोशिश सुपरफास्ट ट्रेनों के लिए अतिरिक्त शुल्क, टिकट रद्द करने, तत्काल और आरक्षण शुल्कों में बढ़ोतरी करके की गई है।

रूटों पर कंजेशन दूर करने के लिए कोई दूरगामी योजना नहीं दिखी। इतना ही नहीं, बढ़ते कंजेशन और विभिन्न जोनों में सैकड़ों ट्रेनें घाटे में चलने के बावजूद 106 नई ट्रेनें दौड़ा दी गईं, जबकि रेलवे की परफॉर्मेंस ऑडिटरिपोर्ट में कैग कह चुका है कि नई ट्रेनें चलाने के बाद यह मूल्यांकन होना चाहिए कि इनसे कितना नफा-नुकसान हो रहा है। आईआरसीटीसी पर विशेष ध्यान देते हुए इसके टिकटिंग पोर्टल की क्षमता तीन से चार गुना तकबढ़ाने की घोषणा की गई। अब इसकी टिकट काटने की क्षमता 2000 से बढ़कर 7200 टिकट प्रति मिनट होजाएगी। कई ट्रेनों में मुफ्त वाई-फाई सुविधा और चुनिंदा ट्रेनों में अत्याधुनिक सुविधाओं वाले अनुभूति कोच लगाने की घोषणा भी की गई । रेल बजट में बुनियादी ढांचे और संपर्क मार्ग पर ध्यान दिया गया है। बंदरगाहों, कोयला व लोहा खदानों को जोड़ने वाली परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए रेल मंत्रालय ने निजीक्षेत्र के साथ-साथ संबंधित राज्य सरकारों को जोड़ने की योजना पेश की है। रेल मंत्रालय की 12वीं योजना के दौरान एलिवेटेड रेल कॉरिडोर, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, स्टेशनों के पुनर्विकास, बिजली उत्पादन और फ्रेट टर्मिनल के क्षेत्र में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा निवेश आकर्षित करने की योजना है। चीन के मुकाबले सीमावर्ती इलाकों की रणनीतिक रेल परियोजनाओं का पिछड़ापन दूर करने की कोशिश भी रेल बजट में नजर आई। रेल मंत्री ने सीमावर्ती क्षेत्रों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा रेल संपर्क प्रदान करने की बात भी कही है।

फिर वही तलाश

रेलवे के जरिए वोट बैंक की फसल काटने की जो मुहिम गठबंधन राजनीति के दौर में शुरू हुई थी, उससे बंसल बच नहीं सके। राजस्थान, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए रेल मंत्री ने इन राज्यों पर मेहरबानी दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र चंडीगढ़ पर खासा ध्यान दिया। यहां से होकर 4 नई एक्सप्रेस गाडि़यां गुजरेंगी। पंजाब और हरियाणा को कुल 22 ट्रेनों की सौगात दी। कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के संसदीय क्षेत्रों व उसके आसपास के इलाकों की बल्ले-बल्ले रही। रेल मंत्री का सबसे बड़ा चुनावी पिटारा है अगले वित्त वर्ष में 1 लाख 52 हजार रिक्तियों को भरने का ऐलान। उन्होंने रेलवे सुरक्षा बल में 10 फीसदी स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करने की घोषणा भी की। रेल मंत्रालय 25 जगहों पर कौशल विकास केंद्र स्थापित करेगा जहां रेलवे से संबंधित ट्रेड में ट्रेनिंग दी जाएगी। मनरेगा के मजदूरों को रेल की पटरियां बिछाने के काम में लगाने के भी सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं।

रमेश दूबे
सभारः नवभारत टाइम्स